"ज़िंदगी है क्या" बे-मन उम्र गुजारना ज़िंदगी है क्या रोज़ टूट कर बिखरना ज़िंदगी है क्या हम को रोज़ आकार हर कोई जीने लगता है और उस का आकार चले जाना ज़िंदगी है क्या ज़िंदगी कितना और सीखना है मुझ पर ये तेरा सितम ढाना ज़िंदगी है क्या दो वक़्त की रोटी के ख़ातिर हर दर पर हाथ फैलाना ज़िंदगी है क्या अगर तुम रखते हो ज़रूरी डिग्री-याफ़्ता तो एक भली नौकरी को तरसना ज़िंदगी है क्या मुसलसल ख़्वाबों के लिए जगना और उन ख़्वाबों का टूटना ज़िंदगी है क्या कुछ नए तजरबे सीखने के ख़ातिर अंगारों पे यूँँ रोज़ चलना ज़िंदगी है क्या जवानी के इस सुहाने सफ़र पर मोहब्बत के लिए दर बदर भटकना ज़िंदगी है क्या ये मसअला समझ आया ही नहीं चोट खाना और फिर सँभालना ज़िंदगी है क्या एक दो नंबरों के खेल में ख़ुद को तबाह करना ज़िंदगी है क्या जितना कम हुआ नंबरों का अंतर उतना नौकरी से दूर जाना ज़िंदगी है क्या गाँव से शहर आया था एक सुलझा लड़का उस का यहाँ उलझ कर रहना ज़िंदगी है क्या
Related Nazm
"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं
Divya 'Kumar Sahab'
27 likes
"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
14 likes
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
42 likes
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
73 likes
More from Lalit Mohan Joshi
हुक्मरान लूटा है मुफ़्लिसी भूख ने मेरे देश को लूटा है इन अमीरों ने मेरे देश को और डंके की चोट पर कहता हूँ मैं बदलते हुक्मरानों ने लूटा है मेरे देश को रोते बच्चे के हाथ में जैसे देते हैं खिलौना वैसे ये हुक्मरान चुप कराते हैं मेरे देश को कैसे कैसे प्रलोभन से अपने कुकर्म छुपाते हैं ये हुक्मरान ऐसे बहलाते फुसलाते हैं मेरे देश को झूठ इन के बिकते हैं सर-ए-बाज़ार में इस बाज़ार का हर दुकानदार डराता है मेरे को चुप हैं लब सी गए हैं ग़लत है सो ये ज़ख़्म पे ज़ख़्म देते हैं मेरे देश को सुना है चुनावी समय है चलो कुछ करते हैं सबब बताते हैं उन को जो आँख दिखाते हैं मेरे देश को
Lalit Mohan Joshi
3 likes
"अश्क" अश्क तेरे हों या मेरे अश्क अश्क होते हैं अश्क का कोई न मज़हब होता है न कोई जात होती है अश्क अश्क होते हैं कभी ये सँभालते हैं तो कभी बिगाड़ते हैं ज़िंदा हैं तो अश्क हैं है बा'द मौत के भी अश्क शजर के अपने अश्क हैं शाख के भी अपने अश्क हैं फूल के अपने अश्क हैं कली के भी अपने अश्क हैं आँख के अपने अश्क हैं ज़ेहन के अपने अश्क हैं लब के अपने अश्क हैं दिल के भी कुछ अश्क हैं दरिया के अपने अश्क हैं समुंदर के अपने अश्क हैं माशूका के अपने अश्क हैं माशूक के अपने अश्क हैं राह चलते राही के अश्क हैं तवायफ़ के अपने अश्क हैं ज़ख़्म के अपने अश्क हैं तो मरहम के अपने अश्क हैं वफ़ा के अपने अश्क हैं बे-वफ़ा के भी अपने अश्क हैं मुफ़्लिसी के अपने अश्क हैं अमीरी के अपने अश्क हैं बिना बाम-ओ-दीवार के अश्क हैं तो बाम-ओ-दीवार में भी अश्क हैं बचपन के थोड़े अश्क हैं जवानी में ज़ियादा अश्क हैं बुढ़ापे तो अश्कों का अश्क हैं ज़रूरी नहीं ग़म के अश्क हैं ख़ुशी के अपने अश्क हैं
Lalit Mohan Joshi
3 likes
नज़्म - वो क्या है उस की आँखें कैसी हैं उस की आँखें रब सी हैं उस की बातें कैसी हैं उस की बातें रौनक़ हैं उस की यादें कैसी हैं मेरी रातों जैसी हैं उस की यादें हिज्र है क्या ये फ़क़त बेकार किस ने बोली है उस का चेहरा कैसा है उस का चेहरा चाँद सा है उस की ज़ुल्फ़ें कैसी है उस की ज़ुल्फ़ें क़ाएनात है उस का साथ चलना क्या है मेरा आगे और आगे बढ़ना है उस की बिंदिया कैसी है माथे पर चाँद जैसी है उस का बोलना कैसा है सारे फ़ज़ा में फ़क़त प्यार ही घोलना है बाग़ में उस का होना कैसा है सारे फूलों को बस खिलना है उस सेे मुहब्बत किस को है उस सेे मुहब्बत सब को है जिस को उस ने चाहा है उस का मुक़द्दर रब ने लिक्खा है मेरी ग़ज़लें मेरी नज़्में क्या है उन के सारे हर्फ़ और सारे मिसरे उस पर है मेरी ग़ज़ल का मतला क्या है उस का चेहरा है शे'र के मिसरे क्या हैं उस की दो आँखें हैं ग़ज़ल का क़ाफ़िया क्या है क़ाफ़िया उस के लब हैं तो रदीफ़ क्या है वो उस की सुंदरता है बताओ फिर मक़्ता क्या है वो उस का दिल है उसपर क्या क्या जँचता है उस पर साड़ी सूट सब जँचता है उस के गाल में पड़ता वो गड्ढा देखो मुझ को दीवाना करता है उस का हुस्न तो है बहुत सुंदर रूह में उस के रब बसता है
Lalit Mohan Joshi
4 likes
पसीना बहाता चल पसीना अपने माथे से बहाता चल गीत अपनी जीत के यूँँ गाता चल मंज़िल परखती है तो परखने दे फिर भी रोज़ नया क़दम बढ़ाता चल वक़्त देगा अपने हिसाब से मगर हर रोज़ नई ग़ज़लें सुनाता चल बहर बे-बहर सब को भूल पहले तो ख़यालों के साथ ख़ुद को बहाता चल महफ़िल आज तेरे हक़ में नहीं है तो क्या मगर तू अपने दिलकश नज़ारे सुनाता चल आँधियों ने रास्ता कब किस का रोका है तू बस इनको अपना ठेंगा दिखाता चल सुब्ह इक रोज़ दर्द से तड़पा था मगर माँ की दुआ को यादकर ख़ुद को जगाता चल हिंदू मुस्लिम मंदिर मस्जिद क्या रक्खा है तू बस बेहतर ख़ुद को इंसान बनाता चल ख़ुदा ने क्यूँ भेजा है तुझ को यहाँ पता है तू भी ख़ुद को बस बेहतर इंसान बनाता चल
Lalit Mohan Joshi
4 likes
"इक लड़की" ये पूरी दुनिया बहुत अच्छी लगती है जब वो लड़की रस्ता मेरा तकती है फिर ये दुनिया सारी अपनी लगती है जब प्यार से बाहों में वो लड़की भरती है और ये सारी दुनिया एक तरफ़ है या'नी बाक़ी एक तरफ़ वो लड़की है चेहरे की उस की मासूम वो हँसी जैसे मुझ को जीवन नया अता करती है फिर मुझ अधूरे से लड़के को साथ आ कर मेरे वो पूरा करती है सारे ख़्वाब भी पूरे होने लगते हैं जब मेरे साथ वो लड़की रहती है सच पूछो तो वो लड़की इस नादान लड़के को आ कर नादान से वो समझदार करती है उस प्यारी सी लड़की को मैं क्या कहूँ मेरी हर ग़ज़ल को वो मुकम्मल करती है वो लड़की मेरी ग़ज़ल के मतले से शुरू होकर शे'र क़ाफ़िया रदीफ़ से होकर मक़्ते पर रुकती है वो लड़की कभी बहर में तो कभी बिना बहर के भी ख़ूब-सूरत लगती है साथ में उस के चार क़दम बस चल पाऊँ मेरी ख़ुदा से बस यही दुआ रहती है
Lalit Mohan Joshi
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Lalit Mohan Joshi.
Similar Moods
More moods that pair well with Lalit Mohan Joshi's nazm.







