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अगर नहीं है कोई काम काम पैदा कर कहीं से ढूँढ़ के मीना-ओ-जाम पैदा कर न फँसना गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार में ज़िन्हार तू रोज़ एक नई सुब्ह-ओ-शाम पैदा कर तू हर तरह के सभी काम ले ग़ुलामों से ग़ुलाम गर नहीं मिलते ग़ुलाम पैदा कर दिलों में तीर की मानिंद जो उतर जाए तलाश कर के कुछ ऐसा कलाम पैदा कर सुना के नाम से अपने ख़ुद-ए'तिमादी से असातिज़ा की सफ़ों में मक़ाम पैदा कर तिरे इताब से डरते हैं जैसे घर वाले मुआ'शरे में भी ऐसा मक़ाम पैदा कर ज़माना आ के तिरे दर पे सर झुकाएगा किसी तरह से सियासत में नाम पैदा कर जो आरज़ी ही सही चंद राहतें ले कर ज़मीर बेच दें ऐसे अवाम पैदा कर रहेंगी दो से ज़ियादा भी जिस में तलवारें किसी तरह से इक ऐसी नियाम पैदा कर लगा के पान में खाए तो क़ौम सो जाए मिला के भंग नया इक क़िवाम पैदा कर तू चाहता है तिरी 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' शोहरत हो ख़ुदी को बेच अमीरी में नाम पैदा कर

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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है यही दस्तूर दुनिया और यही देखा गया फूल से ख़ुश्बू निकलते ही उसे फेंका गया बाग़-ए-हिन्दोस्तान जिन जिन के ख़ून से सींचा गया दार ना-क़दरी पे बिल-आख़िर उन्हें खींचा गया ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया मरने वालों को भी हर ए'ज़ाज़ पार्लिया मेंट में एहतिमामन वारिसों के हाथ में सौंपा गया थे रक़म जिन में जिहाद-ओ-जंग-ए-आज़ादी के बाब ताक़-ए-निस्याँ में उन्हीं औराक़ को फेंका गया हिन्द की तारीख़ का बाब दरख़्शाँ पूछिए क्यूँँ सियासी मस्लहत की आग में झोंका गया मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया हज़रत-ए-'आज़ाद' को ए'ज़ाज़ भारत-रत्न का 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' उन के पते पर डाक से भेजा गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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वा'दा क्या किसी बात के पाबंद नहीं हैं बूढ़े हैं ना जज़्बात के पाबंद नहीं हैं ख़्वाबों में निकल जाते हैं अरमान हमारे हम दिन में मुलाक़ात के पाबंद नहीं हैं बे-वज्ह भी आँखों में उमड आते हैं अक्सर सैलाब जो बरसात के पाबंद नहीं हैं हालात की गर्दिश रही पाबंद हमारी हम गर्दिश-ए-हालात के पाबंद नहीं हैं जब वक़्त के पाबंद नहीं आप तो हम भी पाबंदी-ए-औक़ात के पाबंद नहीं हैं हम रिंद-ए-ख़राबात हैं जो चाहे पिएँगे साक़ी की हिदायात के पाबंद नहीं हैं ज़ंजीर लिए पाँव में फिरते हैं सर-ए-राह दीवाने हवालात के पाबंद नहीं हैं हाकिम ने कहा है कि वही हुक्म को टालें जो मर्ग-ए-मुफ़ाजात के पाबंद नहीं हैं मफ़्हूम शब-ए-वस्ल का समझाया तो बोले हम ऐसी किसी रात के पाबंद नहीं हैं ये दौर तरक़्क़ी का है हम शर्म-ओ-हया की फ़र्सूदा रिवायात के पाबंद नहीं हैं हम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पाबंद हैं आते हुए पल के गुज़रे हुए लम्हात के पाबंद नहीं हैं

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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लम्हों में ज़िंदगी का सफ़र यूँँ गुज़र गया साए में जैसे कोई मुसाफ़िर ठहर गया मख़मूर था नशे में ग़म-ए-रोज़गार के होश आ गया तो उम्र का पैमाना भर गया दौलत भी उस के हाथ न आई तमाम-उम्र कुछ नाम ही न अपना ज़माने में कर गया सब उस के ख़ैर-ख़्वाह बुलंदी पे रह गए शोहरत की सीढ़ियों से वो नीचे उतर गया मौका-परस्त आब-ओ-हवा में न जी सका अपनी अना की क़ैद में जाँ से गुज़र गया मौत उस की सारी मुश्किलें आसान कर गई इक बोझ ज़िंदगी का था सर से उतर गया अफ़्सोस कम हुआ मगर हैरत बहुत हुई जब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ऐन ज़ईफ़ी में मर गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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शा'इरी में न कभी शिकवा-ए-रुस्वाई कर अपने अश'आर की तू ख़ुद ही पज़ीराई कर तेरे वीरान शब-ओ-रोज़ भी रंगीं होंगे बस किसी तरह हसीनों से शनासाई कर जो मरीज़ान-ए-मोहब्बत हैं ग़मों के मारे उन की अशआ'र-ए-ज़राफ़त से मसीहाई कर पेट की आग बुझा मेहनत-ओ-मज़दूरी से वक़्त बच जाए तो मश्क़-ए-सुख़न-आराई कर भूल कर इश्क़ का सौदा न समा ले सर में और मजनूँ की तरह ख़ुद को न सौदाई कर अपनी तन्हाइयाँ यादों से दरख़्शाँ कर ले फिर तसव्वुर में सही अंजुमन-आराई कर आजिज़ी और न आँसू न फ़ुग़ाँ शामिल है कुछ तो फ़रियाद को तू क़ाबिल-ए-शनवाई कर वक़्त के साथ तिरा दिल भी बहल जाएगा ले के काग़ज़-ओ-क़लम क़ाफ़िया-पैमाई कर अपने माशूक़ के ख़्वाबों में चला जा हर शब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' यूँँ भी इलाज-ए-ग़म-ए-तन्हाई कर और अगर चाहे कि हो 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' शोहरत तेरी यूसुफ़ी गर नहीं मुमकिन तो ज़ुलेख़ाई कर

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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न बना सका नशेमन किसी अजनबी चमन में मिरा घर जला है जब से मिरे अपने ही वतन में मिरे ज़ौक़-ए-ख़ुश-लिबासी को फ़रिश्ते भी तो देखें मैं मरूँ तो दफ़्न करना टेरी-लेन के कफ़न में ये है बे-सबात दुनिया इसी दम के मुर्ग़ की सी जो सुब्ह पका किचन में मगर आया न टिफ़िन में मज़ा गुल के तोड़ने का तो मिला बहुत ऐ गुलचीं मिली लज़्ज़त-ए-ख़लिश भी किसी ख़ार की चुभन में यही आरज़ू है मेरी नज़्म-ओ-नस्र में यकसाँ कि नहीं तज़ाद कोई मेरे शे'र और सुख़न में कभी साबिक़ा पड़े न मिरा सास और ख़ुसर से मिले बीवी गाय जैसी जो बंधी रहे सहन में मैं कभी न ब्याह करता जो मुझे ये इल्म होता कि हज्म बढ़ेगा उन का तो घटूँगा मैं वज़न में चढ़ा उन पे गोश्त कैसे मिरी निकली हड्डियाँ क्यूँ ये तो राज़ की हैं बातें कहूँ कैसे अंजुमन में यही फ़र्क़ रह गया है ऐ रक़ीब तुझ में मुझ में मैं बसा हूँ जा के बम्बई तू रहा नहीं दकन में वहाँ ब्याह मैं रचाया तू रहा यहाँ अकेला मैं क़फ़स में भी हूँ आज़ाद तू असीर है चमन में ये हमारा ही वतन है मगर आज हम हैं मेहमाँ है अजब सितम-ज़रीफ़ी कि हैं बे-वतन वतन में कोई 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पूछे तिरे क़ुर्ब की लताफ़त कि तिरा ख़याल आया हुई गुदगुदी बदन में

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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