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दिसम्बर नया साल आने की है तो ख़ुशी पर दिसम्बर के जाने का ग़म भी बहुत है वो मंज़र हसीं आँख में तैरते हैं दरख़्तों ने फूलों के ज़ेवर थे पहने गुलाबों पे जोबन की सुर्ख़ी चढ़ी थी ज़मीनों पे शबनम के मोती थे बिखरे हवाओं से कोहरा गले मिल रहा था पहाड़ों की गोदी से नीचे उतर कर ज़मीनों पे दरिया सफ़र कर रहा था किसी मस्तमौला गुलू-कार जैसा तरन्नुम में झरना ग़ज़ल पढ़ रहा था परिंदों का बुस्तान महका रहे थे गुल-ए-तर ख़ियाबान महका रहे थे कड़ाके की सर्दी में भी रुत जवाँ थी ख़यालों को अरमान महका रहे थे जिधर भी उठा कर नज़र देखता था मुहब्बत से लबरेज़ थे सारे मंज़र ज़माने की हर शय हसीं लग रही थी गुल-ए-इश्क़ जब मेरे दिल में खिला था दिसंबर के जाने का यूँँ ही न ग़म है मुझे वो दिसम्बर के मह में मिला था नया साल आने की है तो ख़ुशी पर दिसम्बर के जाने का ग़म भी बहुत है

YAWAR ALI0 Likes

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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा

Rakesh Mahadiuree

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"जन्मदिन मुबारक" दिन ये सोने से, रातें ये रंगीन मुबारक ऐ मेरी साँसों की रवानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक भवरें मुस्काएँ, फूलों की डाली-डाली हँसें जब तू मुस्काए, तेरे होंठों की लाली हँसें मेरा कत़्ल करे, तेरे नैन कजरारे काले मजरूह हुए ना जाने कितने मतवाले तुझ को ये बहारें शौकीन मुबारक ऐ मेरी तसव्वुर की रानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक

Vikas Sangam

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"बे-असर हिज्र" यार तेरे जाने से कुछ नहीं बदला ये झूठ नहीं है सचमुच नहीं बदला हाँ आज भी वही अदाएँ हैं मेरी वही लहजा है वही सदाएँ हैं मेरी कभी मैं ने ख़ुद पर ग़म तारी न किया तेरी बे-रुख़ी को कहीं जारी ना किया हर बात पर मुस्कुराने की आदत न गई तेरे ख़ातिर रातों की इबादत न गई बा'द तेरे जाने के कई ख़्वाब सजाए हैं तू नहीं तो तेरी यादों को शे'र सुनाए हैं बस यही बताना था कि कुछ नहीं बदला ये झूठ नहीं है सचमुच नहीं बदला

"Nadeem khan' Kaavish"

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"शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम" कभी अंदाज़ा तो लगाओ तुम शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम हर घड़ी मैं ने बस तुम्हारा इंतिज़ार किया अपने ख़्वाबों में, ख़यालों में तुम्हें प्यार किया इक दफ़ा ही सही, मुझे सीने से लगाओ तुम हाँ शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम पल-पल डरता रहा हूँ तुम्हें खोने से भी पास आने से भी दूर होने से भी मुझे ख़ुद में छुपा सको तो छुपाओ तुम हाँ शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम सूना सूना तुम बिन मुझे जहाँ लगे जैसे चाँद बिन सूना आसमाँ लगे फिर से मेरी दुनिया में लौट आओ तुम हाँ शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम

Vikas Sangam

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"आँखों की ख़ातिर" उस की आँखों की ख़ातिर या उस की आँखों के वास्ते उस से जुदा होना एक गुनाह है मुझे कि हाँ ये भी एक सबब है उस से जुदा या महजूर न होने का कि जब जब ख़याल-ए-फ़िराक़ आता है मेरे ज़ेहन में तो मैं उस की वो आँखें ही तो याद करता हूँ कि क्या होगा जब छोड़ दूँगा उन आँखों को दरमियान-ए-सफ़र क्या वो अफ़सुर्दा आँखें फिर सह पाएँगी ये महजूरी मेरी वो आँखें जिन में एक उम्र तलक खोया रहा हूँ मैं वो आँखें जो मुझे मुझ से ज़्यादा जानती हैं वो आँखें जिन में महफ़ूज़ हैं सारी यादें सारी बातें सारे लम्हें और सब आलम अपने सुख दुख के वो आँखें जो मेरे हर ख़्वाब को अपना ख़्वाब मानती हैं और जिस के ख़ुद के ख़्वाब मा-तहती हुए हैं वो आँखें जो अपने माज़ी में बड़ी परेशान रही हैं वो आँखें जो मुझे एक उम्मीद से देखती हैं अभी और अब इस मौजूदा हाल में एक सुकून तलाशती हैं मुझ में कहीं वो आँखें जो अभी भी सहमी हुई हैं पर एक कशिश लौटी है मेरे आने से वो आँखें जिन से वा'दा कर चुका हूँ मैं कि कभी सबब-ए-गिर्या न बनूँगा और कभी दरमियान-ए-सफ़र न छोड़ूँगा उन्हें

Zaan Farzaan

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