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ख़ूब-सूरत है ज़मीं धूप में चमके हुए इस शहर में ज़िंदगी दिलचस्प है अक़्ल की बातें जहन्नम की धदकती आग हैं उन से हम वाक़िफ़ नहीं अम्न है और नींद है और ख़्वाब हैं अपनी ही लज़्ज़त में गुम जिस्म हैं दोस्तों से दूर हंगामों में मैं खोया हुआ पुर-सुकून आह कितनी ख़ूब-सूरत है ज़मीन धूप में चमके हुए इस शहर में ज़िंदगी दिलचस्प है

Zahid Dar0 Likes

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर सुलगता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है दिल मिरा आज भी अफ़्सुर्दा उदास दिल बदलता ही नहीं रास्ते रोज़ बदल लेते हैं रूप रास्ते फ़ैज़ की शाहराह की तरह चूर निढाल और पतझड़ में बिखरते हुए पत्तों की तरह लोग ही लोग हैं जिस ओर नज़र जाती है रोग ही रोग हैं जिस ओर नज़र जाती है फिर भटकता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है गरचे ये ख़ौफ़ कि दीवाना कहेगी दुनिया गरचे ये डर कि मैं सच-मुच ही न पागल हो जाऊँ फिर भी ग़म खाने की फ़ुर्सत तो निकल आती है अपने गुन गाने की आदत ही नहीं जाती है दूर जाते हुए लम्हों की सदा गालियाँ मुझ को दिए जाती है इस से पहले भी जुनूँ था लेकिन अब के इस तौर से बिखरे हैं हवा से कोई तरतीब नहीं ऐसे लगता है कि सहरा है कोई दूर तक फैली हुई रेत को जब देखता हूँ मेरी आँखों में वही प्यास छलक आती है रूह की प्यास छलक आती है ज़िंदगी मेरी धुएँ की सूरत फैलती और बिखर जाती है फिर हवा वक़्त के हाथों में है तलवार की मानिंद रवाँ फिर मैं मरता हूँ फ़क़त मौत मुझे भाती है

Zahid Dar

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मैं ने लोगों से भला क्या सीखा यही अल्फ़ाज़ में झूटी सच्ची बात से बात मिलाना दिल की बे-यक़ीनी को छुपाना सर को हर ग़बी कुंद-ज़ेहन शख़्स की ख़िदमत में झुकाना हँसना मुस्कुराते हुए कहना साहब ज़िंदगी करने का फ़न आप से बेहतर तो यहाँ कोई नहीं जानता है गुफ़्तुगू कितनी भी मजहूल हो माथा हमवार कान बेदार रहें आँखें निहायत गहरी सोच में डूबी हुई फ़लसफ़ी ऐसे किताबी या ज़बानी मानो उस से पहले कभी इंसान ने देखे ने सुने उन को बतला दो यही बात वगर्ना इक दिन ओ रूह दिन भी बहुत दूर नहीं तुम नहीं आओगे ये लोग कहेंगे जाहिल बात करने का सलीक़ा ही नहीं जानता है क्या तुम्हें ख़ौफ़ नहीं आता है ख़ौफ़ आता है कि लोगों की नज़र से गिर कर हाज़रा दौर में इक शख़्स जिए तो कैसे शहर में लाखों की आबादी में एक भी ऐसा नहीं जिस का ईमान किसी ऐसे वजूद ऐसी हस्ती या हक़ीक़त या हिकायत पर हो जिस तक हाज़रा दौर के जिब्रईल की या'नी अख़बार दस्तरस न हो रसाई न हो मैं ने लोगों से भला क्या सीखा बुज़दिली और जहालत की फ़ज़ा में जीना दाइमी ख़ौफ़ में रहना कहना सब बराबर हैं हुजूम जिस तरफ़ जाए वही रस्ता है मैं ने लोगों से भला क्या सीखा

Zahid Dar

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जब बारिश बरसी लोग बहुत ही रोए हम मंदिर में जा सोए जब धूप खिली तो लोग बहुत ही रोए हम जंगल में जा सोए लोगों को ग़ुस्सा आया और हम को आन जगाया हम जागते हैं तुम सोते हो उल्लू के पट्ठे तुम तन्हा हो हम लोग इकट्ठे हम बूढे हैं तुम बच्चे तुम झूटे हो हम सच्चे यूँँ पाप है सोना जब धूप खिले या बारिश बरसे रोना जब बारिश बरसी धूप खिली हम रोए और नींद की दौलत मिट्टी में दफ़नाई फिर नींद के फूल खिले और नींद की ख़ुश्बू चारों और उड़ाई जब बारिश बरसी मंदिर में कुछ लोग मिले सब सोए जब धूप खिली तो जंगल में कुछ लोग मिले सोए फिर अपनी नादानी पर और दौलत की क़ुर्बानी पर हम ख़ूब हँसे हम इतना हँसे के रोए

Zahid Dar

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जिस दिन मेरे देस की मिट्टी कोमल मिट्टी पत्थर बन कर महलों और क़िलओं के रूप में ढल जाएगी उस दिन गंदुम जल जाएगी जिस दिन मेरे देस के दरियाओं का पानी ठंडा पानी बिजली बन कर शहरों की काली रातों की ज़ीनत का सामान बनेगा उस दिन चाँद पिघल जाएगा जिस दिन मेरे देस की हल्की तेज़ हवाएँ इंसानों के ख़ून से भर जाएँगी जिस दिन खेतों की ख़ामोशी बोझल धात की आवाज़ों में खो जाएगी उस दिन सूरज बुझ जाएगा जीवन की पगडंडी उस दिन सो जाएगी

Zahid Dar

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गहरे शहरों में रहने से वुसअ'त का एहसास मिटा ला-महदूद ख़लाओं की ख़ामोशी का ख़ौफ़ मिटा अब आराम है जंगल का जादू और हवाओं का संगीत नहीं तो क्या है अब आराम कि अब अज्ञान के पैदा-कर्दा हाथ नहीं ज़ालिम हाथ कि जिन हाथों में हाथ दिए मज़हब के वीरानों में मैं मारा मारा फिरता था अब आराम समुंदर की आवाज़ नहीं तो क्या है उस बस्ती की सब गलियों में चलने की आज़ादी है उस बस्ती की गलियों के नामों में नेकी और बदी के नाम नहीं सीधे-सादे नाम हैं जैसे लालच ग़ुस्सा भूक मोहब्बत नफ़रत सब गलियों में चलने की आज़ादी है शहर नहीं हैं चारों जानिब शोर ही शोर है क्या है गहरे शहरों में रहने से अज़्मत का एहसास मिटा लम्बे हमलों पर जाने का क़ुदरत से टकराने का अरमान मिटा अब आराम है शहरों में इंसान मिटा

Zahid Dar

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