है यही दस्तूर दुनिया और यही देखा गया फूल से ख़ुश्बू निकलते ही उसे फेंका गया बाग़-ए-हिन्दोस्तान जिन जिन के ख़ून से सींचा गया दार ना-क़दरी पे बिल-आख़िर उन्हें खींचा गया ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया मरने वालों को भी हर ए'ज़ाज़ पार्लिया मेंट में एहतिमामन वारिसों के हाथ में सौंपा गया थे रक़म जिन में जिहाद-ओ-जंग-ए-आज़ादी के बाब ताक़-ए-निस्याँ में उन्हीं औराक़ को फेंका गया हिन्द की तारीख़ का बाब दरख़्शाँ पूछिए क्यूँँ सियासी मस्लहत की आग में झोंका गया मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया हज़रत-ए-'आज़ाद' को ए'ज़ाज़ भारत-रत्न का 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' उन के पते पर डाक से भेजा गया
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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याद है एक दिन? मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पर तुम ने एक स्केच बनाया था आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.
Gulzar
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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लम्हों में ज़िंदगी का सफ़र यूँँ गुज़र गया साए में जैसे कोई मुसाफ़िर ठहर गया मख़मूर था नशे में ग़म-ए-रोज़गार के होश आ गया तो उम्र का पैमाना भर गया दौलत भी उस के हाथ न आई तमाम-उम्र कुछ नाम ही न अपना ज़माने में कर गया सब उस के ख़ैर-ख़्वाह बुलंदी पे रह गए शोहरत की सीढ़ियों से वो नीचे उतर गया मौका-परस्त आब-ओ-हवा में न जी सका अपनी अना की क़ैद में जाँ से गुज़र गया मौत उस की सारी मुश्किलें आसान कर गई इक बोझ ज़िंदगी का था सर से उतर गया अफ़्सोस कम हुआ मगर हैरत बहुत हुई जब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ऐन ज़ईफ़ी में मर गया
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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शा'इरी में न कभी शिकवा-ए-रुस्वाई कर अपने अश'आर की तू ख़ुद ही पज़ीराई कर तेरे वीरान शब-ओ-रोज़ भी रंगीं होंगे बस किसी तरह हसीनों से शनासाई कर जो मरीज़ान-ए-मोहब्बत हैं ग़मों के मारे उन की अशआ'र-ए-ज़राफ़त से मसीहाई कर पेट की आग बुझा मेहनत-ओ-मज़दूरी से वक़्त बच जाए तो मश्क़-ए-सुख़न-आराई कर भूल कर इश्क़ का सौदा न समा ले सर में और मजनूँ की तरह ख़ुद को न सौदाई कर अपनी तन्हाइयाँ यादों से दरख़्शाँ कर ले फिर तसव्वुर में सही अंजुमन-आराई कर आजिज़ी और न आँसू न फ़ुग़ाँ शामिल है कुछ तो फ़रियाद को तू क़ाबिल-ए-शनवाई कर वक़्त के साथ तिरा दिल भी बहल जाएगा ले के काग़ज़-ओ-क़लम क़ाफ़िया-पैमाई कर अपने माशूक़ के ख़्वाबों में चला जा हर शब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' यूँँ भी इलाज-ए-ग़म-ए-तन्हाई कर और अगर चाहे कि हो 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' शोहरत तेरी यूसुफ़ी गर नहीं मुमकिन तो ज़ुलेख़ाई कर
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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कमयाब हो गईं जो ज़हानत की रोटियाँ खाने लगे हैं लोग जहालत की रोटियाँ मेहनत से जिन को आर है वो भीक माँग कर दिन-रात तोड़ते हैं सख़ावत की रोटियाँ खा तो रहे हो देखना पछताओगे इक दिन होती नहीं हैं हज़्म अदावत की रोटियाँ लीडर हमारे बाहमी नफ़रत की आग पर जब सेंक चुके गंदी सियासत की रोटियाँ अब आरज़ी फ़त्ह पे नदीदों को देखिए इतरा के खा रहे हैं हिमाक़त की रोटियाँ कुत्तों को खिलाएँगे मोहब्बत की ग़िज़ाएँ मेहमाँ को खिलाते हैं हिक़ारत की रोटियाँ चर्बी घटा लें अपनी सेहत-मंद औरतें परहेज़ में खाती हैं नज़ाकत की रोटियाँ घर के किचन का बुज़ुर्गो रखना ज़रा ख़याल देखो वहाँ पकें न बग़ावत की रोटियाँ अक़्ल-ए-कुल ही जिन्हें छू कर नहीं गई बाँटो न उन में फ़हम-ओ-फ़रासत की रोटियाँ इंसाँ को सताएगी सदा भूक हवस की जब तक न मुयस्सर हों क़नाअ'त की रोटियाँ मेरी सेहत का राज़ बस इतना है 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' खाता हूँ रोज़ तंज़-ओ-ज़राफ़त की रोटियाँ
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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चढ़ती कहीं कहीं से उतरती हैं सीढ़ियाँ जाने कहाँ कहाँ से गुज़रती हैं सीढ़ियाँ यादों के झिलमिलाते सितारे लिए हुए माज़ी की कहकशाँ से उतरती हैं सीढ़ियाँ लेती हैं यूँँ सफ़र में मुसाफ़िर का इम्तिहाँ हमवार रास्तों पे उभरती हैं सीढ़ियाँ करती हैं सर ग़ुरूर का नीचे उतार कर पस्ती का सर बुलंद भी करती हैं सीढ़ियाँ तारीकियों को ओढ़ के सोती हैं रात-भर सूरज की रौशनी में निखरती हैं सीढ़ियाँ हिलती नहीं हिलाए से साबित-क़दम तले महकें अगर क़दम तो बहकती हैं सीढ़ियाँ मिम्बर पे चढ़ के बैठती हैं वाइ'ज़ों के साथ रिंदों से छेड़-छाड़ भी करती हैं सीढ़ियाँ जब कोई हाल पूछने आए न मुद्दतों अंदर से टूट-फूट के मरती हैं सीढ़ियाँ यादों के फूँक फूँक के रखने पड़े क़दम ज़ख़्मों से दिल के जब भी सँवरती हैं सीढ़ियाँ लेती हैं बढ़ के सब के क़दम तो लगा मुझे तन्हाई के अज़ाब से डरती हैं सीढ़ियाँ यूँँ दिल में तेरी बात उतरती है 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' गहरे कुएँ में जैसे उतरती हैं सीढ़ियाँ
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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वा'दा क्या किसी बात के पाबंद नहीं हैं बूढ़े हैं ना जज़्बात के पाबंद नहीं हैं ख़्वाबों में निकल जाते हैं अरमान हमारे हम दिन में मुलाक़ात के पाबंद नहीं हैं बे-वज्ह भी आँखों में उमड आते हैं अक्सर सैलाब जो बरसात के पाबंद नहीं हैं हालात की गर्दिश रही पाबंद हमारी हम गर्दिश-ए-हालात के पाबंद नहीं हैं जब वक़्त के पाबंद नहीं आप तो हम भी पाबंदी-ए-औक़ात के पाबंद नहीं हैं हम रिंद-ए-ख़राबात हैं जो चाहे पिएँगे साक़ी की हिदायात के पाबंद नहीं हैं ज़ंजीर लिए पाँव में फिरते हैं सर-ए-राह दीवाने हवालात के पाबंद नहीं हैं हाकिम ने कहा है कि वही हुक्म को टालें जो मर्ग-ए-मुफ़ाजात के पाबंद नहीं हैं मफ़्हूम शब-ए-वस्ल का समझाया तो बोले हम ऐसी किसी रात के पाबंद नहीं हैं ये दौर तरक़्क़ी का है हम शर्म-ओ-हया की फ़र्सूदा रिवायात के पाबंद नहीं हैं हम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पाबंद हैं आते हुए पल के गुज़रे हुए लम्हात के पाबंद नहीं हैं
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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