nazmKuch Alfaaz

आसफ़ुद्दौला-ए-मरहूम की तामीर-ए-कुहन जिस की सनअ'त का नहीं सफ़्हा-ए-हस्ती पे जवाब देख सय्याह उसे रात के सन्नाटे में मुँह से अपने मह-ए-कामिल ने जब उल्टी हो नक़ाब दर-ओ-दीवार नज़र आते हैं क्या साफ़-ओ-सुबुक सहर करती है निगाहों पे ज़िया-ए-महताब यही होता है गुमाँ ख़ाक से मस इस को नहीं है सँभाले हुए दामन में हवा-ए-शादाब यक-ब-यक दीदा-ए-हैराँ को ये शक होता है ढल के साँचे में ज़मीं पर उतर आया है सहाब बे-ख़ुदी कहती है आया ये फ़ज़ा में क्यूँँ कर किसी उस्ताद मुसव्विर का है ये जल्वा-ए-ख़्वाब इक अजब मंज़र-ए-दिल-गीर नज़र आता है दूर से आलम-ए-तस्वीर नज़र आता है

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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मौत ने रात के पर्दे में किया कैसा वार रौशनी-ए-सुब्ह वतन की है कि मातम का ग़ुबार मा'रका सर्द है सोया है वतन का सरदार तनतना शे'र का बाक़ी नहीं सूना है कछार बेकसी छाती है तक़दीर फिरी जाती है क़ौम के हाथ से तलवार गिरी जाती है उठ गया दौलत-ए-नामूस-ए-वतन का वारिस क़ौम मरहूम के एज़ाज़-ए-कुहन का वारिस जाँ-निसार-ए-अज़ली शेर-ए-दकन का वारिस पेशवाओं के गरजते हुए रन का वारिस थी समाई हुई पूना की बहार आँखों में आख़िरी दौर का बाक़ी था ख़ुमार आँखों में मौत महाराष्ट्र की थी या तिरी मरने की ख़बर मुर्दनी छा गई इंसान तो क्या पत्थर पर पत्तियाँ झुक गईं मुरझा गए सहरा के शजर रह गए जोश में बहते हुए दरिया थम कर सर्द-ओ-शादाब हवा रुक गई कोहसारों की रौशनी घट गई दो-चार घड़ी तारों की था निगहबान-ए-वतन दबदबा-ए-आम तिरा न डिगें पाँव पे था क़ौम को पैग़ाम दिल रक़ीबों के लरज़ते थे ये था काम तेरा नींद से चौंक पड़े सुन जो लिया नाम तेरा याद कर के तुझे मज़लूम-ए-वतन रोएँगे बंदा-ए-रस्म-ए-जफ़ा चैन से अब सोएँगे ज़िंदगी तेरी बहार चमनिस्तान-ए-वफ़ा आबरू तेरे लिए क़ौम से पैमान-ए-वफ़ा आशिक़-ए-नाम-ए-वतन कुश्ता-ए-अरमान-ए-वफ़ा मर्द-ए-मैदान-ए-वफ़ा जिस्म-ए-वफ़ा जान-ए-वफ़ा हो गई नज़्र-ए-वतन हस्ती-ए-फ़ानी तेरी न तो पीरी रही तेरी न जवानी तेरी औज-ए-हिम्मत पे रहा तेरी वफ़ा का ख़ुर्शेद मौत के ख़ौफ़ पे ग़ालिब रही ख़िदमत की उमेद बन गया क़ैद का फ़रमान भी राहत की नवेद हुए तारीकी-ए-ज़िंदाँ में तिरे बाल सपेद फिर रहा है मिरी नज़रों में सरापा तेरा आह-ओ-क़ैद-ए-सितम और बुढ़ापा तेरा मो'जिज़ा अश्क-ए-मोहब्बत का दिखाया तू ने एक क़तरा से ये तूफ़ान उठाया तू ने मुल्क को हस्ती-ए-बेदार बनाया तू ने जज़्बा-ए-क़ौम को जादू को जगाया तू ने इक तड़प आ गई सोते हुए अरमानों में बिजलियाँ कौंद गईं क़ौम के वीरानों में लाश को तेरी सँवारें न रफ़ीक़ान-ए-कुहन हो जबीं के लिए संदल की जगह ख़ाक-ए-वतन तर हुआ है जो शहीदों के लहू से दामन दें उसी का तुझे पंजाब के मज़लूम कफ़न शोर-ए-मातम न हो झंकार हो ज़ंजीरों की चाहिए क़ौम के भीषम को चिता तीरों की

Chakbast Brij Narayan

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दर्द है दिल के लिए और दिल इंसाँ के लिए ताज़गी बर्ग-ओ-समर की चमनिस्ताँ के लिए साज़-ए-आहंग-ए-जुनूँ तार-ए-रग-ए-जाँ के लिए बे-ख़ुदी शौक़ की बे-सर-ओ-सामाँ के लिए क्या कहूँ कौन हवा सर में भरी रहती है बे पिए आठ-पहर बे-ख़बरी रहती है न हूँ शाइ'र न वली हूँ न हूँ एजाज़-ए-बयाँ बज़्म-ए-क़ुदरत में हूँ तस्वीर की सूरत हैराँ दिल में इक रंग है लफ़्ज़ों से जो होता है अयाँ लय की मुहताज नहीं है मिरी फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ शौक़-ए-शोहरत हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार नहीं दिल वो यूसुफ़ है जिसे फ़िक्र-ए-ख़रीदार नहीं और होंगे जिन्हें रहता है मुक़द्दर से गिला और होंगे जिन्हें मिलता नहीं मेहनत का सिला मैं ने जो ग़ैब की सरकार से माँगा वो मिला जो अक़ीदा था मिरे दिल का हिलाए न हिला क्यूँँ डराते हैं अबस गबरू मुसलमाँ मुझ को क्या मिटाएगी भला गर्दिश-ए-दौराँ मुझ को क्या ज़माना पे खुले बे-ख़बरी का मिरी राज़ ताइर-ए-फ़िक्र में पैदा तो हो इतनी परवाज़ क्यूँँ तबीअ'त को न हो बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पे नाज़ हज़रत-ए-अब्र के क़दमों पे है ये फ़र्क़-ए-नियाज़ फ़ख़्र है मुझ को उसी दर से शरफ़ पाने का मैं शराबी हूँ उसी रिंद के मयख़ाने का दिल मिरा दौलत-ए-दुनिया का तलबगार नहीं ब-ख़ुदा ख़ाक-नशीनी से मुझे आर नहीं मस्त हूँ हुब्ब-ए-वतन से कोई मय-ख़्वार नहीं मुझ को मग़रिब की नुमाइश से सरोकार नहीं अपने ही दिल का पियाला पिए मदहोश हूँ मैं झूटी पीता नहीं मग़रिब की वो मय-नोश हूँ मैं क़ौम के दर्द से हूँ सोज़-ए-वफ़ा की तस्वीर मेरी रग रग से है पैदा तप-ए-ग़म की तासीर है मगर आज नज़र में वो बहार-ए-दिल-गीर कर दिया दिल को फ़रिश्तों ने तरब के तस्ख़ीर ये नसीम-ए-सहरी आज ख़बर लाई है साल गुज़रा मिरे गुलशन में बहार आई है क़ौम में आठ बरस से है ये गुलशन शादाब चेहरा-ए-गुल पे यहाँ पास-ए-अदब की है नक़ाब मेरे आईना-ए-दिल में है फ़क़त इस का जवाब उस के काँटों पे किया मैं ने निसार अपना शबाब काम शबनम का लिया दीदा-ए-तर से अपने मैं ने सींचा है उसे ख़ून-ए-जिगर से अपने हर बरस रंग पे आता ही गया ये गुलज़ार फूल तहज़ीब के खिलते गए मिटते गए ख़ार पत्ती पत्ती से हुआ रंग-ए-वफ़ा का इज़हार नौजवानान-ए-चमन बन गए तस्वीर-ए-बहार रंग-ए-गुल देख के दिल क़ौम का दीवाना हुआ जो था बद-ख़्वाह-ए-चमन सब्ज़ा-ए-बेगाना हुआ बू-ए-नख़वत से नहीं याँ के गुलों को सरोकार है बुज़ुर्गों का अदब इन की जवानी का सिंगार इल्म-ओ-ईमाँ की तरावत का दिलों में है गुज़ार धो गए चश्मा-ए-अख़लाक़ से सीनों के ग़ुबार रंग दिखलाती है यूँँ दिल की सफ़ा यारों में रौशनी सुब्ह की जिस तरह हो गुलज़ारों में किस को मा'लूम थी इस गुलशन-ए-अख़्लाक़ की राह मैं ने फूलों को किया रंग-ए-वफ़ा से आगाह अब तो इस बाग़ पे है सब की मोहब्बत की निगाह जो कि पौदे थे शजर हो गए माशा-अल्लाह क्या कहूँ रंग-ए-जवानी में जो इस राग के थे बाग़बाँ हो गए गुलचीं जो मेरे बाग़ के थे गो कि बाक़ी नहीं कैफ़िय्यत-ए-तूफ़ान-ए-शबाब फँस के जंजाल में दुनिया के ये क़िस्सा हुआ ख़्वाब मस्त रहता है मगर अब भी दिल-ए-ख़ाना-ख़राब शाम को बैठ के महफ़िल में लुंढाता हूँ शराब नश्शा-ए-इल्म की उम्मीद पे जीने वाले सिमट आते हैं सर-ए-शाम से पीने वाले और ही रंग पे है आज बहार-ए-गुलशन सैर के वास्ते आए हैं अज़ीज़ान-ए-वतन फ़र्श आँखें किए बैठे हैं जवानान-ए-चमन दिल में तूफ़ान-ए-तरब लब पे मोहब्बत के सुख़न कौन है आज जो इस बज़्म में मसरूर नहीं रूह-ए-सरशार भी खिंच आए तो कुछ दूर नहीं मगर अफ़्सोस ये दुनिया है मक़ाम-ए-इबरत रंज की याद दिलाता है ख़याल-ए-राहत आज याद आती है उन फूलों की मुझ को सूरत खिलते ही कर गए जो मेरे चमन से रेहलत चश्म-ए-बद-दूर गुलों की ये भरी डाली है चंद फूलों की मगर इस में जगह ख़ाली है ये वो गुल थे जिन्हें अरबाब-ए-नज़र ने रोया भाई ने बहनों ने मादर ने पिदर ने रोया ख़ाक रोना था जो इस दीदा-ए-तर ने रोया मुद्दतों इन को मिरे क़ल्ब-ओ-जिगर ने रोया दिल के कुछ दाग़-ए-मोहब्बत हैं निशानी उन की बचपना देख के देखी न जवानी उन की ख़ैर दुनिया में कभी सोज़ है और कभी है साज़ नौनिहालान-ए-चमन की रहे अब उम्र दराज़ भाई से बढ़ के मुझे हैं ये मेरे माया-नाज़ मेरे मोनिस हैं यही और यही मेरे हमराज़ मर के भी रूह मिरी दिल की तरह शाद रहे मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे

Chakbast Brij Narayan

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फ़ैज़-ए-क़ुदरत से जो तक़दीर खुली आलम की साहिल-ए-हिन्द पे वहदत की तजल्ली चमकी मिट गई जहल की शब सुब्ह का तारा चमका आर्य-वर्त की क़िस्मत का सितारा चमका अहल-ए-दिल पर हुई कैफ़िय्यत-ए-इरफ़ाँ तारी जिन से दुनिया में हुईं दीन की नहरें जारी थीं खुली जल्वा-गह-ए-ख़ास में राहें उन की वाक़िफ़-ए-राज़-ए-हक़ीक़त थीं निगाहें उन की अर्श से उन के लिए नूर-ए-ख़ुदा आया था बंदा-ए-खास थे ऋषियों का लक़ब पाया था वेद उन के दिल-ए-हक़-केश की तस्वीरें हैं जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-माबूद की तफ़्सीरें हैं ऐन कसरत में ये वहदत का सबक़ वेद में है एक ही नूर है जो ज़र्रा ओ ख़ुरशेद में है जिस से इंसान में है जोश-ए-जवानी पैदा इसी जौहरस है मौजों में रवानी पैदा रंग गुलशन में फ़ज़ा दामन-ए-कोहसार में है ख़ूँ रग-ए-गुल में है नश्तर की ख़लिश ख़ार में है तमकनत हुस्न में है जोश है दीवाने में रौशनी शम्अ'' में है नूर है परवाने में रंग-ओ-बू हो के समाया वही गुलज़ारों में अब्र बन कर वही बरसा किया कोहसारों में शौक़ हो कर दिल-ए-मज्ज़ूब पे छाया है वही दर्द बन कर दिल-ए-शाइ'र में समाया है वही नूर-ए-ईमाँ से जो पैदा हो सफ़ा सीने में अक्स उस का नज़र आता है इस आईने में

Chakbast Brij Narayan

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ज़मीन हिन्द की रुत्बा में अर्श-ए-आ'ला है ये होम-रूल की उम्मीद का उजाला है मिसिज़-बेसेंट ने इस आरज़ू को पाला है फ़क़ीर क़ौम के हैं और ये राग माला है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले वतन-परस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगे हम अपनी आँख का सुर्मा उसे बनाएँगे ग़रीब माँ के लिए दर्द-दुख उठाएँगे यही पयाम-ए-वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले हमारे वास्ते ज़ंजीर-ओ-तौक़ गहना है वफ़ा के शौक़ में गाँधी ने जिस को पहना है समझ लिया कि हमें रंज-ओ-दर्द सहना है मगर ज़बाँ से कहेंगे वही जो कहना है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले पहनाने वाले अगर बेड़ियाँ पहनाएँगे ख़ुशी से क़ैद के गोशे को हम बसाएँगे जो संतरी दर-ए-ज़िंदाँ के भी सो जाएँगे ये राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले ज़बाँ को बंद किया है ये ग़ाफ़िलों को है नाज़ ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अंदाज़ रहेगा जान के हम-राह दिल का सोज़-ओ-गुदाज़ चिता से आएगी मरने के बा'द ये आवाज़ तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही दुआ है वतन के शिकस्ता हालों की यही उमंग जवानी के नौनिहालों की जो रहनुमा है मोहब्बत पे मिटने वालों की हमें क़सम है उसी के सपेद बालों की तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही पयाम है कोयल का बाग़ के अंदर इसी हवा में है गंगा का ज़ोर आठ-पहर हिलाल-ए-ईद ने दी है यही दिलों को ख़बर पुकारता है हिमाला से अब्र उठ उठ कर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले बसे हुए हैं मोहब्बत से जिन की क़ौम के घर वतन का पास है उन को सुहाग से बढ़ कर जो शीर-ख़ार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्त-ए-जिगर ये माँ के दूध से लिक्खा है उन के सीने पर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

Chakbast Brij Narayan

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लरज़ रहा था वतन जिस ख़याल के डर से वो आज ख़ून रुलाता है दीदा-ए-तर से सदा ये आती है फल फूल और पत्थर से ज़मीं पे ताज गिरा क़ौम-ए-हिन्द के सर से हबीब क़ौम का दुनिया से यूँँ रवाना हुआ ज़मीं उलट गई क्या मुंक़लिब ज़माना हुआ बढ़ी हुई थी नहूसत ज़वाल-ए-पैहम की तिरे ज़ुहूर से तक़दीर क़ौम की चमकी निगाह-ए-यास थी हिंदुस्ताँ पे आलम की अजीब शय थी मगर रौशनी तिरे दम की तुझी को मुल्क में रौशन दिमाग़ समझे थे तुझे ग़रीब के घर का चराग़ समझे थे वतन को तू ने सँवारा किस आब-ओ-ताब के साथ सहर का नूर बढ़े जैसे आफ़्ताब के साथ चुने रिफ़ाह के गुल हुस्न-ए-इंतिख़ाब के साथ शबाब क़ौम का चमका तिरे शबाब के साथ जो आज नश्व-ओ-नुमा का नया ज़माना है ये इंक़लाब तिरी उम्र का फ़साना है रहा मिज़ाज में सौदा-ए-क़ौम ख़ू हो कर वतन का इश्क़ रहा दिल की आरज़ू हो कर बदन में जान रही वक़्फ़-ए-आबरू हो कर रगों में जोश-ए-मोहब्बत रहे लहू हो हो कर ख़ुदा के हुक्म से जब आब-ओ-गिल बना तेरा किसी शहीद की मिट्टी से दिल बना तेरा वतन की जान पे क्या क्या तबाहियाँ आईं उमँड उमँड के जिहालत की बदलियाँ आईं चराग़-ए-अम्न बुझाने को आँधियाँ आईं दिलों में आग लगाने को बिजलियाँ आईं इस इंतिशार में जिस नूर का सहारा था उफ़ुक़ पे क़ौम के वो एक ही सितारा था हदीस-ए-क़ौम बनी थी तिरी ज़बाँ के लिए ज़बाँ मिली थी मोहब्बत की दास्ताँ के लिए ख़ुदा ने तुझ को पयम्बर किया यहाँ के लिए कि तेरे हाथ में नाक़ूस था अज़ाँ के लिए वतन की ख़ाक तिरी बारगाह-ए-आला' है हमें यही नई मस्जिद नया शिवाला है ग़रीब हिन्द ने तन्हा नहीं ये दाग़ सहा वतन से दूर भी तूफ़ान रंज-ओ-ग़म का उठा हबीब क्या हैं हरीफ़ों ने ये ज़बाँ से कहा सफ़ीर-ए-क़ौम जिगर-बंद-ए-सल्तनत न रहा पयाम शह ने दिया रस्म-ए-ताज़ियत के लिए कि तू सुतून था ऐवान-ए-सल्तनत के लिए दिलों में नक़्श हैं अब तक तिरी ज़बाँ के सुख़न हमारी राह में गोया चराग़ हैं रौशन फ़क़ीर थे जो तिरे दर के ख़ादिमान-ए-वतन उन्हें नसीब कहाँ होगा अब तिरा दामन तिरे अलम में वो इस तरह जान खोते हैं कि जैसे बाप से छुट कर यतीम रोते हैं अजल के दाम में आना है यूँँ तो आलम को मगर ये दिल नहीं तय्यार तेरे मातम को पहाड़ कहते हैं दुनिया में ऐसे ही ग़म को मिटा के तुझ को अजल ने मिटा दिया हम को जनाज़ा हिन्द का दर से तिरे निकलता है सुहाग क़ौम का तेरी चिता में जलता है रहेगा रंज ज़माने में यादगार तिरा वो कौन दिल है कि जिस में नहीं मज़ार तिरा जो कल रक़ीब था है आज सोगवार तिरा ख़ुदा के सामने है मुल्क शर्मसार तिरा पली है क़ौम तिरे साया-ए-करम के तले हमें नसीब थी जन्नत तिरे क़दम के तले

Chakbast Brij Narayan

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