रहम-ए-मादर से निकलना मिरा बे-सूद हुआ आज भी क़ैद हूँ मैं हुक्म-ए-मादर को मैं तब्दील करूँँ माँ की नफ़रत भरी आँखों से कहीं दूर चला जाऊँ मैं बे-नियाज़ी से फिरूँ पाप के काँटे चुन कर रूह नापाक करूँँ गीत शहवत के हवस के सुन कर ज़ेहन बे-बाक करूँँ ऐसे जीवन की है हसरत अब तक प्यार... सब कहते हैं वो प्यार मुझे करती है प्यार की राख तले सोया पड़ा हूँ कब से झूट कहते हैं मैं बेज़ार हुआ हूँ सब से फिर लपक उट्ठेगा वो शो'ला, पुर-उम्मीद हूँ मैं प्यार की राख तले दब के है जो दूद हुआ
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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए
Dharmesh bashar
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"आदम" मैं ख़ुदा का तराशा हुआ आदम हूँ तू मुझ सेे निकली हुई जान कोई मैं तेरी ख़ातिर जन्नत से निकला हूँ तू जो करती नहीं इब्लीस से बात कोई मैं बर्रे सगीर में भटकता फिरा हूँ तू वही जो निकली नहीं अरब से बाहर कोई
ALI ZUHRI
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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को
Allama Iqbal
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ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर सुलगता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है दिल मिरा आज भी अफ़्सुर्दा उदास दिल बदलता ही नहीं रास्ते रोज़ बदल लेते हैं रूप रास्ते फ़ैज़ की शाहराह की तरह चूर निढाल और पतझड़ में बिखरते हुए पत्तों की तरह लोग ही लोग हैं जिस ओर नज़र जाती है रोग ही रोग हैं जिस ओर नज़र जाती है फिर भटकता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है गरचे ये ख़ौफ़ कि दीवाना कहेगी दुनिया गरचे ये डर कि मैं सच-मुच ही न पागल हो जाऊँ फिर भी ग़म खाने की फ़ुर्सत तो निकल आती है अपने गुन गाने की आदत ही नहीं जाती है दूर जाते हुए लम्हों की सदा गालियाँ मुझ को दिए जाती है इस से पहले भी जुनूँ था लेकिन अब के इस तौर से बिखरे हैं हवा से कोई तरतीब नहीं ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है ज़िंदगी मेरी धुएँ की सूरत फैलती और बिखर जाती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर मैं मरता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है
Zahid Dar
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मैं ने लोगों से भला क्या सीखा यही अल्फ़ाज़ में झूटी सच्ची बात से बात मिलाना दिल की बे-यक़ीनी को छुपाना सर को हर ग़बी कुंद-ज़ेहन शख़्स की ख़िदमत में झुकाना हँसना मुस्कुराते हुए कहना साहब ज़िंदगी करने का फ़न आप से बेहतर तो यहाँ कोई नहीं जानता है गुफ़्तुगू कितनी भी मजहूल हो माथा हमवार कान बेदार रहें आँखें निहायत गहरी सोच में डूबी हुई फ़लसफ़ी ऐसे किताबी या ज़बानी मानो उस से पहले कभी इंसान ने देखे ने सुने उन को बतला दो यही बात वगर्ना इक दिन ओ रूह दिन भी बहुत दूर नहीं तुम नहीं आओगे ये लोग कहेंगे जाहिल बात करने का सलीक़ा ही नहीं जानता है क्या तुम्हें ख़ौफ़ नहीं आता है ख़ौफ़ आता है कि लोगों की नज़र से गिर कर हाज़रा दौर में इक शख़्स जिए तो कैसे शहर में लाखों की आबादी में एक भी ऐसा नहीं जिस का ईमान किसी ऐसे वजूद ऐसी हस्ती या हक़ीक़त या हिकायत पर हो जिस तक हाज़रा दौर के जिब्रईल की या'नी अख़बार दस्तरस न हो रसाई न हो मैं ने लोगों से भला क्या सीखा बुज़दिली और जहालत की फ़ज़ा में जीना दाइमी ख़ौफ़ में रहना कहना सब बराबर हैं हुजूम जिस तरफ़ जाए वही रस्ता है मैं ने लोगों से भला क्या सीखा
Zahid Dar
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ख़ूब-सूरत है ज़मीं धूप में चमके हुए इस शहर में ज़िंदगी दिलचस्प है अक़्ल की बातें जहन्नम की धदकती आग हैं उन से हम वाक़िफ़ नहीं अम्न है और नींद है और ख़्वाब हैं अपनी ही लज़्ज़त में गुम जिस्म हैं दोस्तों से दूर हंगामों में मैं खोया हुआ पुर-सुकून आह कितनी ख़ूब-सूरत है ज़मीन धूप में चमके हुए इस शहर में ज़िंदगी दिलचस्प है
Zahid Dar
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जिस दिन मेरे देस की मिट्टी कोमल मिट्टी पत्थर बन कर महलों और क़िलओं के रूप में ढल जाएगी उस दिन गंदुम जल जाएगी जिस दिन मेरे देस के दरियाओं का पानी ठंडा पानी बिजली बन कर शहरों की काली रातों की ज़ीनत का सामान बनेगा उस दिन चाँद पिघल जाएगा जिस दिन मेरे देस की हल्की तेज़ हवाएँ इंसानों के ख़ून से भर जाएँगी जिस दिन खेतों की ख़ामोशी बोझल धात की आवाज़ों में खो जाएगी उस दिन सूरज बुझ जाएगा जीवन की पगडंडी उस दिन सो जाएगी
Zahid Dar
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गहरे शहरों में रहने से वुसअ'त का एहसास मिटा ला-महदूद ख़लाओं की ख़ामोशी का ख़ौफ़ मिटा अब आराम है जंगल का जादू और हवाओं का संगीत नहीं तो क्या है अब आराम कि अब अज्ञान के पैदा-कर्दा हाथ नहीं ज़ालिम हाथ कि जिन हाथों में हाथ दिए मज़हब के वीरानों में मैं मारा मारा फिरता था अब आराम समुंदर की आवाज़ नहीं तो क्या है उस बस्ती की सब गलियों में चलने की आज़ादी है उस बस्ती की गलियों के नामों में नेकी और बदी के नाम नहीं सीधे-सादे नाम हैं जैसे लालच ग़ुस्सा भूक मोहब्बत नफ़रत सब गलियों में चलने की आज़ादी है शहर नहीं हैं चारों जानिब शोर ही शोर है क्या है गहरे शहरों में रहने से अज़्मत का एहसास मिटा लम्बे हमलों पर जाने का क़ुदरत से टकराने का अरमान मिटा अब आराम है शहरों में इंसान मिटा
Zahid Dar
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