nazmKuch Alfaaz

पूरे कुँबे से नफ़रत या प्यार करो एक से नफ़रत एक से प्यार ये क्या है लोग सभी इक जैसे हैं जाहिल हैं तो सब जाहिल हैं आलिम हैं तो सब के सब ज़ुल्म किसी इक शख़्स से तो मख़्सूस नहीं है जिस को तुम ज़ालिम कहते हो वो भी बचपन में मा'सूम था ख़ुश्बू की मानिंद ज़रर से ख़ाली और जिस को विद्वान हो कहते उस का ज़ेहन कल तक चट्टे काग़ज़ जैसा निर्मल और बे-दाग़ था ज़ालिम ने उस कुँबे ही में ज़ुल्म की शिक्षा पाई और विद्वान ने भी ये उल्टी सीधी बातें लोगों ही से सुन कर ज़ेहन में भर रखी हैं ये लोगों का कुम्बा एक महान दरख़्त है हम सब पत्ते हैं हरे या सूखे मीठे हैं या कड़वे अपना क्या है पेड़ का रस हम सब में यकसाँ जारी-ओ-सारी है

Zahid Dar0 Likes

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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जब बारिश बरसी लोग बहुत ही रोए हम मंदिर में जा सोए जब धूप खिली तो लोग बहुत ही रोए हम जंगल में जा सोए लोगों को ग़ुस्सा आया और हम को आन जगाया हम जागते हैं तुम सोते हो उल्लू के पट्ठे तुम तन्हा हो हम लोग इकट्ठे हम बूढे हैं तुम बच्चे तुम झूटे हो हम सच्चे यूँँ पाप है सोना जब धूप खिले या बारिश बरसे रोना जब बारिश बरसी धूप खिली हम रोए और नींद की दौलत मिट्टी में दफ़नाई फिर नींद के फूल खिले और नींद की ख़ुश्बू चारों और उड़ाई जब बारिश बरसी मंदिर में कुछ लोग मिले सब सोए जब धूप खिली तो जंगल में कुछ लोग मिले सोए फिर अपनी नादानी पर और दौलत की क़ुर्बानी पर हम ख़ूब हँसे हम इतना हँसे के रोए

Zahid Dar

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ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर सुलगता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है दिल मिरा आज भी अफ़्सुर्दा उदास दिल बदलता ही नहीं रास्ते रोज़ बदल लेते हैं रूप रास्ते फ़ैज़ की शाहराह की तरह चूर निढाल और पतझड़ में बिखरते हुए पत्तों की तरह लोग ही लोग हैं जिस ओर नज़र जाती है रोग ही रोग हैं जिस ओर नज़र जाती है फिर भटकता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है गरचे ये ख़ौफ़ कि दीवाना कहेगी दुनिया गरचे ये डर कि मैं सच-मुच ही न पागल हो जाऊँ फिर भी ग़म खाने की फ़ुर्सत तो निकल आती है अपने गुन गाने की आदत ही नहीं जाती है दूर जाते हुए लम्हों की सदा गालियाँ मुझ को दिए जाती है इस से पहले भी जुनूँ था लेकिन अब के इस तौर से बिखरे हैं हवा से कोई तरतीब नहीं ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है ज़िंदगी मेरी धुएँ की सूरत फैलती और बिखर जाती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर मैं मरता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है

Zahid Dar

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मैं ने लोगों से भला क्या सीखा यही अल्फ़ाज़ में झूटी सच्ची बात से बात मिलाना दिल की बे-यक़ीनी को छुपाना सर को हर ग़बी कुंद-ज़ेहन शख़्स की ख़िदमत में झुकाना हँसना मुस्कुराते हुए कहना साहब ज़िंदगी करने का फ़न आप से बेहतर तो यहाँ कोई नहीं जानता है गुफ़्तुगू कितनी भी मजहूल हो माथा हमवार कान बेदार रहें आँखें निहायत गहरी सोच में डूबी हुई फ़लसफ़ी ऐसे किताबी या ज़बानी मानो उस से पहले कभी इंसान ने देखे ने सुने उन को बतला दो यही बात वगर्ना इक दिन ओ रूह दिन भी बहुत दूर नहीं तुम नहीं आओगे ये लोग कहेंगे जाहिल बात करने का सलीक़ा ही नहीं जानता है क्या तुम्हें ख़ौफ़ नहीं आता है ख़ौफ़ आता है कि लोगों की नज़र से गिर कर हाज़रा दौर में इक शख़्स जिए तो कैसे शहर में लाखों की आबादी में एक भी ऐसा नहीं जिस का ईमान किसी ऐसे वजूद ऐसी हस्ती या हक़ीक़त या हिकायत पर हो जिस तक हाज़रा दौर के जिब्रईल की या'नी अख़बार दस्तरस न हो रसाई न हो मैं ने लोगों से भला क्या सीखा बुज़दिली और जहालत की फ़ज़ा में जीना दाइमी ख़ौफ़ में रहना कहना सब बराबर हैं हुजूम जिस तरफ़ जाए वही रस्ता है मैं ने लोगों से भला क्या सीखा

Zahid Dar

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जिस दिन मेरे देस की मिट्टी कोमल मिट्टी पत्थर बन कर महलों और क़िलओं के रूप में ढल जाएगी उस दिन गंदुम जल जाएगी जिस दिन मेरे देस के दरियाओं का पानी ठंडा पानी बिजली बन कर शहरों की काली रातों की ज़ीनत का सामान बनेगा उस दिन चाँद पिघल जाएगा जिस दिन मेरे देस की हल्की तेज़ हवाएँ इंसानों के ख़ून से भर जाएँगी जिस दिन खेतों की ख़ामोशी बोझल धात की आवाज़ों में खो जाएगी उस दिन सूरज बुझ जाएगा जीवन की पगडंडी उस दिन सो जाएगी

Zahid Dar

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गहरे शहरों में रहने से वुसअ'त का एहसास मिटा ला-महदूद ख़लाओं की ख़ामोशी का ख़ौफ़ मिटा अब आराम है जंगल का जादू और हवाओं का संगीत नहीं तो क्या है अब आराम कि अब अज्ञान के पैदा-कर्दा हाथ नहीं ज़ालिम हाथ कि जिन हाथों में हाथ दिए मज़हब के वीरानों में मैं मारा मारा फिरता था अब आराम समुंदर की आवाज़ नहीं तो क्या है उस बस्ती की सब गलियों में चलने की आज़ादी है उस बस्ती की गलियों के नामों में नेकी और बदी के नाम नहीं सीधे-सादे नाम हैं जैसे लालच ग़ुस्सा भूक मोहब्बत नफ़रत सब गलियों में चलने की आज़ादी है शहर नहीं हैं चारों जानिब शोर ही शोर है क्या है गहरे शहरों में रहने से अज़्मत का एहसास मिटा लम्बे हमलों पर जाने का क़ुदरत से टकराने का अरमान मिटा अब आराम है शहरों में इंसान मिटा

Zahid Dar

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