दर्द है दिल के लिए और दिल इंसाँ के लिए ताज़गी बर्ग-ओ-समर की चमनिस्ताँ के लिए साज़-ए-आहंग-ए-जुनूँ तार-ए-रग-ए-जाँ के लिए बे-ख़ुदी शौक़ की बे-सर-ओ-सामाँ के लिए क्या कहूँ कौन हवा सर में भरी रहती है बे पिए आठ-पहर बे-ख़बरी रहती है न हूँ शाइ'र न वली हूँ न हूँ एजाज़-ए-बयाँ बज़्म-ए-क़ुदरत में हूँ तस्वीर की सूरत हैराँ दिल में इक रंग है लफ़्ज़ों से जो होता है अयाँ लय की मुहताज नहीं है मिरी फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ शौक़-ए-शोहरत हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार नहीं दिल वो यूसुफ़ है जिसे फ़िक्र-ए-ख़रीदार नहीं और होंगे जिन्हें रहता है मुक़द्दर से गिला और होंगे जिन्हें मिलता नहीं मेहनत का सिला मैं ने जो ग़ैब की सरकार से माँगा वो मिला जो अक़ीदा था मिरे दिल का हिलाए न हिला क्यूँँ डराते हैं अबस गबरू मुसलमाँ मुझ को क्या मिटाएगी भला गर्दिश-ए-दौराँ मुझ को क्या ज़माना पे खुले बे-ख़बरी का मिरी राज़ ताइर-ए-फ़िक्र में पैदा तो हो इतनी परवाज़ क्यूँँ तबीअ'त को न हो बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पे नाज़ हज़रत-ए-अब्र के क़दमों पे है ये फ़र्क़-ए-नियाज़ फ़ख़्र है मुझ को उसी दर से शरफ़ पाने का मैं शराबी हूँ उसी रिंद के मयख़ाने का दिल मिरा दौलत-ए-दुनिया का तलबगार नहीं ब-ख़ुदा ख़ाक-नशीनी से मुझे आर नहीं मस्त हूँ हुब्ब-ए-वतन से कोई मय-ख़्वार नहीं मुझ को मग़रिब की नुमाइश से सरोकार नहीं अपने ही दिल का पियाला पिए मदहोश हूँ मैं झूटी पीता नहीं मग़रिब की वो मय-नोश हूँ मैं क़ौम के दर्द से हूँ सोज़-ए-वफ़ा की तस्वीर मेरी रग रग से है पैदा तप-ए-ग़म की तासीर है मगर आज नज़र में वो बहार-ए-दिल-गीर कर दिया दिल को फ़रिश्तों ने तरब के तस्ख़ीर ये नसीम-ए-सहरी आज ख़बर लाई है साल गुज़रा मिरे गुलशन में बहार आई है क़ौम में आठ बरस से है ये गुलशन शादाब चेहरा-ए-गुल पे यहाँ पास-ए-अदब की है नक़ाब मेरे आईना-ए-दिल में है फ़क़त इस का जवाब उस के काँटों पे किया मैं ने निसार अपना शबाब काम शबनम का लिया दीदा-ए-तर से अपने मैं ने सींचा है उसे ख़ून-ए-जिगर से अपने हर बरस रंग पे आता ही गया ये गुलज़ार फूल तहज़ीब के खिलते गए मिटते गए ख़ार पत्ती पत्ती से हुआ रंग-ए-वफ़ा का इज़हार नौजवानान-ए-चमन बन गए तस्वीर-ए-बहार रंग-ए-गुल देख के दिल क़ौम का दीवाना हुआ जो था बद-ख़्वाह-ए-चमन सब्ज़ा-ए-बेगाना हुआ बू-ए-नख़वत से नहीं याँ के गुलों को सरोकार है बुज़ुर्गों का अदब इन की जवानी का सिंगार इल्म-ओ-ईमाँ की तरावत का दिलों में है गुज़ार धो गए चश्मा-ए-अख़लाक़ से सीनों के ग़ुबार रंग दिखलाती है यूँँ दिल की सफ़ा यारों में रौशनी सुब्ह की जिस तरह हो गुलज़ारों में किस को मा'लूम थी इस गुलशन-ए-अख़्लाक़ की राह मैं ने फूलों को किया रंग-ए-वफ़ा से आगाह अब तो इस बाग़ पे है सब की मोहब्बत की निगाह जो कि पौदे थे शजर हो गए माशा-अल्लाह क्या कहूँ रंग-ए-जवानी में जो इस राग के थे बाग़बाँ हो गए गुलचीं जो मेरे बाग़ के थे गो कि बाक़ी नहीं कैफ़िय्यत-ए-तूफ़ान-ए-शबाब फँस के जंजाल में दुनिया के ये क़िस्सा हुआ ख़्वाब मस्त रहता है मगर अब भी दिल-ए-ख़ाना-ख़राब शाम को बैठ के महफ़िल में लुंढाता हूँ शराब नश्शा-ए-इल्म की उम्मीद पे जीने वाले सिमट आते हैं सर-ए-शाम से पीने वाले और ही रंग पे है आज बहार-ए-गुलशन सैर के वास्ते आए हैं अज़ीज़ान-ए-वतन फ़र्श आँखें किए बैठे हैं जवानान-ए-चमन दिल में तूफ़ान-ए-तरब लब पे मोहब्बत के सुख़न कौन है आज जो इस बज़्म में मसरूर नहीं रूह-ए-सरशार भी खिंच आए तो कुछ दूर नहीं मगर अफ़्सोस ये दुनिया है मक़ाम-ए-इबरत रंज की याद दिलाता है ख़याल-ए-राहत आज याद आती है उन फूलों की मुझ को सूरत खिलते ही कर गए जो मेरे चमन से रेहलत चश्म-ए-बद-दूर गुलों की ये भरी डाली है चंद फूलों की मगर इस में जगह ख़ाली है ये वो गुल थे जिन्हें अरबाब-ए-नज़र ने रोया भाई ने बहनों ने मादर ने पिदर ने रोया ख़ाक रोना था जो इस दीदा-ए-तर ने रोया मुद्दतों इन को मिरे क़ल्ब-ओ-जिगर ने रोया दिल के कुछ दाग़-ए-मोहब्बत हैं निशानी उन की बचपना देख के देखी न जवानी उन की ख़ैर दुनिया में कभी सोज़ है और कभी है साज़ नौनिहालान-ए-चमन की रहे अब उम्र दराज़ भाई से बढ़ के मुझे हैं ये मेरे माया-नाज़ मेरे मोनिस हैं यही और यही मेरे हमराज़ मर के भी रूह मिरी दिल की तरह शाद रहे मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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फ़ैज़-ए-क़ुदरत से जो तक़दीर खुली आलम की साहिल-ए-हिन्द पे वहदत की तजल्ली चमकी मिट गई जहल की शब सुब्ह का तारा चमका आर्य-वर्त की क़िस्मत का सितारा चमका अहल-ए-दिल पर हुई कैफ़िय्यत-ए-इरफ़ाँ तारी जिन से दुनिया में हुईं दीन की नहरें जारी थीं खुली जल्वा-गह-ए-ख़ास में राहें उन की वाक़िफ़-ए-राज़-ए-हक़ीक़त थीं निगाहें उन की अर्श से उन के लिए नूर-ए-ख़ुदा आया था बंदा-ए-खास थे ऋषियों का लक़ब पाया था वेद उन के दिल-ए-हक़-केश की तस्वीरें हैं जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-माबूद की तफ़्सीरें हैं ऐन कसरत में ये वहदत का सबक़ वेद में है एक ही नूर है जो ज़र्रा ओ ख़ुरशेद में है जिस से इंसान में है जोश-ए-जवानी पैदा इसी जौहरस है मौजों में रवानी पैदा रंग गुलशन में फ़ज़ा दामन-ए-कोहसार में है ख़ूँ रग-ए-गुल में है नश्तर की ख़लिश ख़ार में है तमकनत हुस्न में है जोश है दीवाने में रौशनी शम्अ'' में है नूर है परवाने में रंग-ओ-बू हो के समाया वही गुलज़ारों में अब्र बन कर वही बरसा किया कोहसारों में शौक़ हो कर दिल-ए-मज्ज़ूब पे छाया है वही दर्द बन कर दिल-ए-शाइ'र में समाया है वही नूर-ए-ईमाँ से जो पैदा हो सफ़ा सीने में अक्स उस का नज़र आता है इस आईने में
Chakbast Brij Narayan
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ज़मीन हिन्द की रुत्बा में अर्श-ए-आ'ला है ये होम-रूल की उम्मीद का उजाला है मिसिज़-बेसेंट ने इस आरज़ू को पाला है फ़क़ीर क़ौम के हैं और ये राग माला है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले वतन-परस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगे हम अपनी आँख का सुर्मा उसे बनाएँगे ग़रीब माँ के लिए दर्द-दुख उठाएँगे यही पयाम-ए-वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले हमारे वास्ते ज़ंजीर-ओ-तौक़ गहना है वफ़ा के शौक़ में गाँधी ने जिस को पहना है समझ लिया कि हमें रंज-ओ-दर्द सहना है मगर ज़बाँ से कहेंगे वही जो कहना है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले पहनाने वाले अगर बेड़ियाँ पहनाएँगे ख़ुशी से क़ैद के गोशे को हम बसाएँगे जो संतरी दर-ए-ज़िंदाँ के भी सो जाएँगे ये राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले ज़बाँ को बंद किया है ये ग़ाफ़िलों को है नाज़ ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अंदाज़ रहेगा जान के हम-राह दिल का सोज़-ओ-गुदाज़ चिता से आएगी मरने के बा'द ये आवाज़ तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही दुआ है वतन के शिकस्ता हालों की यही उमंग जवानी के नौनिहालों की जो रहनुमा है मोहब्बत पे मिटने वालों की हमें क़सम है उसी के सपेद बालों की तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही पयाम है कोयल का बाग़ के अंदर इसी हवा में है गंगा का ज़ोर आठ-पहर हिलाल-ए-ईद ने दी है यही दिलों को ख़बर पुकारता है हिमाला से अब्र उठ उठ कर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले बसे हुए हैं मोहब्बत से जिन की क़ौम के घर वतन का पास है उन को सुहाग से बढ़ कर जो शीर-ख़ार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्त-ए-जिगर ये माँ के दूध से लिक्खा है उन के सीने पर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले
Chakbast Brij Narayan
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मौत ने रात के पर्दे में किया कैसा वार रौशनी-ए-सुब्ह वतन की है कि मातम का ग़ुबार मा'रका सर्द है सोया है वतन का सरदार तनतना शे'र का बाक़ी नहीं सूना है कछार बेकसी छाती है तक़दीर फिरी जाती है क़ौम के हाथ से तलवार गिरी जाती है उठ गया दौलत-ए-नामूस-ए-वतन का वारिस क़ौम मरहूम के एज़ाज़-ए-कुहन का वारिस जाँ-निसार-ए-अज़ली शेर-ए-दकन का वारिस पेशवाओं के गरजते हुए रन का वारिस थी समाई हुई पूना की बहार आँखों में आख़िरी दौर का बाक़ी था ख़ुमार आँखों में मौत महाराष्ट्र की थी या तिरी मरने की ख़बर मुर्दनी छा गई इंसान तो क्या पत्थर पर पत्तियाँ झुक गईं मुरझा गए सहरा के शजर रह गए जोश में बहते हुए दरिया थम कर सर्द-ओ-शादाब हवा रुक गई कोहसारों की रौशनी घट गई दो-चार घड़ी तारों की था निगहबान-ए-वतन दबदबा-ए-आम तिरा न डिगें पाँव पे था क़ौम को पैग़ाम दिल रक़ीबों के लरज़ते थे ये था काम तेरा नींद से चौंक पड़े सुन जो लिया नाम तेरा याद कर के तुझे मज़लूम-ए-वतन रोएँगे बंदा-ए-रस्म-ए-जफ़ा चैन से अब सोएँगे ज़िंदगी तेरी बहार चमनिस्तान-ए-वफ़ा आबरू तेरे लिए क़ौम से पैमान-ए-वफ़ा आशिक़-ए-नाम-ए-वतन कुश्ता-ए-अरमान-ए-वफ़ा मर्द-ए-मैदान-ए-वफ़ा जिस्म-ए-वफ़ा जान-ए-वफ़ा हो गई नज़्र-ए-वतन हस्ती-ए-फ़ानी तेरी न तो पीरी रही तेरी न जवानी तेरी औज-ए-हिम्मत पे रहा तेरी वफ़ा का ख़ुर्शेद मौत के ख़ौफ़ पे ग़ालिब रही ख़िदमत की उमेद बन गया क़ैद का फ़रमान भी राहत की नवेद हुए तारीकी-ए-ज़िंदाँ में तिरे बाल सपेद फिर रहा है मिरी नज़रों में सरापा तेरा आह-ओ-क़ैद-ए-सितम और बुढ़ापा तेरा मो'जिज़ा अश्क-ए-मोहब्बत का दिखाया तू ने एक क़तरा से ये तूफ़ान उठाया तू ने मुल्क को हस्ती-ए-बेदार बनाया तू ने जज़्बा-ए-क़ौम को जादू को जगाया तू ने इक तड़प आ गई सोते हुए अरमानों में बिजलियाँ कौंद गईं क़ौम के वीरानों में लाश को तेरी सँवारें न रफ़ीक़ान-ए-कुहन हो जबीं के लिए संदल की जगह ख़ाक-ए-वतन तर हुआ है जो शहीदों के लहू से दामन दें उसी का तुझे पंजाब के मज़लूम कफ़न शोर-ए-मातम न हो झंकार हो ज़ंजीरों की चाहिए क़ौम के भीषम को चिता तीरों की
Chakbast Brij Narayan
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है दिलाती याद मय-नोशी फ़ज़ा बरसात की दिल बढ़ा जाती है आ आ कर घटा बरसात की बंध गई है रहमत-ए-हक़ से हवा बरसात की नाम खुलने का नहीं लेती घटा बरसात की उग रहा है हर तरफ़ सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर इंतिहा गर्मी की है और इब्तिदा बरसात की देखना सूखी हुई शाख़ों में भी जान आ गई हक़ में पौदों के मसीहा है हवा बरसात की हों शरीक-ए-बज़्म-ए-मय ज़ाहिद भी तौबा तोड़ कर झूमती क़िबले से उट्ठी है घटा बरसात की अस्ल तो ये है मय-ओ-माशूक़ का जब लुत्फ़ है चाँदनी हो रात को दिन को घटा बरसात की वो पपीहों की सदाएँ और वो मोरों का रक़्स वो हवा-ए-सर्व और काली घटा बरसात की पार उतर जाएँगे बहर-ए-ग़म से रिंद-ए-बादा-नोश ले उड़ेगी कश्ती-ए-मय को हवा बरसात की ख़ुद-ब-ख़ुद ताज़ा उमंगें जोश पर आने लगीं दिल को गरमाने लगी ठंडी हवा बरसात की वो दुआएँ मय-कशों की और वो लुत्फ़-ए-इंतिज़ार हाए किन नाज़ों से चलती है हवा बरसात की मैं ये समझा अब्र के रंगीन टुकड़े देख कर तख़्त परियों के उड़ लाई हवा बरसात की नाज़ हो जिस को बहार-ए-मिस्र-ओ-शाम-ओ-रूम पर सर-ज़मीन-ए-हिंद में देखे फ़ज़ा बरसात की
Chakbast Brij Narayan
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लरज़ रहा था वतन जिस ख़याल के डर से वो आज ख़ून रुलाता है दीदा-ए-तर से सदा ये आती है फल फूल और पत्थर से ज़मीं पे ताज गिरा क़ौम-ए-हिन्द के सर से हबीब क़ौम का दुनिया से यूँँ रवाना हुआ ज़मीं उलट गई क्या मुंक़लिब ज़माना हुआ बढ़ी हुई थी नहूसत ज़वाल-ए-पैहम की तिरे ज़ुहूर से तक़दीर क़ौम की चमकी निगाह-ए-यास थी हिंदुस्ताँ पे आलम की अजीब शय थी मगर रौशनी तिरे दम की तुझी को मुल्क में रौशन दिमाग़ समझे थे तुझे ग़रीब के घर का चराग़ समझे थे वतन को तू ने सँवारा किस आब-ओ-ताब के साथ सहर का नूर बढ़े जैसे आफ़्ताब के साथ चुने रिफ़ाह के गुल हुस्न-ए-इंतिख़ाब के साथ शबाब क़ौम का चमका तिरे शबाब के साथ जो आज नश्व-ओ-नुमा का नया ज़माना है ये इंक़लाब तिरी उम्र का फ़साना है रहा मिज़ाज में सौदा-ए-क़ौम ख़ू हो कर वतन का इश्क़ रहा दिल की आरज़ू हो कर बदन में जान रही वक़्फ़-ए-आबरू हो कर रगों में जोश-ए-मोहब्बत रहे लहू हो हो कर ख़ुदा के हुक्म से जब आब-ओ-गिल बना तेरा किसी शहीद की मिट्टी से दिल बना तेरा वतन की जान पे क्या क्या तबाहियाँ आईं उमँड उमँड के जिहालत की बदलियाँ आईं चराग़-ए-अम्न बुझाने को आँधियाँ आईं दिलों में आग लगाने को बिजलियाँ आईं इस इंतिशार में जिस नूर का सहारा था उफ़ुक़ पे क़ौम के वो एक ही सितारा था हदीस-ए-क़ौम बनी थी तिरी ज़बाँ के लिए ज़बाँ मिली थी मोहब्बत की दास्ताँ के लिए ख़ुदा ने तुझ को पयम्बर किया यहाँ के लिए कि तेरे हाथ में नाक़ूस था अज़ाँ के लिए वतन की ख़ाक तिरी बारगाह-ए-आला' है हमें यही नई मस्जिद नया शिवाला है ग़रीब हिन्द ने तन्हा नहीं ये दाग़ सहा वतन से दूर भी तूफ़ान रंज-ओ-ग़म का उठा हबीब क्या हैं हरीफ़ों ने ये ज़बाँ से कहा सफ़ीर-ए-क़ौम जिगर-बंद-ए-सल्तनत न रहा पयाम शह ने दिया रस्म-ए-ताज़ियत के लिए कि तू सुतून था ऐवान-ए-सल्तनत के लिए दिलों में नक़्श हैं अब तक तिरी ज़बाँ के सुख़न हमारी राह में गोया चराग़ हैं रौशन फ़क़ीर थे जो तिरे दर के ख़ादिमान-ए-वतन उन्हें नसीब कहाँ होगा अब तिरा दामन तिरे अलम में वो इस तरह जान खोते हैं कि जैसे बाप से छुट कर यतीम रोते हैं अजल के दाम में आना है यूँँ तो आलम को मगर ये दिल नहीं तय्यार तेरे मातम को पहाड़ कहते हैं दुनिया में ऐसे ही ग़म को मिटा के तुझ को अजल ने मिटा दिया हम को जनाज़ा हिन्द का दर से तिरे निकलता है सुहाग क़ौम का तेरी चिता में जलता है रहेगा रंज ज़माने में यादगार तिरा वो कौन दिल है कि जिस में नहीं मज़ार तिरा जो कल रक़ीब था है आज सोगवार तिरा ख़ुदा के सामने है मुल्क शर्मसार तिरा पली है क़ौम तिरे साया-ए-करम के तले हमें नसीब थी जन्नत तिरे क़दम के तले
Chakbast Brij Narayan
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