nazmKuch Alfaaz

देसों में सब से अच्छा हिन्दोस्तान मेरा रू-ए-ज़मीं पे जन्नत, जन्नत-निशान मेरा हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा वो प्यारा प्यारा मंज़र, वो मोहनी फ़ज़ाएँ वो ऊँचे ऊँचे पर्बत वो दिल-फ़ज़ा गुफाएँ हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा तीनों तरफ़ समुंदर, चौथी तरफ़ हिमाला है पासबान इस का, इस का बनाने वाला हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा ग़ुंचों का वो चटकना, फूलों का वो महकना पंछी पखेरुओं का वो सुब्ह-दम चहकना हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा धी में सुरों में गंगा ये गीत गा रही है जमुना भी अपने मुँह में ये गुनगुना रही है हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा गोकुल का इक ग्वाला बंसी बजा रहा है बंसी की लय में वो भी इक गीत गा रहा है हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा दुनिया के सारे मेवे इस गुल्सितान में हैं सब नेमतें मुयस्सर हिन्दोस्तान में हैं हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा मेरा निशाँ यही है, मेरा जहाँ यही है जन्नत मिरी यही है, मेरा मकाँ यही है हिन्दोस्तान मेरा, हिन्दोस्तान मेरा

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन गुल-पोश तेरी वादियाँ फ़रहत-निशाँ राहत-रसाँ तेरे चमन-ज़ारों पे है गुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँ हर शाख़ फूलों की छड़ी हर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँ कौसर के चश्में जा-ब-जा तसनीम हर आब-ए-रवाँ हर बर्ग रूह-ए-ताज़गी हर फूल जान-ए-गुल्सिताँ हर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशी हर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँ दिलकश चरागाहें तिरी ढोरों के जिन में कारवाँ अंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौ हर तख़्ता-ए-गुल आसमाँ नक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जा हर हर रविश इक कहकशाँ तेरी बहारें दाइमी तेरी बहारें जावेदाँ तुझ में है रूह-ए-ज़िंदगी पैहम रवाँ पैहम दवाँ दरिया वो तेरे तुंद-ख़ू झीलें वो तेरी बे-कराँ शाम-ए-अवध के लब पे है हुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँ कहती है राज़-ए-सरमदी सुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँ उड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक पर उन कार-ख़ानों का धुआँ जिन में हैं लाखों मेहनती सनअत-गरी के पासबाँ तेरी बनारस की ज़री रश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँ बीदर की फ़नकारी में हैं सनअत की सब बारीकियाँ अज़्मत तिरे इक़बाल की तेरे पहाड़ों से अयाँ दरियाओं का पानी, तरी तक़्दीस का अंदाज़ा-दाँ क्या 'भारतेंदु' ने किया गंगा की लहरों का बयाँ 'इक़बाल' और चकबस्त हैं अज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ 'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैं तेरे अदब के तर्जुमाँ 'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरी ता'रीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँ गाते हैं नग़्मा मिल के सब ऊँचा रहे तेरा निशाँ मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तेरे नज़ारों के नगीं दुनिया की ख़ातम में नहीं सारे जहाँ में मुंतख़ब कश्मीर की अर्ज़-ए-हसीं फ़ितरत का रंगीं मोजज़ा फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं हाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमीं सरसब्ज़ जिस के दश्त हैं जिस के जबल हैं सुर्मगीं मेवे ब-कसरत हैं जहाँ शीरीं मिसाल-ए-अंग्बीं हर ज़ाफ़राँ के फूल में अक्स-ए-जमाल-ए-हूरईं वो मालवे की चाँदनी गुम जिस में हों दुनिया-ओ-दीं इस ख़ित्ता-ए-नैरंग में हर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रीं हर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगी दिलकश मकाँ दिलकश ज़मीं हर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रू हर एक औरत नाज़नीं वो ताज की ख़ुश-पैकरी हर ज़ाविए से दिल-नशीं सनअत-गरों के दौर की इक यादगार-ए-मरमरीं होती है जो हर शाम को फ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरीं दरिया की मौजों से अलग या इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बीं या ताएर-ए-नूरी कोई परवाज़ करने के क़रीं या अहल-ए-दुनिया से अलग इक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ी नक़्श-ए-अजंता की क़सम जचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चीं शान-ए-एलोरा देख कर झुकती है आज़र की जबीं चित्तौड़ हो या आगरा ऐसे नहीं क़िलए कहीं बुत-गर हो या नक़्क़ाश हो तू सब की अज़्मत का अमीं मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन दिलकश तिरे दश्त ओ चमन रंगीं तिरे शहर ओ चमन तेरे जवाँ राना जवाँ तेरे हसीं गुल पैरहन इक अंजुमन दुनिया है ये तू इस में सद्र-ए-अंजुमन तेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवा शाएर तिरे शीरीं-सुख़न हर ज़र्रा इक माह-ए-मुबीं हर ख़ार रश्क-ए-नस्तरीं ग़ुंचा तिरे सहरा का है इक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन कंकर हैं तेरे बे-बहा पत्थर तिरे लाल-ए-यमन बस्ती से जंगल ख़ूब-तर बाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बन वो मोर वो कब्क-ए-दरी वो चौकड़ी भरते हिरन रंगीं-अदा वो तितलियाँ बाँबी में वो नागों के फन वो शे'र जिन के नाम से लरज़े में आए अहरमन खेतों की बरकत से अयाँ फ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिनन चश्मों के शीरीं आब से लज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहन ताबिंदा तेरा अहद-ए-नौ रौशन तिरा अहद-ए-कुहन कितनों ने तुझ पर कर दिया क़ुर्बान अपना माल धन कितने शहीदों को मिले तेरे लिए दार-ओ-रसन कितनों को तेरा इश्क़ था कितनों को थी तेरी लगन तेरे जफ़ा-कश मेहनती रखते हैं अज़्म-ए-कोहकन तेरे सिपाही सूरमा बे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन 'भीषम' सा जिन में हौसला 'अर्जुन' सा जिन में बाँकपन आलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैं फ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न 'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल' 'दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण' 'वलाठोल', 'माहिर', भारती 'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन' 'कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद' 'टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन' मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन खेती तिरी हर इक हरी दिलकश तिरी ख़ुश-मंज़री तेरी बिसात-ए-ख़ाक के ज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरी झेलम कावेरी नाग वो गंगा की वो गंगोत्री वो नर्बदा की तमकनत वो शौकत-ए-गोदावरी पाकीज़गी सरजू की वो जमुना की वो ख़ुश-गाैहरी दुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँ कश्मीर की नीलम-परी दिलकश पपीहे की सदा कोयल की तानें मद-भरी तीतर का वो हक़ सिर्रहु तूती का वो विर्द-ए-हरी सूफ़ी तिरे हर दौर में करते रहे पैग़म्बरी 'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिली फ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरी अदल-ए-जहाँगीरी में थी मुज़्मर रेआया-पर्वरी वो नव-रतन जिन से हुई तहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरी रखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़ल इक सौलत-ए-अस्कंदरी रानाओं के इक़बाल की होती है किस से हम-सरी सावंत वो योद्धा तिरे तेरे जियाले वो जरी नीती विदुर की आज तक करती है तेरी रहबरी अब तक है मशहूर-ए-ज़माँ 'चाणक्य' की दानिश-वरी वयास और विश्वामित्र से मुनियों की शान-ए-क़ैसरी पातंजलि ओ साँख से ऋषियों की हिकमत-पर्वरी बख़्शे तुझे इनआम-ए-नौ हर दौर चर्ख़-ए-चम्बरी ख़ुश-गाैहरी दे आब को और ख़ाक को ख़ुश-जौहरी ज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँ क़तरों को दरिया-गुस्तरी मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तू रहबर-ए-नौ-ए-बशर तू अम्न का पैग़ाम-बर पाले हैं तू ने गोद में साहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़र अफ़ज़ल-तरीं इन सब में है बापू का नाम-ए-मो'तबर हर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशीं हर बात जिस की पुर-असर जिस ने लगाया दहर में नारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर बे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँ बे-सूद हैं तेग़-ओ-तबर हिंसा का रस्ता झूट है हक़ है अहिंसा की डगर दरमाँ है ये हर दर्द का ये हर मरज़ का चारा-गर जंगाह-ए-आलम में कोई इस से नहीं बेहतर सिपर करता हूँ मैं तेरे लिए अब ये दुआ-ए-मुख़्तसर रौनक़ पे हों तेरे चमन सरसब्ज़ हों तेरे शजर नख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरी हर फ़स्ल में हो बारवर कोशिश हो दुनिया में कोई ख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बर तेरा हर इक बासी रहे नेको-सिफ़त नेको-सियर हर ज़न सलीक़ा-मंद हो हर मर्द हो साहिब-हुनर जब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लक जब तक हैं ये शम्स ओ क़मर मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन

Arsh Malsiyani

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