अक्सर दिखाई दे जाते हैं कहीं न कहीं ख़ुशी के आँसू लेकिन क्या कभी किसी ने ग़म की हँसी भी सुनी है मैं ने सुनी है अक्सर सुनती हूँ बे-साख़्ता खिलखिलाते हुए सुना है ख़ुद को मैं ने कितनी ही बार हर बार हँसी में उड़ जाता है सारा ग़म कुछ पुल के लिए बस कुछ पल के लिए
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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे
Gorakh Pandey
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें तुम्हारे लिए चाहूँ क्यूँँ भला क्या कभी तुम ने मुझे मेरे लिए चाहा नहीं ना दर-अस्ल ये चाहने और न चाहने की ख़्वाहिश ही बे-मा'नी है बा-मा'नी है तो बस चाहत मेरी चाहत तुम्हारी चाहत या फिर किसी और की चाहत
Deepti Mishra
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बात है तो कुछ ऐब सी लेकिन फिर भी है हो गई थी मोहब्बत एक मर्द को एक सुनहरी मछली से लहरों से अटखेलियाँ करती बल खाती चमचमाती मछली भा गई थी मर्द को टुकटुकी बाँधे पहरों देखता रहता वो उस शोख़ की अठखेलियाँ मछली को भी अच्छा लगता था मर्द का इस तरह से निहारना बंध गए दोनों प्यार के बंधन में मिलन की ख़्वाहिश फ़ितरी थी मर्द ने मछली से इल्तिजा की एक बार सिर्फ़ एक बार पानी से बाहर आने की कोशिश करो मोहब्बत का जुनून इतना शदीद था कि बग़ैर कुछ सोचे-समझे मछली पानी से बाहर आ गई छट-पटा गई बहुत बरी तरह से छट-पटा गई लेकिन अब वो अपने महबूब की बाँहों में थी मोहब्बत की कैफ़ियत में कुछ पल को सारी तड़प सारी छट-पटाहट जाती रही दो बदन इक जान हो गए सैराब हो कर महबूब ने महबूबा को पानी के सुपुर्द कर दिया बड़ा अनोखा बड़ा मसर्रत-अंगेज़ और बड़ा दर्दनाक था ये मेल हर बार पूरी ताक़त बटोर कर चल पड़ती महबूबा महबूब से मिलने तड़फड़ाती छट-पटाती प्यार देती प्यार पाती सैराब करती सैराब होती और फिर लौट आती पानी में एक दिन मछली को जाने क्या सूझी उस ने मर्द से कहा आज तुम आओ मैं पानी में कैसे आऊँ कुछ पल अपने साँसें रोक लो मछली ने कहा साँस रोक लूँ या'नी जीना रोक लूँ कुछ पल जीने के लिए ही तो आता हूँ मैं तुम्हारे पास साँस रोक लूँगा तो जि यूँँगा कैसे मर्द ने कहा मछली सकते में थी एक ही पल में: मर्द की फ़ितरत और मोहब्बत के बाहमी रिश्ते की सच्चाई उस के सामने थी अब कुछ जानने पाने और चाहने को बाक़ी नहीं बचा था मछली ने बे-कैफ़ निगाहों से मर्द को देखा और डूब गई बे-पनाह गहराइयों में उधर ख़ुद से बे-ख़बर मर्द जीने की ख़्वाहिश लिए अभी तक वहीं बैठा है और सोच रहा है मेरा क़ुसूर क्या है
Deepti Mishra
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सच है प्यासी हूँ मैं बेहद प्यासी लेकिन तुम से किस ने कहा कि तुम मेरी प्यास बुझाओ कहीं ज़ियादा ख़ाली हो तुम मुझ से कहीं ज़ियादा रेते और तुम्हें एहसास तक नहीं भरना चाहते हो तुम अपना ख़ाली-पन मेरी प्यास बुझाने के नाम पर तअ'ज्जुब है मुझे मुकम्मल बनाना चाहता है एक आधा अधूरा इंसान
Deepti Mishra
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रद्दी अख़बार की तरह मुझे बेच दिया गया एक कबाड़ी के हाथों तराज़ुओं में तोल कर उस ने मेरी क़ीमत आँक दी ख़ूब-सूरत जिल्द जिस पर मेरा उनवान लिखा था उस ने नोच फेंकी वज़्न बढ़ाने वाला गत्ते का टुकड़ा उसे क़ुबूल नहीं था मैं बे-नाम हो गई मेरे औराक़ फड़फड़ा उठे कसमसा उठे तब एक भारी बाट धर दिया गया मुझ पर और मैं नई ताज़ा हवा से महरूम हो गई रद्दी के गट्ठर के साथ वो कबाड़ी मुझे अपने घर ले गया वहाँ मेरा एक एक वरक़ फाड़ा गया लिफ़ाफ़े बनाए गए हल्दी धनिया और मिर्च रखने के लिए माहिर उँगलियाँ लिफ़ाफ़े बना रही थीं मेरे सफ़्हों पर लिखी इबारतें टूट-फूट कर सामने आ रही थीं क्या ग़ज़ब है नहीं इंसान को इंसान की क़द्र हर फ़रिश्ते को ये हसरत है कि इंसाँ होता लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँँ आख़िरी वरक़ को एक बच्चे ने उठा लिया खेल खेल में हवाई जहाज़ बना कर आसमान में उड़ा दिया इस पर लिखा था मैं कहाँ रुकता हूँ अर्श-ओ-फ़र्श की आवाज़ से मुझ को जाना है बहुत ऊँचा हद-ए-पर्वाज़ से
Deepti Mishra
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