भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
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"मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता था" मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता था और उस ज़ीने से ख़्वाबों का जो लहराता हुआ जाता था छत तक वो छत जहाँ से आसमाँ नज़दीक था जहाँ आराम फ़रमाती थीं आँखें वो आँखें जिन में सपने थे वो सपने जिन में दुनिया थी वो दुनिया जिस में सब कुछ था वही छत जहाँ पर एक चिड़िया की सुरीली चहचहाहट थी पतंगों की सजावट थी फ़लक की झिलमिलाहट थी मगर अफ़सोस वो चिड़िया जो सवेरे घर में सब सेे पहले उठती थी किसे मा'लूम था इक दिन वो ज़ेर-ए-दाम आएगी पतंग-ए-काग़ज़ी जो आसमाँ छूने ही वाली थी किसे मा'लूम था वो लौट कर नाकाम आएगी फ़लक जिस पर तमन्नाओं के कितने चाँद रौशन थे किसे मा'लूम था उस पर अमावस की भी कोई शाम आएगी वो छत जो घर का सब सेे पुर-सुकूँ और प्यारा हिस्सा थी किसे मा'लूम था वो ख़ुद-कुशी के काम आएगी
Charagh Sharma
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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"वजहें" सुनो! जाने से ऐतराज़ नहीं मुझे पर जाओ, तो लौट आने की वजहें छोड़ जाना आज न सही कल सुलझ जाएंगी क्या सही है इन्हें खींच कर तोड़ देना? या बेहतर है गिरहें रहने देना और वक़्त पर छोड़ देना अदद राब्तों में लाज़िम हैं रुस्वाइयाँ भी जब मनाये कोई तो और रूठना जिरह करना फिर मान जाना बात बिगड़ जाती है चुप रहने से भी सब चुप-चाप सहने से भी कहना कह देना कहने देना ख़ामोशियों के भरोसे मत रहना अब जाओ पर लौट आने की वजहें छोड़ जाना
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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ख़ौफ़-ए-आफ़त से कहाँ दिल में रिया आएगी बात सच्ची है जो वो लब पे सदा आएगी दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी मैं उठा लूँगा बड़े शौक़ से उस को सर पर ख़िदमत-ए-क़ौम-ओ-वतन में जो बला आएगी सामना सब्र ओ शुजाअत से करूँँगा मैं भी खिंच के मुझ तक जो कभी तेग़-ए-जफ़ा आएगी ग़ैर ज़ोम और ख़ुदी से जो करेगा हमला मेरी इमदाद को ख़ुद ज़ात-ए-ख़ुदा आएगी आत्मा हूँ मैं बदल डालूँगा फ़ौरन चोला क्या बिगाड़ेगी अगर मेरी क़ज़ा आएगी ख़ून रोएगी समा पर मेरे मरने पे शफ़क़ ग़म मनाने के लिए काली घटा आएगी अब्र-ए-तर अश्क बहाएगा मिरे लाशे पर ख़ाक उड़ाने के लिए बाद-ए-सबा आएगी ज़िंदगानी में तो मिलने से झिझकती है 'फ़लक' ख़ल्क़ को याद मिरी ब'अद-ए-फ़ना आएगी
Lal Chand Falak
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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ख़ौफ़-ए-आफ़त से कहाँ दिल में रिया आएगी बात सच्ची है जो वो लब पे सदा आएगी दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी मैं उठा लूँगा बड़े शौक़ से उस को सर पर ख़िदमत-ए-क़ौम-ओ-वतन में जो बला आएगी सामना सब्र ओ शुजाअत से करूँँगा मैं भी खिंच के मुझ तक जो कभी तेग़-ए-जफ़ा आएगी ग़ैर ज़ोम और ख़ुदी से जो करेगा हमला मेरी इमदाद को ख़ुद ज़ात-ए-ख़ुदा आएगी आत्मा हूँ मैं बदल डालूँगा फ़ौरन चोला क्या बिगाड़ेगी अगर मेरी क़ज़ा आएगी ख़ून रोएगी समा पर मेरे मरने पे शफ़क़ ग़म मनाने के लिए काली घटा आएगी अब्र-ए-तर अश्क बहाएगा मिरे लाशे पर ख़ाक उड़ाने के लिए बाद-ए-सबा आएगी ज़िंदगानी में तो मिलने से झिझकती है 'फ़लक' ख़ल्क़ को याद मिरी ब'अद-ए-फ़ना आएगी
Lal Chand Falak
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