"चाँद कोई अफ़्साना नहीं" अब तो इल्म की परवाज़ें और ही क़िस्से कहती हैं बाजी अब तो मत बोलो चाँद में परियाँ रहती हैं चाँद न अपना मामूँ है और न देस वो परियों का चाँद में कोई बुढ़िया है और न बुढ़िया का चरख़ा सदियों सदियों खोज के बा'द अब हम ने ये जाना है चाँद कोई अफ़्साना नहीं एक हक़ीक़ी दुनिया है सर्दी गर्मी दोनों तेज़ ऑक्सीजन का नाम नहीं चट्टानें हैं खाइयाँ हैं धरती सा आराम नहीं हो जाएगा पर इक रोज़ जी लेना आसान वहाँ अपने जीने का सामाँ कर लेगा इंसान वहाँ इल्म-ओ-हुनर की धाराएँ पीछे को कब बहती हैं बाजी अब तो मत बोलो चाँद में परियाँ रहती हैं
Related Nazm
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
161 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को
Allama Iqbal
51 likes
"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
47 likes
More from Zafar Gorakhpuri
"इक्कीसवीं सदी" दुख सुख था एक सबका अपना हो या बेग़ाना इक वो भी था ज़माना इक ये भी है ज़माना दादा हयात थे जब मिट्टी का एक घर था चोरों का कोई खटका ना डाकुओं का डर था खाते थे रूखी-सूखी सोते थे नींद गहरी शा में भरी भरी थी आबाद थी दोपहरी संतोष था दिलों को माथे पे बल नहीं था दिल में कपट नहीं था आँखों में छल नहीं था थे लोग भोले-भाले लेकिन थे प्यार वाले दुनिया से कितनी जल्दी सब हो गए रवाना अब्बा का वक़्त आया ता'लीम घर में आई ता'लीम साथ अपने ताज़ा विचार लाई आगे रिवायतों से बढ़ने का ध्यान आया मिट्टी का घर हटा तो पक्का मकान आया दफ़्तर की नौकरी थी तनख़्वाह का सहारा मालिक पे था भरोसा हो जाता था गुज़ारा पैसा अगरचे कम था फिर भी न कोई ग़म था कैसा भरा-पुरा था अपना ग़रीब-ख़ाना अब मेरा दौर है ये कोई नहीं किसी का हर आदमी अकेला हर चेहरा अजनबी सा आँसू न मुस्कुराहट जीवन का हाल ऐसा अपनी ख़बर नहीं है माया का जाल ऐसा पैसा है मर्तबा है इज़्ज़त वक़ार भी है नौकर हैं और चाकर बंगला है कार भी है ज़र पास है ज़मीं है लेकिन सुकूँ नहीं है पाने के वास्ते कुछ क्या क्या पड़ा गँवाना ऐ आने वाली नस्लों ऐ आने वाले लोगों भोगा है हम ने जो कुछ वो तुम कभी न भोगो जो दुख था साथ अपने तुम से क़रीब न हो पीड़ा जो हम ने झेली तुम को नसीब न हो जिस तरह भीड़ में हम ज़िंदा रहे अकेले वो ज़िन्दगी की महफ़िल तुम से न कोई ले ले तुम जिस तरफ़ से गुज़रो मेला हो रौशनी का रास आए तुम को मौसम इक्कीसवीं सदी का हम तो सुकूँ को तरसे तुम पर सुकून बरसे आनंद हो दिलों में जीवन लगे सुहाना
Zafar Gorakhpuri
1 likes
"चाचा नेहरू का ख़त बच्चों के नाम" मिरे अज़ीज़ वतन के अज़ीज़ फ़रज़ंदो मिरे वतन की नई सुब्ह के नक़ीब हो तुम बिछड़ के तुम से कई साल हो चुके हैं मगर गुमान होता है अब तक मिरे क़रीब हो तुम दिवालियाँ हों कि ईदें ख़ुशी मना लेना कभी ये दिल में न लाना कि बद-गुमाँ हूँ मैं तुम इस यक़ीन को दिल से निकालना न कभी कि दूर रह के भी तुम सब के दरमियाँ हूँ मैं मैं जानता हूँ जुदाई का दुख बहुत होगा तुम अपने दुख को अमल से मिटा भी सकते हो अगरचे दूर हूँ तुम से बहुत ही दूर मगर मुझे तलाश करो तुम तो पा भी सकते तुम्हें मिलूँगा मैं गंगा की शोख़ मौजों में वो शोख़ मौजें जिन्हों ने मुझे क़रार दिया तुम्हें मिलूँगा हिमाला की सब्ज़-वादी में तमाम उम्र मुझे जिस ने माँ का प्यार दिया तुम्हें मिलूँगा मैं खेतों की गर्म मिट्टी में किसान अपना पसीना जहाँ बहाते हैं तुम्हें मिलूँगा मशीनों के दरमियान जहाँ हज़ारों हाथ नई क़िस्मतें बनाते हैं तुम्हें मिलूँगा मैं काशी की सरहदों में कभी कभी मिलूँगा मैं अजमेर के गुलिस्ताँ में कभी चराग़ की मानिंद शब के सीने पर कभी गुलाब की सूरत वतन के दामाँ में
Zafar Gorakhpuri
0 likes
अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने हम ने सोच रखा है रात यूँँ गुज़ारेंगे धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं बे-क़रार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे
Zafar Gorakhpuri
3 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Zafar Gorakhpuri.
Similar Moods
More moods that pair well with Zafar Gorakhpuri's nazm.







