एक दिन एक दिन जब दिल और दिमाग़ आलस के सफ़र में होंगे जब ज़िन्दगी भी थोड़ा आराम फ़रमा रही होगी वो दिन अलग सी छुट्टी का दिन होगा जब पुरानी यादों के रहगुज़र से गुज़रने के बजाए मैं नई यादों के तलाश में होऊँगा कुछ नया करने का जुनून होगा मेरी बाहों के आग़ोश में सिर्फ़ सुकून होगा जब साहिल पर पहाड़ खड़े हुए दिखेंगे और झरने समुंदर में मिलते दिखेंगे मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जिस दिन सूरज भी देर तक सफ़र में हो जब चाँद का भी घर जाने का मन न करे जैसे कभी कभी मैं दफ़्तर में देर तक रहता हूँ तारे भी थोड़ा सा ओवरटाइम करें या फिर कोई दिन जो खुले आसमाँ की तरह अपनी बाँहों को खोले मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जब मैं अपने दिल में दबी यादों को ज़ख़्मों को ग़मों को बे-रंग आँसुओं में तब्दील कर के ख़ुशी के झरनों में तब्दील कर के किसी समुंदर में घोल दूँ मुझे ऐसा एक दिन चाहिए
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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"कैसे हो तुम" काफ़ी वक़्त गुज़र गया तुम सेे बात नहीं हुई उम्मीद है तुम अच्छे होगे ख़ैर मैं भी ठीक हूँ या यूँँ कहा जाए तेरा जो हाल है मेरा वो हाल है सब कितना तेज़ बदलता है ना वक़्त बदलता है बदल जाता है मौसम बदले हैं हम साथ बदल जाते हैं हमारे चेहरे चेहरे की शिकन माथे पर लकीरें भी बढ़ जाती हैं वक़्त के साथ साथ उम्र के साथ साथ सूरज भी डूब गया ये शाम भी गुज़र जाएगी धीरे धीरे ये आग भी बुझ जाएगी बुझ जाएगी ये सिगरेट भी और बुझ जाऊँगा मैं भी इस इंतिज़ार में कि तुम कभी तो मुझ सेे पूछोगे कैसे हो तुम कैसे हो तुम
Saurabh Yadav Kaalikhh
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"ऐश ट्रे" एक आग ज़माने में लगी हुई है और एक ज़माने भर के लोगों में और एक लगी हुई है इस सिगरेट में जो मेरी उँगलियों के बीच में फँसी हुई है जलने और सुलगने में बहुत फ़र्क़ है ये फ़र्क़ आप को समझ आएगा जब आप किसी जलती हुई लाश के सामने बैठ कर कुछ कश लगाएँगे मेरी सिगरेट सुलग सुलग कर झड़ने के लिए ऐश ट्रे की तरफ़ भागती है इंसान कहाँ भागता है नहीं भाग पाता ना ता'उम्र जलकर झड़ने के वक़्त चार कंधों पर ले जाया जाता है और फूँक दिया जाता है बड़ी आसानी से जैसे मैं ये सिगरेट फूँक रहा हूँ तब्दील हो जाता है राख में मिट्टी में मेरी जलती हुई सिगरेट की तरह हम सब भी क़तार में हैं जैसे क़तार में लगी हुई हैं सिगरेटें डिब्बी में जलकर किसी के होंठों में लग कर सुलगने को बेताब राख होने को बेताब दफ़्न होने को बेताब सिगरेटें हम सिगरेट ही तो हैं और ये दुनिया एक ऐश ट्रे
Saurabh Yadav Kaalikhh
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ख़्वाबों की क़ीमत ये हाथों की पैरों की मिटती लकीरें शरीर से बाहर की ओर भागती नसें इन्हें देख कर मन व्यथित हो उठता है देख कर एहसास होता है कि ज़िन्दगी का एक पहलू ऐसा भी है जहाँ सिर्फ़ दो पहर की रोटी कमाकर इंसान सितारों संग सुकून से सोता है ये सुकून दो वक़्त की रोटी कमाकर आता है या फिर अपनी आँखों के ख़्वाबों को बेचकर वो सारे ख़्वाब जो बचपन के वक़्त मासूम आँखों में समा जाते हैं जिन्हें ज़िंदा रख हम तुम ज़िन्दगी गुज़ारते चले जाते हैं ये सोच कर एक और सवाल मेरे ज़ेहन में आ पड़ता है कि किस में ज़्यादा दर्द है ख़्वाबों को मारने में या उन्हें बेचने में किस में ज़्यादा ना-उम्मीदी है कौन इंसान को जीते जी मार देता है आख़िर कौन ख़्वाबों को मार देना या उन्हें बेच देना इन्हीं सवालों में झुलसा हुआ एक सवाल सा झूल रहा हूँ मैं इस झूले में जो उलझी रस्सी के सहारे लटका है और इस झूले से लटका हुआ मैं ज़िन्दगी को परत दर परत खोलने की फ़िराक़ में ज़िंदा हूँ इन्हीं कुछ जाएज़ सवालों के साथ ये हाथों की पैरों की मिटती लकीरों के साथ शरीर से बाहर की ओर भागती नसों के साथ मैं ज़िंदा हूँ
Saurabh Yadav Kaalikhh
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"ज़िंदगी ख़्वाब सी" आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं लोग जैसे पेड़ों से छीनी हुई छाँव जैसे समुंदर में दूर खोई हुई नाव ये वक़्त भी अजीब चीज़ होती है ना वक़्त गुजरते वक़्त नहीं लगता है ना और जब आगे देखता हूँ तो ख़्वाब दिखते हैं वो ख़्वाब जिन में मैं बस खो जाना चाहता हूँ जिन में खो कर बह जाना चाहता हूँ वो सारे ख़्वाब जिन का होकर रह जाना चाहता हूँ आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं
Saurabh Yadav Kaalikhh
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"मैं जो मर जाऊँ कभी" मैं जो मर जाऊँ कभी मेरे बदन को कफ़न से नहीं तुम डाइरी के पन्नों से ढकना मेरी लाश पर लकड़ी नहीं मेरे कमरे की किताबों को तह करना मैं जो मर जाऊँ कभी बिल्कुल आँसू मत बहाना अगर आँसू बहेंगे मेरे साथ मेरी नज़्में भी मर जाएँगी मेरी ग़ज़लें सर नहीं उठा पाएँगी क्या तुम चाहते हो ये सब हो जाना शख़्स के साथ उस की शख़्सियत का मर जाना मैं जो मर जाऊँ कभी बिल्कुल आँसू मत बहाना मेरी क़ब्र पर हर रोज़ फूल वग़ैरह मत लाना हफ़्ते में कम-अज़-कम एक बार आ कर कोई नज़्म सुनाना कोई ग़ज़ल गुनगुनाना मैं जो मर जाऊँ कभी बिल्कुल आँसू मत बहाना
Saurabh Yadav Kaalikhh
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