चढ़ती कहीं कहीं से उतरती हैं सीढ़ियाँ जाने कहाँ कहाँ से गुज़रती हैं सीढ़ियाँ यादों के झिलमिलाते सितारे लिए हुए माज़ी की कहकशाँ से उतरती हैं सीढ़ियाँ लेती हैं यूँँ सफ़र में मुसाफ़िर का इम्तिहाँ हमवार रास्तों पे उभरती हैं सीढ़ियाँ करती हैं सर ग़ुरूर का नीचे उतार कर पस्ती का सर बुलंद भी करती हैं सीढ़ियाँ तारीकियों को ओढ़ के सोती हैं रात-भर सूरज की रौशनी में निखरती हैं सीढ़ियाँ हिलती नहीं हिलाए से साबित-क़दम तले महकें अगर क़दम तो बहकती हैं सीढ़ियाँ मिम्बर पे चढ़ के बैठती हैं वाइ'ज़ों के साथ रिंदों से छेड़-छाड़ भी करती हैं सीढ़ियाँ जब कोई हाल पूछने आए न मुद्दतों अंदर से टूट-फूट के मरती हैं सीढ़ियाँ यादों के फूँक फूँक के रखने पड़े क़दम ज़ख़्मों से दिल के जब भी सँवरती हैं सीढ़ियाँ लेती हैं बढ़ के सब के क़दम तो लगा मुझे तन्हाई के अज़ाब से डरती हैं सीढ़ियाँ यूँँ दिल में तेरी बात उतरती है 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' गहरे कुएँ में जैसे उतरती हैं सीढ़ियाँ
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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शा'इरी में न कभी शिकवा-ए-रुस्वाई कर अपने अश'आर की तू ख़ुद ही पज़ीराई कर तेरे वीरान शब-ओ-रोज़ भी रंगीं होंगे बस किसी तरह हसीनों से शनासाई कर जो मरीज़ान-ए-मोहब्बत हैं ग़मों के मारे उन की अशआ'र-ए-ज़राफ़त से मसीहाई कर पेट की आग बुझा मेहनत-ओ-मज़दूरी से वक़्त बच जाए तो मश्क़-ए-सुख़न-आराई कर भूल कर इश्क़ का सौदा न समा ले सर में और मजनूँ की तरह ख़ुद को न सौदाई कर अपनी तन्हाइयाँ यादों से दरख़्शाँ कर ले फिर तसव्वुर में सही अंजुमन-आराई कर आजिज़ी और न आँसू न फ़ुग़ाँ शामिल है कुछ तो फ़रियाद को तू क़ाबिल-ए-शनवाई कर वक़्त के साथ तिरा दिल भी बहल जाएगा ले के काग़ज़-ओ-क़लम क़ाफ़िया-पैमाई कर अपने माशूक़ के ख़्वाबों में चला जा हर शब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' यूँँ भी इलाज-ए-ग़म-ए-तन्हाई कर और अगर चाहे कि हो 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' शोहरत तेरी यूसुफ़ी गर नहीं मुमकिन तो ज़ुलेख़ाई कर
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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है यही दस्तूर दुनिया और यही देखा गया फूल से ख़ुश्बू निकलते ही उसे फेंका गया बाग़-ए-हिन्दोस्तान जिन जिन के ख़ून से सींचा गया दार ना-क़दरी पे बिल-आख़िर उन्हें खींचा गया ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया मरने वालों को भी हर ए'ज़ाज़ पार्लिया मेंट में एहतिमामन वारिसों के हाथ में सौंपा गया थे रक़म जिन में जिहाद-ओ-जंग-ए-आज़ादी के बाब ताक़-ए-निस्याँ में उन्हीं औराक़ को फेंका गया हिन्द की तारीख़ का बाब दरख़्शाँ पूछिए क्यूँँ सियासी मस्लहत की आग में झोंका गया मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया हज़रत-ए-'आज़ाद' को ए'ज़ाज़ भारत-रत्न का 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' उन के पते पर डाक से भेजा गया
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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मेरी महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम अपनी हल्की सी शराफ़त का इशारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे ऐ मिरी जाँ मिरे उलझे हुए मक़्ते की ग़ज़ल जिसे देखा नहीं उस ख़्वाब की उल्टी ता'बीर तू मेहरबाँ हो तो खिल जाए मिरे दिल का कँवल अपनी बे-लौस मोहब्बत की दिखा दे तासीर आ के धोबी है खड़ा उस का उधारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे क्या भुला सकती है तू पहली मुलाक़ात अपनी मेरी साइकल से जो तू जान के टकराई थी एक दिन आड़ थे कुछ बाल तिरे सर पे मगर तेरी चोटी मिरी मुट्ठी में सिमट आई थी बाल नक़ली ही सही उन का उतारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे याद है तुझ को मिरे हाथ की सोने की घड़ी तिरी ख़ातिर ही जिसे छाँव में रखवाया है सूद के पैसे जो माँगे हैं छुड़ाने के लिए तिरछी आँखों में तिरी ख़ून उतर आया है ये तिरी तिरछी अदा भी है गवारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे नाक फूली हुई दो नाली तफ़ंचे की तरह तेरे तर्शे हुए अबरू ने किया दिल घाइल ले गए चैन मिरा पिचके हुए गाल तिरे दिल के दरमाँ के लिए आया हूँ बन कर साइल क़ल्ब-ए-मुज़्तर के लिए आलू-बुख़ारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे आरज़ू थी मिरे बच्चे तुझे अम्मी कहते इसी हसरत में गुज़ारी है जवानी मैं ने शौक़-ए-औलाद ने क्या दिल पे सितम तोड़े हैं सादा लफ़्ज़ों में सुनाई है कहानी मैं ने अब भी है वक़्त बुढ़ापे का सहारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे सारे कपड़े मिरे अब हो गए ढीले-ढाले नए फ़ैशन का मैं पतलून कहाँ से लाऊँ 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' आउँगा ससुराल पहन कर लुंगी गर तिरी ज़िद है कि मैं पैंट पहन कर आऊँ ले के पतलून मिरी अपना ग़रारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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लम्हों में ज़िंदगी का सफ़र यूँँ गुज़र गया साए में जैसे कोई मुसाफ़िर ठहर गया मख़मूर था नशे में ग़म-ए-रोज़गार के होश आ गया तो उम्र का पैमाना भर गया दौलत भी उस के हाथ न आई तमाम-उम्र कुछ नाम ही न अपना ज़माने में कर गया सब उस के ख़ैर-ख़्वाह बुलंदी पे रह गए शोहरत की सीढ़ियों से वो नीचे उतर गया मौका-परस्त आब-ओ-हवा में न जी सका अपनी अना की क़ैद में जाँ से गुज़र गया मौत उस की सारी मुश्किलें आसान कर गई इक बोझ ज़िंदगी का था सर से उतर गया अफ़्सोस कम हुआ मगर हैरत बहुत हुई जब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ऐन ज़ईफ़ी में मर गया
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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अगर नहीं है कोई काम काम पैदा कर कहीं से ढूँढ़ के मीना-ओ-जाम पैदा कर न फँसना गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार में ज़िन्हार तू रोज़ एक नई सुब्ह-ओ-शाम पैदा कर तू हर तरह के सभी काम ले ग़ुलामों से ग़ुलाम गर नहीं मिलते ग़ुलाम पैदा कर दिलों में तीर की मानिंद जो उतर जाए तलाश कर के कुछ ऐसा कलाम पैदा कर सुना के नाम से अपने ख़ुद-ए'तिमादी से असातिज़ा की सफ़ों में मक़ाम पैदा कर तिरे इताब से डरते हैं जैसे घर वाले मुआ'शरे में भी ऐसा मक़ाम पैदा कर ज़माना आ के तिरे दर पे सर झुकाएगा किसी तरह से सियासत में नाम पैदा कर जो आरज़ी ही सही चंद राहतें ले कर ज़मीर बेच दें ऐसे अवाम पैदा कर रहेंगी दो से ज़ियादा भी जिस में तलवारें किसी तरह से इक ऐसी नियाम पैदा कर लगा के पान में खाए तो क़ौम सो जाए मिला के भंग नया इक क़िवाम पैदा कर तू चाहता है तिरी 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' शोहरत हो ख़ुदी को बेच अमीरी में नाम पैदा कर
Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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