रद्दी अख़बार की तरह मुझे बेच दिया गया एक कबाड़ी के हाथों तराज़ुओं में तोल कर उस ने मेरी क़ीमत आँक दी ख़ूब-सूरत जिल्द जिस पर मेरा उनवान लिखा था उस ने नोच फेंकी वज़्न बढ़ाने वाला गत्ते का टुकड़ा उसे क़ुबूल नहीं था मैं बे-नाम हो गई मेरे औराक़ फड़फड़ा उठे कसमसा उठे तब एक भारी बाट धर दिया गया मुझ पर और मैं नई ताज़ा हवा से महरूम हो गई रद्दी के गट्ठर के साथ वो कबाड़ी मुझे अपने घर ले गया वहाँ मेरा एक एक वरक़ फाड़ा गया लिफ़ाफ़े बनाए गए हल्दी धनिया और मिर्च रखने के लिए माहिर उँगलियाँ लिफ़ाफ़े बना रही थीं मेरे सफ़्हों पर लिखी इबारतें टूट-फूट कर सामने आ रही थीं क्या ग़ज़ब है नहीं इंसान को इंसान की क़द्र हर फ़रिश्ते को ये हसरत है कि इंसाँ होता लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँँ आख़िरी वरक़ को एक बच्चे ने उठा लिया खेल खेल में हवाई जहाज़ बना कर आसमान में उड़ा दिया इस पर लिखा था मैं कहाँ रुकता हूँ अर्श-ओ-फ़र्श की आवाज़ से मुझ को जाना है बहुत ऊँचा हद-ए-पर्वाज़ से
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें तुम्हारे लिए चाहूँ क्यूँँ भला क्या कभी तुम ने मुझे मेरे लिए चाहा नहीं ना दर-अस्ल ये चाहने और न चाहने की ख़्वाहिश ही बे-मा'नी है बा-मा'नी है तो बस चाहत मेरी चाहत तुम्हारी चाहत या फिर किसी और की चाहत
Deepti Mishra
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बात है तो कुछ ऐब सी लेकिन फिर भी है हो गई थी मोहब्बत एक मर्द को एक सुनहरी मछली से लहरों से अटखेलियाँ करती बल खाती चमचमाती मछली भा गई थी मर्द को टुकटुकी बाँधे पहरों देखता रहता वो उस शोख़ की अठखेलियाँ मछली को भी अच्छा लगता था मर्द का इस तरह से निहारना बंध गए दोनों प्यार के बंधन में मिलन की ख़्वाहिश फ़ितरी थी मर्द ने मछली से इल्तिजा की एक बार सिर्फ़ एक बार पानी से बाहर आने की कोशिश करो मोहब्बत का जुनून इतना शदीद था कि बग़ैर कुछ सोचे-समझे मछली पानी से बाहर आ गई छट-पटा गई बहुत बरी तरह से छट-पटा गई लेकिन अब वो अपने महबूब की बाँहों में थी मोहब्बत की कैफ़ियत में कुछ पल को सारी तड़प सारी छट-पटाहट जाती रही दो बदन इक जान हो गए सैराब हो कर महबूब ने महबूबा को पानी के सुपुर्द कर दिया बड़ा अनोखा बड़ा मसर्रत-अंगेज़ और बड़ा दर्दनाक था ये मेल हर बार पूरी ताक़त बटोर कर चल पड़ती महबूबा महबूब से मिलने तड़फड़ाती छट-पटाती प्यार देती प्यार पाती सैराब करती सैराब होती और फिर लौट आती पानी में एक दिन मछली को जाने क्या सूझी उस ने मर्द से कहा आज तुम आओ मैं पानी में कैसे आऊँ कुछ पल अपने साँसें रोक लो मछली ने कहा साँस रोक लूँ या'नी जीना रोक लूँ कुछ पल जीने के लिए ही तो आता हूँ मैं तुम्हारे पास साँस रोक लूँगा तो जि यूँँगा कैसे मर्द ने कहा मछली सकते में थी एक ही पल में: मर्द की फ़ितरत और मोहब्बत के बाहमी रिश्ते की सच्चाई उस के सामने थी अब कुछ जानने पाने और चाहने को बाक़ी नहीं बचा था मछली ने बे-कैफ़ निगाहों से मर्द को देखा और डूब गई बे-पनाह गहराइयों में उधर ख़ुद से बे-ख़बर मर्द जीने की ख़्वाहिश लिए अभी तक वहीं बैठा है और सोच रहा है मेरा क़ुसूर क्या है
Deepti Mishra
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अक्सर दिखाई दे जाते हैं कहीं न कहीं ख़ुशी के आँसू लेकिन क्या कभी किसी ने ग़म की हँसी भी सुनी है मैं ने सुनी है अक्सर सुनती हूँ बे-साख़्ता खिलखिलाते हुए सुना है ख़ुद को मैं ने कितनी ही बार हर बार हँसी में उड़ जाता है सारा ग़म कुछ पुल के लिए बस कुछ पल के लिए
Deepti Mishra
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सच है प्यासी हूँ मैं बेहद प्यासी लेकिन तुम से किस ने कहा कि तुम मेरी प्यास बुझाओ कहीं ज़ियादा ख़ाली हो तुम मुझ से कहीं ज़ियादा रेते और तुम्हें एहसास तक नहीं भरना चाहते हो तुम अपना ख़ाली-पन मेरी प्यास बुझाने के नाम पर तअ'ज्जुब है मुझे मुकम्मल बनाना चाहता है एक आधा अधूरा इंसान
Deepti Mishra
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