"कैसे हो तुम" काफ़ी वक़्त गुज़र गया तुम सेे बात नहीं हुई उम्मीद है तुम अच्छे होगे ख़ैर मैं भी ठीक हूँ या यूँँ कहा जाए तेरा जो हाल है मेरा वो हाल है सब कितना तेज़ बदलता है ना वक़्त बदलता है बदल जाता है मौसम बदले हैं हम साथ बदल जाते हैं हमारे चेहरे चेहरे की शिकन माथे पर लकीरें भी बढ़ जाती हैं वक़्त के साथ साथ उम्र के साथ साथ सूरज भी डूब गया ये शाम भी गुज़र जाएगी धीरे धीरे ये आग भी बुझ जाएगी बुझ जाएगी ये सिगरेट भी और बुझ जाऊँगा मैं भी इस इंतिज़ार में कि तुम कभी तो मुझ सेे पूछोगे कैसे हो तुम कैसे हो तुम
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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एक दिन एक दिन जब दिल और दिमाग़ आलस के सफ़र में होंगे जब ज़िन्दगी भी थोड़ा आराम फ़रमा रही होगी वो दिन अलग सी छुट्टी का दिन होगा जब पुरानी यादों के रहगुज़र से गुज़रने के बजाए मैं नई यादों के तलाश में होऊँगा कुछ नया करने का जुनून होगा मेरी बाहों के आग़ोश में सिर्फ़ सुकून होगा जब साहिल पर पहाड़ खड़े हुए दिखेंगे और झरने समुंदर में मिलते दिखेंगे मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जिस दिन सूरज भी देर तक सफ़र में हो जब चाँद का भी घर जाने का मन न करे जैसे कभी कभी मैं दफ़्तर में देर तक रहता हूँ तारे भी थोड़ा सा ओवरटाइम करें या फिर कोई दिन जो खुले आसमाँ की तरह अपनी बाँहों को खोले मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जब मैं अपने दिल में दबी यादों को ज़ख़्मों को ग़मों को बे-रंग आँसुओं में तब्दील कर के ख़ुशी के झरनों में तब्दील कर के किसी समुंदर में घोल दूँ मुझे ऐसा एक दिन चाहिए
Saurabh Yadav Kaalikhh
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"ऐश ट्रे" एक आग ज़माने में लगी हुई है और एक ज़माने भर के लोगों में और एक लगी हुई है इस सिगरेट में जो मेरी उँगलियों के बीच में फँसी हुई है जलने और सुलगने में बहुत फ़र्क़ है ये फ़र्क़ आप को समझ आएगा जब आप किसी जलती हुई लाश के सामने बैठ कर कुछ कश लगाएँगे मेरी सिगरेट सुलग सुलग कर झड़ने के लिए ऐश ट्रे की तरफ़ भागती है इंसान कहाँ भागता है नहीं भाग पाता ना ता'उम्र जलकर झड़ने के वक़्त चार कंधों पर ले जाया जाता है और फूँक दिया जाता है बड़ी आसानी से जैसे मैं ये सिगरेट फूँक रहा हूँ तब्दील हो जाता है राख में मिट्टी में मेरी जलती हुई सिगरेट की तरह हम सब भी क़तार में हैं जैसे क़तार में लगी हुई हैं सिगरेटें डिब्बी में जलकर किसी के होंठों में लग कर सुलगने को बेताब राख होने को बेताब दफ़्न होने को बेताब सिगरेटें हम सिगरेट ही तो हैं और ये दुनिया एक ऐश ट्रे
Saurabh Yadav Kaalikhh
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यादों का कारवाँ सफ़र दर सफ़र यादें बनती जा रही हैं यादों की अलमारी सजती जा रही है हम को हम थोड़ा और मिलते जा रहे हैं वक़्त गुज़र रहा है हवा गुज़र रही है समुंदर के सहारे पानी गुज़र रहा है आसमाँ के सहारे चाँद तारे सूरज भी और साथ साथ ये मौसम भी ख़्वाहिशें गुज़र रही हैं गुज़र रहे हैं ख़्वाब भी हौले हौले एक रोज़ तुम गुज़र जाओगे हम गुज़र जाऍंगे फिर मिलेंगे किसी दुनिया में क्या पता इन्हीं दोस्तों और यादों के साथ जो कमा रहे हैं हम तुम इस दुनिया में
Saurabh Yadav Kaalikhh
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"ज़िंदगी ख़्वाब सी" आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं लोग जैसे पेड़ों से छीनी हुई छाँव जैसे समुंदर में दूर खोई हुई नाव ये वक़्त भी अजीब चीज़ होती है ना वक़्त गुजरते वक़्त नहीं लगता है ना और जब आगे देखता हूँ तो ख़्वाब दिखते हैं वो ख़्वाब जिन में मैं बस खो जाना चाहता हूँ जिन में खो कर बह जाना चाहता हूँ वो सारे ख़्वाब जिन का होकर रह जाना चाहता हूँ आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं
Saurabh Yadav Kaalikhh
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"एक और साल गुज़र गया" एक और साल गुज़र गया कोई हँस दिया कोई रो लिया किसी ने आँसुओं से मुँह धो लिया एक और साल गुज़र गया कोई मंज़िल तक गया कोई रहगुज़र में ठहर गया कोई अपने घर गया कोई पहुँच गया पहाड़ तो कोई दूर समुंदर गया एक और साल गुज़र गया कोई ज़िंदगी से लड़ता रहा कोई ज़िंदगी से थक गया कोई थक कर भी चलता रहा और कोई मौत संग रुक गया एक और साल गुज़र गया किसी ने ज़मीं से आसमाँ देखा किसी ने आसमाँ से ज़मीं कोई ख़ुशी ख़ुशी रहा कुछ को नसीब हुई नमी ज़िंदगी है कभी अच्छा कभी बुरा पहर गया एक और साल गुज़र गया
Saurabh Yadav Kaalikhh
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