"चाचा नेहरू का ख़त बच्चों के नाम" मिरे अज़ीज़ वतन के अज़ीज़ फ़रज़ंदो मिरे वतन की नई सुब्ह के नक़ीब हो तुम बिछड़ के तुम से कई साल हो चुके हैं मगर गुमान होता है अब तक मिरे क़रीब हो तुम दिवालियाँ हों कि ईदें ख़ुशी मना लेना कभी ये दिल में न लाना कि बद-गुमाँ हूँ मैं तुम इस यक़ीन को दिल से निकालना न कभी कि दूर रह के भी तुम सब के दरमियाँ हूँ मैं मैं जानता हूँ जुदाई का दुख बहुत होगा तुम अपने दुख को अमल से मिटा भी सकते हो अगरचे दूर हूँ तुम से बहुत ही दूर मगर मुझे तलाश करो तुम तो पा भी सकते तुम्हें मिलूँगा मैं गंगा की शोख़ मौजों में वो शोख़ मौजें जिन्हों ने मुझे क़रार दिया तुम्हें मिलूँगा हिमाला की सब्ज़-वादी में तमाम उम्र मुझे जिस ने माँ का प्यार दिया तुम्हें मिलूँगा मैं खेतों की गर्म मिट्टी में किसान अपना पसीना जहाँ बहाते हैं तुम्हें मिलूँगा मशीनों के दरमियान जहाँ हज़ारों हाथ नई क़िस्मतें बनाते हैं तुम्हें मिलूँगा मैं काशी की सरहदों में कभी कभी मिलूँगा मैं अजमेर के गुलिस्ताँ में कभी चराग़ की मानिंद शब के सीने पर कभी गुलाब की सूरत वतन के दामाँ में
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को
Allama Iqbal
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
Khalil Ur Rehman Qamar
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"इक्कीसवीं सदी" दुख सुख था एक सबका अपना हो या बेग़ाना इक वो भी था ज़माना इक ये भी है ज़माना दादा हयात थे जब मिट्टी का एक घर था चोरों का कोई खटका ना डाकुओं का डर था खाते थे रूखी-सूखी सोते थे नींद गहरी शा में भरी भरी थी आबाद थी दोपहरी संतोष था दिलों को माथे पे बल नहीं था दिल में कपट नहीं था आँखों में छल नहीं था थे लोग भोले-भाले लेकिन थे प्यार वाले दुनिया से कितनी जल्दी सब हो गए रवाना अब्बा का वक़्त आया ता'लीम घर में आई ता'लीम साथ अपने ताज़ा विचार लाई आगे रिवायतों से बढ़ने का ध्यान आया मिट्टी का घर हटा तो पक्का मकान आया दफ़्तर की नौकरी थी तनख़्वाह का सहारा मालिक पे था भरोसा हो जाता था गुज़ारा पैसा अगरचे कम था फिर भी न कोई ग़म था कैसा भरा-पुरा था अपना ग़रीब-ख़ाना अब मेरा दौर है ये कोई नहीं किसी का हर आदमी अकेला हर चेहरा अजनबी सा आँसू न मुस्कुराहट जीवन का हाल ऐसा अपनी ख़बर नहीं है माया का जाल ऐसा पैसा है मर्तबा है इज़्ज़त वक़ार भी है नौकर हैं और चाकर बंगला है कार भी है ज़र पास है ज़मीं है लेकिन सुकूँ नहीं है पाने के वास्ते कुछ क्या क्या पड़ा गँवाना ऐ आने वाली नस्लों ऐ आने वाले लोगों भोगा है हम ने जो कुछ वो तुम कभी न भोगो जो दुख था साथ अपने तुम से क़रीब न हो पीड़ा जो हम ने झेली तुम को नसीब न हो जिस तरह भीड़ में हम ज़िंदा रहे अकेले वो ज़िन्दगी की महफ़िल तुम से न कोई ले ले तुम जिस तरफ़ से गुज़रो मेला हो रौशनी का रास आए तुम को मौसम इक्कीसवीं सदी का हम तो सुकूँ को तरसे तुम पर सुकून बरसे आनंद हो दिलों में जीवन लगे सुहाना
Zafar Gorakhpuri
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"चाँद कोई अफ़्साना नहीं" अब तो इल्म की परवाज़ें और ही क़िस्से कहती हैं बाजी अब तो मत बोलो चाँद में परियाँ रहती हैं चाँद न अपना मामूँ है और न देस वो परियों का चाँद में कोई बुढ़िया है और न बुढ़िया का चरख़ा सदियों सदियों खोज के बा'द अब हम ने ये जाना है चाँद कोई अफ़्साना नहीं एक हक़ीक़ी दुनिया है सर्दी गर्मी दोनों तेज़ ऑक्सीजन का नाम नहीं चट्टानें हैं खाइयाँ हैं धरती सा आराम नहीं हो जाएगा पर इक रोज़ जी लेना आसान वहाँ अपने जीने का सामाँ कर लेगा इंसान वहाँ इल्म-ओ-हुनर की धाराएँ पीछे को कब बहती हैं बाजी अब तो मत बोलो चाँद में परियाँ रहती हैं
Zafar Gorakhpuri
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अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने हम ने सोच रखा है रात यूँँ गुज़ारेंगे धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं बे-क़रार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे
Zafar Gorakhpuri
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