तू ने सर्द हवाओं की ज़बाँ सीखी है तेरे ठंडे लम्स से धड़कनें यख़-बस्ता हुईं और मैं चुप हूँ मैं ने वक़्त-ए-सुब्ह चिड़ियों की सुरीली चहचहाहट को सुना है और मेरे ज़ेहन के सागर में नग़्में बुलबुले बन कर उठे हैं तेरे कड़वे बोल से हर-सू हैं आवाज़ों के लाशे और मैं चुप हूँ मैं ने वो मासूम प्यारे गुल-बदन देखे हैं जिन के मरमरीं जिस्मों में पाकीज़ा मोहब्बत के नशेमन हैं तिरे इन खुरदुरे हाथों ने ये सारे नशेमन नोच डाले और मैं चुप हूँ मैं ने देखे हैं वो चेहरे चाँद जैसे ग़ुंचा-सूरत जिन की आँखें आइना हैं आने वाले मौसमों का तू ने उन आँखों में भी काँटे चुभोए और मैं चुप हूँ बा-कमाल ओ बा-सफ़ा वो लोग भी देखे हैं मैं ने जिन के होंटों से खिले हैं सिद्क़ ओ दानाई के फूल तू ने उन होंटों को घोला ज़हर में और मैं चुप हूँ
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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वो एक आँसू गिरा वो दिल के अथाह सागर में इक सदफ़ का भी मुँह खुला वो आसमानों का सुरमई रंग उस के आँसू में घुल के रुख़्सार के शफ़क़ पर बहा कहीं दूर जा के धरती के गहरे पाताल में गिरा हज़ारों आकाश-रंग आँसू हवा के तेज़ और तुंद झोंकों में मुंतशिर हो गए समुंदर की कोह जैसी मुहीब मौजों के अंधे ग़ारों में खो गए मगर वो आँसू वो एक मोती जो मेरी पुतली में जड़ गया है हज़ारों रंगों का माजरा है हज़ारों अश्कों का आइना है
Ejaz Farooqi
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वो एक पत्थर वो सख़्त काला सियाह पत्थर लहू से तर जिस की तीरगी नाग बन के डसती थी जिस की सख़्ती से कोहसारों के दिल दहलते थे जिस की ख़ूँ-तिश्नगी से कोमल शजर फ़क़त टहनियों की हसरत के ज़ाविए थे वो एक पत्थर जो तू ने फेंका मिरे समुंदर में हरकत-ए-ला-ज़वाल का एक ताज़ियाना बना वो लहरें उट्ठीं कि ख़ामोश चाँदनी की रुपहली चादर भी थरथराई वो झाग का नूर तीरगी के सियाह पर्दों को चाक करने लगा वो शीशे की एक दीवार जिस को तू ये समझ रहा था कि एक ठोकर से चूर होगी वो एक सोने का थाल बन कर दमक रही है
Ejaz Farooqi
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ये समुंदर मौज-दर-मौज सलासिल हल्के गहरे सब्ज़ नीले रंग जिन पर जा-ब-जा चाँदी के धब्बे उस किनारे पर गुलाबी रंग में डूबा हुआ इक गोल चेहरा फैलते पानी में अपने आतिशीं होंटों की सुर्ख़ी घोलता जाए मैं इक सोने की कश्ती में सवार उन हसीं रंगों में मदहोश उस किनारे की तरफ़ बढ़ता चला जाता हूँ दूर सत्ह-ए-आब पर वो एक बगलों की क़तार ये समुंदर के ऋषी ज्ञानी जो पानी के हर इक सुर-ताल से आगाह हैं अब तक ये बे-फ़िक्री से मौजों पर सवार तैरते जाते थे क्यूँँ फिर दफ़्अ'तन टोली बना कर उड़ गए मैं नज़र के तार पर रक़्साँ वो नग़्मों के सुरों में गुम
Ejaz Farooqi
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तू है इक ताँबे का थाल जो सूरज की गर्मी में सारा साल तपे कोई हल्का नीला बादल जब उस पर बूँदें बरसाए एक छनाका हो और बूँदें बादल को उड़ जाएँ ताँबा जलता रहे वो है इक बिजली का तार जिस के अंदर तेज़ और आतिशनाक इक बर्क़ी-रौ दौड़े जो भी उस के पास से गुज़रे उस की जानिब खींचता जाए उस के साथ चिमट के मौत के झूले झूले बर्क़ी-रौ वैसी ही सुरअत और तेज़ी से दौड़ती जाए मैं हों बर्ग-ए-शजर सूरज चमके मैं उस की किरनों को अपने रूप में धारूँ बादल बरसे मैं उस की बूँदें अपनी रग रग में उतारूँ बा'द चले मैं उस की लहरों को नग़्मों में ढालूँ और ख़िज़ाँ आए तो उस के मुँह में अपना रस टपका कर पेड़ से उतरूँ धरती में मुदग़म हो जाऊँ धरती जब मुझ को उगले तो पौदा बन कर फूटूँ
Ejaz Farooqi
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ये काएनात एक आइना है ये साफ़ पानी की झील जिस में मैं डूब कर हैरत-ओ-तहय्युर बना सरापा जो लौटता हूँ तो ज़िंदगी है न मौत है इक सुरूर हूँ बे-ख़ुदी हूँ सच्चाई हूँ मुजस्सम
Ejaz Farooqi
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