nazmKuch Alfaaz

हुब्ब-ए-क़ौमी का ज़बाँ पर इन दिनों अफ़्साना है बादा-ए-उल्फ़त से पुर दिल का मिरे पैमाना है जिस जगह देखो मोहब्बत का वहाँ अफ़्साना है इश्क़ में अपने वतन के हर बशर दीवाना है जब कि ये आग़ाज़ है अंजाम का क्या पूछना बादा-ए-उल्फ़त का ये तो पहला ही पैमाना है है जो रौशन बज़्म में क़ौमी तरक़्क़ी का चराग़ दिल फ़िदा हर इक का उस पर सूरत-ए-परवाना है मुझ से इस हमदर्दी-ओ-उल्फ़त का क्या होवे बयाँ जो है वो क़ौमी तरक़्क़ी के लिए दीवाना है लुत्फ़ यकताई में जो है वो दुई में है कहाँ बर-ख़िलाफ़ इस के जो हो समझो कि वो दीवाना है नख़्ल-ए-उल्फ़त जिन की कोशिश से उगा है क़ौम में क़ाबिल-ए-तारीफ़ उन की हिम्मत-ए-मर्दाना है है गुल-ए-मक़्सूद से पुर गुलशन-ए-कश्मीर आज दुश्मनी ना-इत्तिफ़ाक़ी सब्ज़ा-ए-बेगाना है दुर-फ़िशाँ है हर ज़बाँ हुब्ब-ए-वतन के वस्फ़ में जोश-ज़न हर सम्त बहर-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना है ये मोहब्बत की फ़ज़ा क़ाएम हुई है आप से आप का लाज़िम तह-ए-दिल से हमें शुक्राना है हर बशर को है भरोसा आप की इमदाद पर आप की हमदर्दियों का दूर दूर अफ़्साना है जम्अ'' हैं क़ौमी तरक़्क़ी के लिए अर्बाब-ए-क़ौम रश्क-ए-फ़िरदौस उन के क़दमों से ये शादी-ख़ाना है

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"तुम से बे-पनाह मोहब्बत" मेरे नूर-ए-नज़र आ भी जा तू नज़र कब सुनाएगा मुझ को तू अच्छी ख़बर तेरा आशिक़ बेचारा परेशान है तुझ से नाराज़ है और हैरान है क़ासिद-ए-मोतबर ले जा मेरी ख़बर तेरी नज़रों से मिलती हैं ख़ामोशियाँ दिल में क्यूँ रखता है इतनी सरगोशियाँ खोल दे अब ज़बाँ ऐ मेरे हम सफ़र मेरे दिल की तमन्ना यहीं हैं सनम मैं रहूँ साथिया बन के सातों जनम बात हो जाए सच तू जो कह दे अगर टूट कर मेरा दिल ये बिखर जाएगा तू न होगा तो ''दानिश'' ये मर जाएगा सूख जाएगा ये ज़िंदगी का शजर

Danish Balliavi

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन गुल-पोश तेरी वादियाँ फ़रहत-निशाँ राहत-रसाँ तेरे चमन-ज़ारों पे है गुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँ हर शाख़ फूलों की छड़ी हर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँ कौसर के चश्में जा-ब-जा तसनीम हर आब-ए-रवाँ हर बर्ग रूह-ए-ताज़गी हर फूल जान-ए-गुल्सिताँ हर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशी हर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँ दिलकश चरागाहें तिरी ढोरों के जिन में कारवाँ अंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौ हर तख़्ता-ए-गुल आसमाँ नक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जा हर हर रविश इक कहकशाँ तेरी बहारें दाइमी तेरी बहारें जावेदाँ तुझ में है रूह-ए-ज़िंदगी पैहम रवाँ पैहम दवाँ दरिया वो तेरे तुंद-ख़ू झीलें वो तेरी बे-कराँ शाम-ए-अवध के लब पे है हुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँ कहती है राज़-ए-सरमदी सुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँ उड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक पर उन कार-ख़ानों का धुआँ जिन में हैं लाखों मेहनती सनअत-गरी के पासबाँ तेरी बनारस की ज़री रश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँ बीदर की फ़नकारी में हैं सनअत की सब बारीकियाँ अज़्मत तिरे इक़बाल की तेरे पहाड़ों से अयाँ दरियाओं का पानी, तरी तक़्दीस का अंदाज़ा-दाँ क्या 'भारतेंदु' ने किया गंगा की लहरों का बयाँ 'इक़बाल' और चकबस्त हैं अज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ 'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैं तेरे अदब के तर्जुमाँ 'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरी ता'रीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँ गाते हैं नग़्मा मिल के सब ऊँचा रहे तेरा निशाँ मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तेरे नज़ारों के नगीं दुनिया की ख़ातम में नहीं सारे जहाँ में मुंतख़ब कश्मीर की अर्ज़-ए-हसीं फ़ितरत का रंगीं मोजज़ा फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं हाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमीं सरसब्ज़ जिस के दश्त हैं जिस के जबल हैं सुर्मगीं मेवे ब-कसरत हैं जहाँ शीरीं मिसाल-ए-अंग्बीं हर ज़ाफ़राँ के फूल में अक्स-ए-जमाल-ए-हूरईं वो मालवे की चाँदनी गुम जिस में हों दुनिया-ओ-दीं इस ख़ित्ता-ए-नैरंग में हर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रीं हर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगी दिलकश मकाँ दिलकश ज़मीं हर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रू हर एक औरत नाज़नीं वो ताज की ख़ुश-पैकरी हर ज़ाविए से दिल-नशीं सनअत-गरों के दौर की इक यादगार-ए-मरमरीं होती है जो हर शाम को फ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरीं दरिया की मौजों से अलग या इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बीं या ताएर-ए-नूरी कोई परवाज़ करने के क़रीं या अहल-ए-दुनिया से अलग इक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ी नक़्श-ए-अजंता की क़सम जचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चीं शान-ए-एलोरा देख कर झुकती है आज़र की जबीं चित्तौड़ हो या आगरा ऐसे नहीं क़िलए कहीं बुत-गर हो या नक़्क़ाश हो तू सब की अज़्मत का अमीं मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन दिलकश तिरे दश्त ओ चमन रंगीं तिरे शहर ओ चमन तेरे जवाँ राना जवाँ तेरे हसीं गुल पैरहन इक अंजुमन दुनिया है ये तू इस में सद्र-ए-अंजुमन तेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवा शाएर तिरे शीरीं-सुख़न हर ज़र्रा इक माह-ए-मुबीं हर ख़ार रश्क-ए-नस्तरीं ग़ुंचा तिरे सहरा का है इक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन कंकर हैं तेरे बे-बहा पत्थर तिरे लाल-ए-यमन बस्ती से जंगल ख़ूब-तर बाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बन वो मोर वो कब्क-ए-दरी वो चौकड़ी भरते हिरन रंगीं-अदा वो तितलियाँ बाँबी में वो नागों के फन वो शे'र जिन के नाम से लरज़े में आए अहरमन खेतों की बरकत से अयाँ फ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिनन चश्मों के शीरीं आब से लज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहन ताबिंदा तेरा अहद-ए-नौ रौशन तिरा अहद-ए-कुहन कितनों ने तुझ पर कर दिया क़ुर्बान अपना माल धन कितने शहीदों को मिले तेरे लिए दार-ओ-रसन कितनों को तेरा इश्क़ था कितनों को थी तेरी लगन तेरे जफ़ा-कश मेहनती रखते हैं अज़्म-ए-कोहकन तेरे सिपाही सूरमा बे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन 'भीषम' सा जिन में हौसला 'अर्जुन' सा जिन में बाँकपन आलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैं फ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न 'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल' 'दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण' 'वलाठोल', 'माहिर', भारती 'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन' 'कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद' 'टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन' मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन खेती तिरी हर इक हरी दिलकश तिरी ख़ुश-मंज़री तेरी बिसात-ए-ख़ाक के ज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरी झेलम कावेरी नाग वो गंगा की वो गंगोत्री वो नर्बदा की तमकनत वो शौकत-ए-गोदावरी पाकीज़गी सरजू की वो जमुना की वो ख़ुश-गाैहरी दुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँ कश्मीर की नीलम-परी दिलकश पपीहे की सदा कोयल की तानें मद-भरी तीतर का वो हक़ सिर्रहु तूती का वो विर्द-ए-हरी सूफ़ी तिरे हर दौर में करते रहे पैग़म्बरी 'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिली फ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरी अदल-ए-जहाँगीरी में थी मुज़्मर रेआया-पर्वरी वो नव-रतन जिन से हुई तहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरी रखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़ल इक सौलत-ए-अस्कंदरी रानाओं के इक़बाल की होती है किस से हम-सरी सावंत वो योद्धा तिरे तेरे जियाले वो जरी नीती विदुर की आज तक करती है तेरी रहबरी अब तक है मशहूर-ए-ज़माँ 'चाणक्य' की दानिश-वरी वयास और विश्वामित्र से मुनियों की शान-ए-क़ैसरी पातंजलि ओ साँख से ऋषियों की हिकमत-पर्वरी बख़्शे तुझे इनआम-ए-नौ हर दौर चर्ख़-ए-चम्बरी ख़ुश-गाैहरी दे आब को और ख़ाक को ख़ुश-जौहरी ज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँ क़तरों को दरिया-गुस्तरी मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तू रहबर-ए-नौ-ए-बशर तू अम्न का पैग़ाम-बर पाले हैं तू ने गोद में साहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़र अफ़ज़ल-तरीं इन सब में है बापू का नाम-ए-मो'तबर हर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशीं हर बात जिस की पुर-असर जिस ने लगाया दहर में नारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर बे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँ बे-सूद हैं तेग़-ओ-तबर हिंसा का रस्ता झूट है हक़ है अहिंसा की डगर दरमाँ है ये हर दर्द का ये हर मरज़ का चारा-गर जंगाह-ए-आलम में कोई इस से नहीं बेहतर सिपर करता हूँ मैं तेरे लिए अब ये दुआ-ए-मुख़्तसर रौनक़ पे हों तेरे चमन सरसब्ज़ हों तेरे शजर नख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरी हर फ़स्ल में हो बारवर कोशिश हो दुनिया में कोई ख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बर तेरा हर इक बासी रहे नेको-सिफ़त नेको-सियर हर ज़न सलीक़ा-मंद हो हर मर्द हो साहिब-हुनर जब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लक जब तक हैं ये शम्स ओ क़मर मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन

Arsh Malsiyani

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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं

Divya 'Kumar Sahab'

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मौत ने रात के पर्दे में किया कैसा वार रौशनी-ए-सुब्ह वतन की है कि मातम का ग़ुबार मा'रका सर्द है सोया है वतन का सरदार तनतना शे'र का बाक़ी नहीं सूना है कछार बेकसी छाती है तक़दीर फिरी जाती है क़ौम के हाथ से तलवार गिरी जाती है उठ गया दौलत-ए-नामूस-ए-वतन का वारिस क़ौम मरहूम के एज़ाज़-ए-कुहन का वारिस जाँ-निसार-ए-अज़ली शेर-ए-दकन का वारिस पेशवाओं के गरजते हुए रन का वारिस थी समाई हुई पूना की बहार आँखों में आख़िरी दौर का बाक़ी था ख़ुमार आँखों में मौत महाराष्ट्र की थी या तिरी मरने की ख़बर मुर्दनी छा गई इंसान तो क्या पत्थर पर पत्तियाँ झुक गईं मुरझा गए सहरा के शजर रह गए जोश में बहते हुए दरिया थम कर सर्द-ओ-शादाब हवा रुक गई कोहसारों की रौशनी घट गई दो-चार घड़ी तारों की था निगहबान-ए-वतन दबदबा-ए-आम तिरा न डिगें पाँव पे था क़ौम को पैग़ाम दिल रक़ीबों के लरज़ते थे ये था काम तेरा नींद से चौंक पड़े सुन जो लिया नाम तेरा याद कर के तुझे मज़लूम-ए-वतन रोएँगे बंदा-ए-रस्म-ए-जफ़ा चैन से अब सोएँगे ज़िंदगी तेरी बहार चमनिस्तान-ए-वफ़ा आबरू तेरे लिए क़ौम से पैमान-ए-वफ़ा आशिक़-ए-नाम-ए-वतन कुश्ता-ए-अरमान-ए-वफ़ा मर्द-ए-मैदान-ए-वफ़ा जिस्म-ए-वफ़ा जान-ए-वफ़ा हो गई नज़्र-ए-वतन हस्ती-ए-फ़ानी तेरी न तो पीरी रही तेरी न जवानी तेरी औज-ए-हिम्मत पे रहा तेरी वफ़ा का ख़ुर्शेद मौत के ख़ौफ़ पे ग़ालिब रही ख़िदमत की उमेद बन गया क़ैद का फ़रमान भी राहत की नवेद हुए तारीकी-ए-ज़िंदाँ में तिरे बाल सपेद फिर रहा है मिरी नज़रों में सरापा तेरा आह-ओ-क़ैद-ए-सितम और बुढ़ापा तेरा मो'जिज़ा अश्क-ए-मोहब्बत का दिखाया तू ने एक क़तरा से ये तूफ़ान उठाया तू ने मुल्क को हस्ती-ए-बेदार बनाया तू ने जज़्बा-ए-क़ौम को जादू को जगाया तू ने इक तड़प आ गई सोते हुए अरमानों में बिजलियाँ कौंद गईं क़ौम के वीरानों में लाश को तेरी सँवारें न रफ़ीक़ान-ए-कुहन हो जबीं के लिए संदल की जगह ख़ाक-ए-वतन तर हुआ है जो शहीदों के लहू से दामन दें उसी का तुझे पंजाब के मज़लूम कफ़न शोर-ए-मातम न हो झंकार हो ज़ंजीरों की चाहिए क़ौम के भीषम को चिता तीरों की

Chakbast Brij Narayan

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दर्द है दिल के लिए और दिल इंसाँ के लिए ताज़गी बर्ग-ओ-समर की चमनिस्ताँ के लिए साज़-ए-आहंग-ए-जुनूँ तार-ए-रग-ए-जाँ के लिए बे-ख़ुदी शौक़ की बे-सर-ओ-सामाँ के लिए क्या कहूँ कौन हवा सर में भरी रहती है बे पिए आठ-पहर बे-ख़बरी रहती है न हूँ शाइ'र न वली हूँ न हूँ एजाज़-ए-बयाँ बज़्म-ए-क़ुदरत में हूँ तस्वीर की सूरत हैराँ दिल में इक रंग है लफ़्ज़ों से जो होता है अयाँ लय की मुहताज नहीं है मिरी फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ शौक़-ए-शोहरत हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार नहीं दिल वो यूसुफ़ है जिसे फ़िक्र-ए-ख़रीदार नहीं और होंगे जिन्हें रहता है मुक़द्दर से गिला और होंगे जिन्हें मिलता नहीं मेहनत का सिला मैं ने जो ग़ैब की सरकार से माँगा वो मिला जो अक़ीदा था मिरे दिल का हिलाए न हिला क्यूँँ डराते हैं अबस गबरू मुसलमाँ मुझ को क्या मिटाएगी भला गर्दिश-ए-दौराँ मुझ को क्या ज़माना पे खुले बे-ख़बरी का मिरी राज़ ताइर-ए-फ़िक्र में पैदा तो हो इतनी परवाज़ क्यूँँ तबीअ'त को न हो बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पे नाज़ हज़रत-ए-अब्र के क़दमों पे है ये फ़र्क़-ए-नियाज़ फ़ख़्र है मुझ को उसी दर से शरफ़ पाने का मैं शराबी हूँ उसी रिंद के मयख़ाने का दिल मिरा दौलत-ए-दुनिया का तलबगार नहीं ब-ख़ुदा ख़ाक-नशीनी से मुझे आर नहीं मस्त हूँ हुब्ब-ए-वतन से कोई मय-ख़्वार नहीं मुझ को मग़रिब की नुमाइश से सरोकार नहीं अपने ही दिल का पियाला पिए मदहोश हूँ मैं झूटी पीता नहीं मग़रिब की वो मय-नोश हूँ मैं क़ौम के दर्द से हूँ सोज़-ए-वफ़ा की तस्वीर मेरी रग रग से है पैदा तप-ए-ग़म की तासीर है मगर आज नज़र में वो बहार-ए-दिल-गीर कर दिया दिल को फ़रिश्तों ने तरब के तस्ख़ीर ये नसीम-ए-सहरी आज ख़बर लाई है साल गुज़रा मिरे गुलशन में बहार आई है क़ौम में आठ बरस से है ये गुलशन शादाब चेहरा-ए-गुल पे यहाँ पास-ए-अदब की है नक़ाब मेरे आईना-ए-दिल में है फ़क़त इस का जवाब उस के काँटों पे किया मैं ने निसार अपना शबाब काम शबनम का लिया दीदा-ए-तर से अपने मैं ने सींचा है उसे ख़ून-ए-जिगर से अपने हर बरस रंग पे आता ही गया ये गुलज़ार फूल तहज़ीब के खिलते गए मिटते गए ख़ार पत्ती पत्ती से हुआ रंग-ए-वफ़ा का इज़हार नौजवानान-ए-चमन बन गए तस्वीर-ए-बहार रंग-ए-गुल देख के दिल क़ौम का दीवाना हुआ जो था बद-ख़्वाह-ए-चमन सब्ज़ा-ए-बेगाना हुआ बू-ए-नख़वत से नहीं याँ के गुलों को सरोकार है बुज़ुर्गों का अदब इन की जवानी का सिंगार इल्म-ओ-ईमाँ की तरावत का दिलों में है गुज़ार धो गए चश्मा-ए-अख़लाक़ से सीनों के ग़ुबार रंग दिखलाती है यूँँ दिल की सफ़ा यारों में रौशनी सुब्ह की जिस तरह हो गुलज़ारों में किस को मा'लूम थी इस गुलशन-ए-अख़्लाक़ की राह मैं ने फूलों को किया रंग-ए-वफ़ा से आगाह अब तो इस बाग़ पे है सब की मोहब्बत की निगाह जो कि पौदे थे शजर हो गए माशा-अल्लाह क्या कहूँ रंग-ए-जवानी में जो इस राग के थे बाग़बाँ हो गए गुलचीं जो मेरे बाग़ के थे गो कि बाक़ी नहीं कैफ़िय्यत-ए-तूफ़ान-ए-शबाब फँस के जंजाल में दुनिया के ये क़िस्सा हुआ ख़्वाब मस्त रहता है मगर अब भी दिल-ए-ख़ाना-ख़राब शाम को बैठ के महफ़िल में लुंढाता हूँ शराब नश्शा-ए-इल्म की उम्मीद पे जीने वाले सिमट आते हैं सर-ए-शाम से पीने वाले और ही रंग पे है आज बहार-ए-गुलशन सैर के वास्ते आए हैं अज़ीज़ान-ए-वतन फ़र्श आँखें किए बैठे हैं जवानान-ए-चमन दिल में तूफ़ान-ए-तरब लब पे मोहब्बत के सुख़न कौन है आज जो इस बज़्म में मसरूर नहीं रूह-ए-सरशार भी खिंच आए तो कुछ दूर नहीं मगर अफ़्सोस ये दुनिया है मक़ाम-ए-इबरत रंज की याद दिलाता है ख़याल-ए-राहत आज याद आती है उन फूलों की मुझ को सूरत खिलते ही कर गए जो मेरे चमन से रेहलत चश्म-ए-बद-दूर गुलों की ये भरी डाली है चंद फूलों की मगर इस में जगह ख़ाली है ये वो गुल थे जिन्हें अरबाब-ए-नज़र ने रोया भाई ने बहनों ने मादर ने पिदर ने रोया ख़ाक रोना था जो इस दीदा-ए-तर ने रोया मुद्दतों इन को मिरे क़ल्ब-ओ-जिगर ने रोया दिल के कुछ दाग़-ए-मोहब्बत हैं निशानी उन की बचपना देख के देखी न जवानी उन की ख़ैर दुनिया में कभी सोज़ है और कभी है साज़ नौनिहालान-ए-चमन की रहे अब उम्र दराज़ भाई से बढ़ के मुझे हैं ये मेरे माया-नाज़ मेरे मोनिस हैं यही और यही मेरे हमराज़ मर के भी रूह मिरी दिल की तरह शाद रहे मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे

Chakbast Brij Narayan

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ज़मीन हिन्द की रुत्बा में अर्श-ए-आ'ला है ये होम-रूल की उम्मीद का उजाला है मिसिज़-बेसेंट ने इस आरज़ू को पाला है फ़क़ीर क़ौम के हैं और ये राग माला है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले वतन-परस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगे हम अपनी आँख का सुर्मा उसे बनाएँगे ग़रीब माँ के लिए दर्द-दुख उठाएँगे यही पयाम-ए-वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले हमारे वास्ते ज़ंजीर-ओ-तौक़ गहना है वफ़ा के शौक़ में गाँधी ने जिस को पहना है समझ लिया कि हमें रंज-ओ-दर्द सहना है मगर ज़बाँ से कहेंगे वही जो कहना है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले पहनाने वाले अगर बेड़ियाँ पहनाएँगे ख़ुशी से क़ैद के गोशे को हम बसाएँगे जो संतरी दर-ए-ज़िंदाँ के भी सो जाएँगे ये राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले ज़बाँ को बंद किया है ये ग़ाफ़िलों को है नाज़ ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अंदाज़ रहेगा जान के हम-राह दिल का सोज़-ओ-गुदाज़ चिता से आएगी मरने के बा'द ये आवाज़ तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही दुआ है वतन के शिकस्ता हालों की यही उमंग जवानी के नौनिहालों की जो रहनुमा है मोहब्बत पे मिटने वालों की हमें क़सम है उसी के सपेद बालों की तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही पयाम है कोयल का बाग़ के अंदर इसी हवा में है गंगा का ज़ोर आठ-पहर हिलाल-ए-ईद ने दी है यही दिलों को ख़बर पुकारता है हिमाला से अब्र उठ उठ कर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले बसे हुए हैं मोहब्बत से जिन की क़ौम के घर वतन का पास है उन को सुहाग से बढ़ कर जो शीर-ख़ार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्त-ए-जिगर ये माँ के दूध से लिक्खा है उन के सीने पर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

Chakbast Brij Narayan

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फ़ैज़-ए-क़ुदरत से जो तक़दीर खुली आलम की साहिल-ए-हिन्द पे वहदत की तजल्ली चमकी मिट गई जहल की शब सुब्ह का तारा चमका आर्य-वर्त की क़िस्मत का सितारा चमका अहल-ए-दिल पर हुई कैफ़िय्यत-ए-इरफ़ाँ तारी जिन से दुनिया में हुईं दीन की नहरें जारी थीं खुली जल्वा-गह-ए-ख़ास में राहें उन की वाक़िफ़-ए-राज़-ए-हक़ीक़त थीं निगाहें उन की अर्श से उन के लिए नूर-ए-ख़ुदा आया था बंदा-ए-खास थे ऋषियों का लक़ब पाया था वेद उन के दिल-ए-हक़-केश की तस्वीरें हैं जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-माबूद की तफ़्सीरें हैं ऐन कसरत में ये वहदत का सबक़ वेद में है एक ही नूर है जो ज़र्रा ओ ख़ुरशेद में है जिस से इंसान में है जोश-ए-जवानी पैदा इसी जौहरस है मौजों में रवानी पैदा रंग गुलशन में फ़ज़ा दामन-ए-कोहसार में है ख़ूँ रग-ए-गुल में है नश्तर की ख़लिश ख़ार में है तमकनत हुस्न में है जोश है दीवाने में रौशनी शम्अ'' में है नूर है परवाने में रंग-ओ-बू हो के समाया वही गुलज़ारों में अब्र बन कर वही बरसा किया कोहसारों में शौक़ हो कर दिल-ए-मज्ज़ूब पे छाया है वही दर्द बन कर दिल-ए-शाइ'र में समाया है वही नूर-ए-ईमाँ से जो पैदा हो सफ़ा सीने में अक्स उस का नज़र आता है इस आईने में

Chakbast Brij Narayan

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आसफ़ुद्दौला-ए-मरहूम की तामीर-ए-कुहन जिस की सनअ'त का नहीं सफ़्हा-ए-हस्ती पे जवाब देख सय्याह उसे रात के सन्नाटे में मुँह से अपने मह-ए-कामिल ने जब उल्टी हो नक़ाब दर-ओ-दीवार नज़र आते हैं क्या साफ़-ओ-सुबुक सहर करती है निगाहों पे ज़िया-ए-महताब यही होता है गुमाँ ख़ाक से मस इस को नहीं है सँभाले हुए दामन में हवा-ए-शादाब यक-ब-यक दीदा-ए-हैराँ को ये शक होता है ढल के साँचे में ज़मीं पर उतर आया है सहाब बे-ख़ुदी कहती है आया ये फ़ज़ा में क्यूँँ कर किसी उस्ताद मुसव्विर का है ये जल्वा-ए-ख़्वाब इक अजब मंज़र-ए-दिल-गीर नज़र आता है दूर से आलम-ए-तस्वीर नज़र आता है

Chakbast Brij Narayan

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