सच है प्यासी हूँ मैं बेहद प्यासी लेकिन तुम से किस ने कहा कि तुम मेरी प्यास बुझाओ कहीं ज़ियादा ख़ाली हो तुम मुझ से कहीं ज़ियादा रेते और तुम्हें एहसास तक नहीं भरना चाहते हो तुम अपना ख़ाली-पन मेरी प्यास बुझाने के नाम पर तअ'ज्जुब है मुझे मुकम्मल बनाना चाहता है एक आधा अधूरा इंसान
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें तुम्हारे लिए चाहूँ क्यूँँ भला क्या कभी तुम ने मुझे मेरे लिए चाहा नहीं ना दर-अस्ल ये चाहने और न चाहने की ख़्वाहिश ही बे-मा'नी है बा-मा'नी है तो बस चाहत मेरी चाहत तुम्हारी चाहत या फिर किसी और की चाहत
Deepti Mishra
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बात है तो कुछ ऐब सी लेकिन फिर भी है हो गई थी मोहब्बत एक मर्द को एक सुनहरी मछली से लहरों से अटखेलियाँ करती बल खाती चमचमाती मछली भा गई थी मर्द को टुकटुकी बाँधे पहरों देखता रहता वो उस शोख़ की अठखेलियाँ मछली को भी अच्छा लगता था मर्द का इस तरह से निहारना बंध गए दोनों प्यार के बंधन में मिलन की ख़्वाहिश फ़ितरी थी मर्द ने मछली से इल्तिजा की एक बार सिर्फ़ एक बार पानी से बाहर आने की कोशिश करो मोहब्बत का जुनून इतना शदीद था कि बग़ैर कुछ सोचे-समझे मछली पानी से बाहर आ गई छट-पटा गई बहुत बरी तरह से छट-पटा गई लेकिन अब वो अपने महबूब की बाँहों में थी मोहब्बत की कैफ़ियत में कुछ पल को सारी तड़प सारी छट-पटाहट जाती रही दो बदन इक जान हो गए सैराब हो कर महबूब ने महबूबा को पानी के सुपुर्द कर दिया बड़ा अनोखा बड़ा मसर्रत-अंगेज़ और बड़ा दर्दनाक था ये मेल हर बार पूरी ताक़त बटोर कर चल पड़ती महबूबा महबूब से मिलने तड़फड़ाती छट-पटाती प्यार देती प्यार पाती सैराब करती सैराब होती और फिर लौट आती पानी में एक दिन मछली को जाने क्या सूझी उस ने मर्द से कहा आज तुम आओ मैं पानी में कैसे आऊँ कुछ पल अपने साँसें रोक लो मछली ने कहा साँस रोक लूँ या'नी जीना रोक लूँ कुछ पल जीने के लिए ही तो आता हूँ मैं तुम्हारे पास साँस रोक लूँगा तो जि यूँँगा कैसे मर्द ने कहा मछली सकते में थी एक ही पल में: मर्द की फ़ितरत और मोहब्बत के बाहमी रिश्ते की सच्चाई उस के सामने थी अब कुछ जानने पाने और चाहने को बाक़ी नहीं बचा था मछली ने बे-कैफ़ निगाहों से मर्द को देखा और डूब गई बे-पनाह गहराइयों में उधर ख़ुद से बे-ख़बर मर्द जीने की ख़्वाहिश लिए अभी तक वहीं बैठा है और सोच रहा है मेरा क़ुसूर क्या है
Deepti Mishra
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अक्सर दिखाई दे जाते हैं कहीं न कहीं ख़ुशी के आँसू लेकिन क्या कभी किसी ने ग़म की हँसी भी सुनी है मैं ने सुनी है अक्सर सुनती हूँ बे-साख़्ता खिलखिलाते हुए सुना है ख़ुद को मैं ने कितनी ही बार हर बार हँसी में उड़ जाता है सारा ग़म कुछ पुल के लिए बस कुछ पल के लिए
Deepti Mishra
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रद्दी अख़बार की तरह मुझे बेच दिया गया एक कबाड़ी के हाथों तराज़ुओं में तोल कर उस ने मेरी क़ीमत आँक दी ख़ूब-सूरत जिल्द जिस पर मेरा उनवान लिखा था उस ने नोच फेंकी वज़्न बढ़ाने वाला गत्ते का टुकड़ा उसे क़ुबूल नहीं था मैं बे-नाम हो गई मेरे औराक़ फड़फड़ा उठे कसमसा उठे तब एक भारी बाट धर दिया गया मुझ पर और मैं नई ताज़ा हवा से महरूम हो गई रद्दी के गट्ठर के साथ वो कबाड़ी मुझे अपने घर ले गया वहाँ मेरा एक एक वरक़ फाड़ा गया लिफ़ाफ़े बनाए गए हल्दी धनिया और मिर्च रखने के लिए माहिर उँगलियाँ लिफ़ाफ़े बना रही थीं मेरे सफ़्हों पर लिखी इबारतें टूट-फूट कर सामने आ रही थीं क्या ग़ज़ब है नहीं इंसान को इंसान की क़द्र हर फ़रिश्ते को ये हसरत है कि इंसाँ होता लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँँ आख़िरी वरक़ को एक बच्चे ने उठा लिया खेल खेल में हवाई जहाज़ बना कर आसमान में उड़ा दिया इस पर लिखा था मैं कहाँ रुकता हूँ अर्श-ओ-फ़र्श की आवाज़ से मुझ को जाना है बहुत ऊँचा हद-ए-पर्वाज़ से
Deepti Mishra
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