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जब बारिश बरसी लोग बहुत ही रोए हम मंदिर में जा सोए जब धूप खिली तो लोग बहुत ही रोए हम जंगल में जा सोए लोगों को ग़ुस्सा आया और हम को आन जगाया हम जागते हैं तुम सोते हो उल्लू के पट्ठे तुम तन्हा हो हम लोग इकट्ठे हम बूढे हैं तुम बच्चे तुम झूटे हो हम सच्चे यूँँ पाप है सोना जब धूप खिले या बारिश बरसे रोना जब बारिश बरसी धूप खिली हम रोए और नींद की दौलत मिट्टी में दफ़नाई फिर नींद के फूल खिले और नींद की ख़ुश्बू चारों और उड़ाई जब बारिश बरसी मंदिर में कुछ लोग मिले सब सोए जब धूप खिली तो जंगल में कुछ लोग मिले सोए फिर अपनी नादानी पर और दौलत की क़ुर्बानी पर हम ख़ूब हँसे हम इतना हँसे के रोए

Zahid Dar0 Likes

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे

Gorakh Pandey

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ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर सुलगता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है दिल मिरा आज भी अफ़्सुर्दा उदास दिल बदलता ही नहीं रास्ते रोज़ बदल लेते हैं रूप रास्ते फ़ैज़ की शाहराह की तरह चूर निढाल और पतझड़ में बिखरते हुए पत्तों की तरह लोग ही लोग हैं जिस ओर नज़र जाती है रोग ही रोग हैं जिस ओर नज़र जाती है फिर भटकता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है गरचे ये ख़ौफ़ कि दीवाना कहेगी दुनिया गरचे ये डर कि मैं सच-मुच ही न पागल हो जाऊँ फिर भी ग़म खाने की फ़ुर्सत तो निकल आती है अपने गुन गाने की आदत ही नहीं जाती है दूर जाते हुए लम्हों की सदा गालियाँ मुझ को दिए जाती है इस से पहले भी जुनूँ था लेकिन अब के इस तौर से बिखरे हैं हवा से कोई तरतीब नहीं ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है ज़िंदगी मेरी धुएँ की सूरत फैलती और बिखर जाती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर मैं मरता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है

Zahid Dar

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मैं ने लोगों से भला क्या सीखा यही अल्फ़ाज़ में झूटी सच्ची बात से बात मिलाना दिल की बे-यक़ीनी को छुपाना सर को हर ग़बी कुंद-ज़ेहन शख़्स की ख़िदमत में झुकाना हँसना मुस्कुराते हुए कहना साहब ज़िंदगी करने का फ़न आप से बेहतर तो यहाँ कोई नहीं जानता है गुफ़्तुगू कितनी भी मजहूल हो माथा हमवार कान बेदार रहें आँखें निहायत गहरी सोच में डूबी हुई फ़लसफ़ी ऐसे किताबी या ज़बानी मानो उस से पहले कभी इंसान ने देखे ने सुने उन को बतला दो यही बात वगर्ना इक दिन ओ रूह दिन भी बहुत दूर नहीं तुम नहीं आओगे ये लोग कहेंगे जाहिल बात करने का सलीक़ा ही नहीं जानता है क्या तुम्हें ख़ौफ़ नहीं आता है ख़ौफ़ आता है कि लोगों की नज़र से गिर कर हाज़रा दौर में इक शख़्स जिए तो कैसे शहर में लाखों की आबादी में एक भी ऐसा नहीं जिस का ईमान किसी ऐसे वजूद ऐसी हस्ती या हक़ीक़त या हिकायत पर हो जिस तक हाज़रा दौर के जिब्रईल की या'नी अख़बार दस्तरस न हो रसाई न हो मैं ने लोगों से भला क्या सीखा बुज़दिली और जहालत की फ़ज़ा में जीना दाइमी ख़ौफ़ में रहना कहना सब बराबर हैं हुजूम जिस तरफ़ जाए वही रस्ता है मैं ने लोगों से भला क्या सीखा

Zahid Dar

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ख़ूब-सूरत है ज़मीं धूप में चमके हुए इस शहर में ज़िंदगी दिलचस्प है अक़्ल की बातें जहन्नम की धदकती आग हैं उन से हम वाक़िफ़ नहीं अम्न है और नींद है और ख़्वाब हैं अपनी ही लज़्ज़त में गुम जिस्म हैं दोस्तों से दूर हंगामों में मैं खोया हुआ पुर-सुकून आह कितनी ख़ूब-सूरत है ज़मीन धूप में चमके हुए इस शहर में ज़िंदगी दिलचस्प है

Zahid Dar

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पूरे कुँबे से नफ़रत या प्यार करो एक से नफ़रत एक से प्यार ये क्या है लोग सभी इक जैसे हैं जाहिल हैं तो सब जाहिल हैं आलिम हैं तो सब के सब ज़ुल्म किसी इक शख़्स से तो मख़्सूस नहीं है जिस को तुम ज़ालिम कहते हो वो भी बचपन में मा'सूम था ख़ुश्बू की मानिंद ज़रर से ख़ाली और जिस को विद्वान हो कहते उस का ज़ेहन कल तक चट्टे काग़ज़ जैसा निर्मल और बे-दाग़ था ज़ालिम ने उस कुँबे ही में ज़ुल्म की शिक्षा पाई और विद्वान ने भी ये उल्टी सीधी बातें लोगों ही से सुन कर ज़ेहन में भर रखी हैं ये लोगों का कुम्बा एक महान दरख़्त है हम सब पत्ते हैं हरे या सूखे मीठे हैं या कड़वे अपना क्या है पेड़ का रस हम सब में यकसाँ जारी-ओ-सारी है

Zahid Dar

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जिस दिन मेरे देस की मिट्टी कोमल मिट्टी पत्थर बन कर महलों और क़िलओं के रूप में ढल जाएगी उस दिन गंदुम जल जाएगी जिस दिन मेरे देस के दरियाओं का पानी ठंडा पानी बिजली बन कर शहरों की काली रातों की ज़ीनत का सामान बनेगा उस दिन चाँद पिघल जाएगा जिस दिन मेरे देस की हल्की तेज़ हवाएँ इंसानों के ख़ून से भर जाएँगी जिस दिन खेतों की ख़ामोशी बोझल धात की आवाज़ों में खो जाएगी उस दिन सूरज बुझ जाएगा जीवन की पगडंडी उस दिन सो जाएगी

Zahid Dar

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