जिस दिन मेरे देस की मिट्टी कोमल मिट्टी पत्थर बन कर महलों और क़िलओं के रूप में ढल जाएगी उस दिन गंदुम जल जाएगी जिस दिन मेरे देस के दरियाओं का पानी ठंडा पानी बिजली बन कर शहरों की काली रातों की ज़ीनत का सामान बनेगा उस दिन चाँद पिघल जाएगा जिस दिन मेरे देस की हल्की तेज़ हवाएँ इंसानों के ख़ून से भर जाएँगी जिस दिन खेतों की ख़ामोशी बोझल धात की आवाज़ों में खो जाएगी उस दिन सूरज बुझ जाएगा जीवन की पगडंडी उस दिन सो जाएगी
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
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ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर सुलगता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है दिल मिरा आज भी अफ़्सुर्दा उदास दिल बदलता ही नहीं रास्ते रोज़ बदल लेते हैं रूप रास्ते फ़ैज़ की शाहराह की तरह चूर निढाल और पतझड़ में बिखरते हुए पत्तों की तरह लोग ही लोग हैं जिस ओर नज़र जाती है रोग ही रोग हैं जिस ओर नज़र जाती है फिर भटकता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है गरचे ये ख़ौफ़ कि दीवाना कहेगी दुनिया गरचे ये डर कि मैं सच-मुच ही न पागल हो जाऊँ फिर भी ग़म खाने की फ़ुर्सत तो निकल आती है अपने गुन गाने की आदत ही नहीं जाती है दूर जाते हुए लम्हों की सदा गालियाँ मुझ को दिए जाती है इस से पहले भी जुनूँ था लेकिन अब के इस तौर से बिखरे हैं हवा से कोई तरतीब नहीं ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है ज़िंदगी मेरी धुएँ की सूरत फैलती और बिखर जाती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर मैं मरता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है
Zahid Dar
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मैं ने लोगों से भला क्या सीखा यही अल्फ़ाज़ में झूटी सच्ची बात से बात मिलाना दिल की बे-यक़ीनी को छुपाना सर को हर ग़बी कुंद-ज़ेहन शख़्स की ख़िदमत में झुकाना हँसना मुस्कुराते हुए कहना साहब ज़िंदगी करने का फ़न आप से बेहतर तो यहाँ कोई नहीं जानता है गुफ़्तुगू कितनी भी मजहूल हो माथा हमवार कान बेदार रहें आँखें निहायत गहरी सोच में डूबी हुई फ़लसफ़ी ऐसे किताबी या ज़बानी मानो उस से पहले कभी इंसान ने देखे ने सुने उन को बतला दो यही बात वगर्ना इक दिन ओ रूह दिन भी बहुत दूर नहीं तुम नहीं आओगे ये लोग कहेंगे जाहिल बात करने का सलीक़ा ही नहीं जानता है क्या तुम्हें ख़ौफ़ नहीं आता है ख़ौफ़ आता है कि लोगों की नज़र से गिर कर हाज़रा दौर में इक शख़्स जिए तो कैसे शहर में लाखों की आबादी में एक भी ऐसा नहीं जिस का ईमान किसी ऐसे वजूद ऐसी हस्ती या हक़ीक़त या हिकायत पर हो जिस तक हाज़रा दौर के जिब्रईल की या'नी अख़बार दस्तरस न हो रसाई न हो मैं ने लोगों से भला क्या सीखा बुज़दिली और जहालत की फ़ज़ा में जीना दाइमी ख़ौफ़ में रहना कहना सब बराबर हैं हुजूम जिस तरफ़ जाए वही रस्ता है मैं ने लोगों से भला क्या सीखा
Zahid Dar
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जब बारिश बरसी लोग बहुत ही रोए हम मंदिर में जा सोए जब धूप खिली तो लोग बहुत ही रोए हम जंगल में जा सोए लोगों को ग़ुस्सा आया और हम को आन जगाया हम जागते हैं तुम सोते हो उल्लू के पट्ठे तुम तन्हा हो हम लोग इकट्ठे हम बूढे हैं तुम बच्चे तुम झूटे हो हम सच्चे यूँँ पाप है सोना जब धूप खिले या बारिश बरसे रोना जब बारिश बरसी धूप खिली हम रोए और नींद की दौलत मिट्टी में दफ़नाई फिर नींद के फूल खिले और नींद की ख़ुश्बू चारों और उड़ाई जब बारिश बरसी मंदिर में कुछ लोग मिले सब सोए जब धूप खिली तो जंगल में कुछ लोग मिले सोए फिर अपनी नादानी पर और दौलत की क़ुर्बानी पर हम ख़ूब हँसे हम इतना हँसे के रोए
Zahid Dar
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इन्ही सूखे हुए मैदानों में अब जहाँ धूप की लहरों के सिवा कुछ भी नहीं सब्ज़ लहराते हुए खेत हुआ करते थे लोग आबाद थे पेड़ों की घनी छाँव में महफ़िलें जमती थीं अफ़्साने सुने जाते थे आज वीरान मकानों में हवा चीख़ती है धूल में उड़ते किताबों के वरक़ किस की यादों के वरक़ किस के ख़यालों के वरक़ मुझ से कहते हैं कि रह जाओ यहीं और मैं सोचता हूँ सिर्फ़ अँधेरा है यहाँ फिर हवा आती है दीवानी हवा और कहती है: नहीं सिर्फ़ अँधेरा तो नहीं याद हैं मुझ को वो लम्हे जिन में लोग आज़ाद थे और ज़िंदा थे आओ मैं तुम को दिखाऊँ वो मक़ाम..... एक वीरान जगह ईंटों का अम्बार नहीं कुछ भी नहीं और वो कहती है ये प्यार का मरकज़ था कभी किस की याद आए मुझे किस की बताओ किस की! और अब चुप है हवा चुप है ज़मीं बोल ऐ वक़्त! कहाँ हैं वो लोग जिन को वो याद हैं जिन की यादें इन हवाओं में परेशान हैं आज
Zahid Dar
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पूरे कुँबे से नफ़रत या प्यार करो एक से नफ़रत एक से प्यार ये क्या है लोग सभी इक जैसे हैं जाहिल हैं तो सब जाहिल हैं आलिम हैं तो सब के सब ज़ुल्म किसी इक शख़्स से तो मख़्सूस नहीं है जिस को तुम ज़ालिम कहते हो वो भी बचपन में मा'सूम था ख़ुश्बू की मानिंद ज़रर से ख़ाली और जिस को विद्वान हो कहते उस का ज़ेहन कल तक चट्टे काग़ज़ जैसा निर्मल और बे-दाग़ था ज़ालिम ने उस कुँबे ही में ज़ुल्म की शिक्षा पाई और विद्वान ने भी ये उल्टी सीधी बातें लोगों ही से सुन कर ज़ेहन में भर रखी हैं ये लोगों का कुम्बा एक महान दरख़्त है हम सब पत्ते हैं हरे या सूखे मीठे हैं या कड़वे अपना क्या है पेड़ का रस हम सब में यकसाँ जारी-ओ-सारी है
Zahid Dar
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