nazmKuch Alfaaz

बेगम से कहा हम ने जो फ़ुर्सत है आप को पतलून में हमारी बटन एक टाँक दो ग़ुस्से से बोलीं आप ही ख़ुद टाँक लें जनाब बीवी का जब मज़ाक़ उड़ाते रहे हैं आप बीवी बग़ैर आदमी होते नहीं पूरे मैं न रहूँ तो आप भी रह जाएँ अधूरे यूँँ तो बटन का टाँकना छोटा सा काम है ये काम भी तो लाएक़-ए-सद-एहतिराम है मर्दांगी की शान न इतनी बघारिए सूई में सिर्फ़ धागा पिरो कर दिखाए पतलून में जो आप बटन ख़ुद लगाएँगे उँगली चुभो के सूई में ख़ूँ में नहाएँगे सोचो बटन बग़ैर जो पतलून पहनते पतलून फिसलती तो क्या सब लोग न हँसते पतलून में तुम्हारी बटन कौन टाँकती दुनिया में तुम बताओ जो औरत ही न होती हम ने कहा कि अपनी बड़ाई न हाँकिए छोटी सी है ये बात न आगे बढ़ाइए पतलून में बस एक बटन टाँकने का था पतलून को बटन में नहीं टाँकने का था ग़ुस्से को थूक दीजे मेरी बात मानिए खाई में यूँँ बहस की ख़ुदारा न झाँकिए गर इस बहस का ख़ात्मा होना ज़रूर है जो बात सच है आप को सुनना ज़रूर है औरत अगर न होती तो जन्नत ही में रहते दुनिया में आ के इस तरह दुख-दर्द न सहते शादी ब्याह का हमें ख़तरा भी न होता सिर्फ़ इक बटन को टाँकने का नख़रा भी न होता बीवी या उस की बहन हो या हो किसी की सास तुम हो इसी लिए तो पहनते हैं हम लिबास मर्दों को अगर दुनिया में औरत ही न होती पतलून पहनने की ज़रूरत ही न होती

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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है यही दस्तूर दुनिया और यही देखा गया फूल से ख़ुश्बू निकलते ही उसे फेंका गया बाग़-ए-हिन्दोस्तान जिन जिन के ख़ून से सींचा गया दार ना-क़दरी पे बिल-आख़िर उन्हें खींचा गया ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया मरने वालों को भी हर ए'ज़ाज़ पार्लिया मेंट में एहतिमामन वारिसों के हाथ में सौंपा गया थे रक़म जिन में जिहाद-ओ-जंग-ए-आज़ादी के बाब ताक़-ए-निस्याँ में उन्हीं औराक़ को फेंका गया हिन्द की तारीख़ का बाब दरख़्शाँ पूछिए क्यूँँ सियासी मस्लहत की आग में झोंका गया मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया हज़रत-ए-'आज़ाद' को ए'ज़ाज़ भारत-रत्न का 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' उन के पते पर डाक से भेजा गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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वा'दा क्या किसी बात के पाबंद नहीं हैं बूढ़े हैं ना जज़्बात के पाबंद नहीं हैं ख़्वाबों में निकल जाते हैं अरमान हमारे हम दिन में मुलाक़ात के पाबंद नहीं हैं बे-वज्ह भी आँखों में उमड आते हैं अक्सर सैलाब जो बरसात के पाबंद नहीं हैं हालात की गर्दिश रही पाबंद हमारी हम गर्दिश-ए-हालात के पाबंद नहीं हैं जब वक़्त के पाबंद नहीं आप तो हम भी पाबंदी-ए-औक़ात के पाबंद नहीं हैं हम रिंद-ए-ख़राबात हैं जो चाहे पिएँगे साक़ी की हिदायात के पाबंद नहीं हैं ज़ंजीर लिए पाँव में फिरते हैं सर-ए-राह दीवाने हवालात के पाबंद नहीं हैं हाकिम ने कहा है कि वही हुक्म को टालें जो मर्ग-ए-मुफ़ाजात के पाबंद नहीं हैं मफ़्हूम शब-ए-वस्ल का समझाया तो बोले हम ऐसी किसी रात के पाबंद नहीं हैं ये दौर तरक़्क़ी का है हम शर्म-ओ-हया की फ़र्सूदा रिवायात के पाबंद नहीं हैं हम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पाबंद हैं आते हुए पल के गुज़रे हुए लम्हात के पाबंद नहीं हैं

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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मेरी महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम अपनी हल्की सी शराफ़त का इशारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे ऐ मिरी जाँ मिरे उलझे हुए मक़्ते की ग़ज़ल जिसे देखा नहीं उस ख़्वाब की उल्टी ता'बीर तू मेहरबाँ हो तो खिल जाए मिरे दिल का कँवल अपनी बे-लौस मोहब्बत की दिखा दे तासीर आ के धोबी है खड़ा उस का उधारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे क्या भुला सकती है तू पहली मुलाक़ात अपनी मेरी साइकल से जो तू जान के टकराई थी एक दिन आड़ थे कुछ बाल तिरे सर पे मगर तेरी चोटी मिरी मुट्ठी में सिमट आई थी बाल नक़ली ही सही उन का उतारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे याद है तुझ को मिरे हाथ की सोने की घड़ी तिरी ख़ातिर ही जिसे छाँव में रखवाया है सूद के पैसे जो माँगे हैं छुड़ाने के लिए तिरछी आँखों में तिरी ख़ून उतर आया है ये तिरी तिरछी अदा भी है गवारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे नाक फूली हुई दो नाली तफ़ंचे की तरह तेरे तर्शे हुए अबरू ने किया दिल घाइल ले गए चैन मिरा पिचके हुए गाल तिरे दिल के दरमाँ के लिए आया हूँ बन कर साइल क़ल्ब-ए-मुज़्तर के लिए आलू-बुख़ारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे आरज़ू थी मिरे बच्चे तुझे अम्मी कहते इसी हसरत में गुज़ारी है जवानी मैं ने शौक़-ए-औलाद ने क्या दिल पे सितम तोड़े हैं सादा लफ़्ज़ों में सुनाई है कहानी मैं ने अब भी है वक़्त बुढ़ापे का सहारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे सारे कपड़े मिरे अब हो गए ढीले-ढाले नए फ़ैशन का मैं पतलून कहाँ से लाऊँ 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' आउँगा ससुराल पहन कर लुंगी गर तिरी ज़िद है कि मैं पैंट पहन कर आऊँ ले के पतलून मिरी अपना ग़रारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे

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लम्हों में ज़िंदगी का सफ़र यूँँ गुज़र गया साए में जैसे कोई मुसाफ़िर ठहर गया मख़मूर था नशे में ग़म-ए-रोज़गार के होश आ गया तो उम्र का पैमाना भर गया दौलत भी उस के हाथ न आई तमाम-उम्र कुछ नाम ही न अपना ज़माने में कर गया सब उस के ख़ैर-ख़्वाह बुलंदी पे रह गए शोहरत की सीढ़ियों से वो नीचे उतर गया मौका-परस्त आब-ओ-हवा में न जी सका अपनी अना की क़ैद में जाँ से गुज़र गया मौत उस की सारी मुश्किलें आसान कर गई इक बोझ ज़िंदगी का था सर से उतर गया अफ़्सोस कम हुआ मगर हैरत बहुत हुई जब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ऐन ज़ईफ़ी में मर गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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न बना सका नशेमन किसी अजनबी चमन में मिरा घर जला है जब से मिरे अपने ही वतन में मिरे ज़ौक़-ए-ख़ुश-लिबासी को फ़रिश्ते भी तो देखें मैं मरूँ तो दफ़्न करना टेरी-लेन के कफ़न में ये है बे-सबात दुनिया इसी दम के मुर्ग़ की सी जो सुब्ह पका किचन में मगर आया न टिफ़िन में मज़ा गुल के तोड़ने का तो मिला बहुत ऐ गुलचीं मिली लज़्ज़त-ए-ख़लिश भी किसी ख़ार की चुभन में यही आरज़ू है मेरी नज़्म-ओ-नस्र में यकसाँ कि नहीं तज़ाद कोई मेरे शे'र और सुख़न में कभी साबिक़ा पड़े न मिरा सास और ख़ुसर से मिले बीवी गाय जैसी जो बंधी रहे सहन में मैं कभी न ब्याह करता जो मुझे ये इल्म होता कि हज्म बढ़ेगा उन का तो घटूँगा मैं वज़न में चढ़ा उन पे गोश्त कैसे मिरी निकली हड्डियाँ क्यूँ ये तो राज़ की हैं बातें कहूँ कैसे अंजुमन में यही फ़र्क़ रह गया है ऐ रक़ीब तुझ में मुझ में मैं बसा हूँ जा के बम्बई तू रहा नहीं दकन में वहाँ ब्याह मैं रचाया तू रहा यहाँ अकेला मैं क़फ़स में भी हूँ आज़ाद तू असीर है चमन में ये हमारा ही वतन है मगर आज हम हैं मेहमाँ है अजब सितम-ज़रीफ़ी कि हैं बे-वतन वतन में कोई 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पूछे तिरे क़ुर्ब की लताफ़त कि तिरा ख़याल आया हुई गुदगुदी बदन में

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