"एक और साल गुज़र गया" एक और साल गुज़र गया कोई हँस दिया कोई रो लिया किसी ने आँसुओं से मुँह धो लिया एक और साल गुज़र गया कोई मंज़िल तक गया कोई रहगुज़र में ठहर गया कोई अपने घर गया कोई पहुँच गया पहाड़ तो कोई दूर समुंदर गया एक और साल गुज़र गया कोई ज़िंदगी से लड़ता रहा कोई ज़िंदगी से थक गया कोई थक कर भी चलता रहा और कोई मौत संग रुक गया एक और साल गुज़र गया किसी ने ज़मीं से आसमाँ देखा किसी ने आसमाँ से ज़मीं कोई ख़ुशी ख़ुशी रहा कुछ को नसीब हुई नमी ज़िंदगी है कभी अच्छा कभी बुरा पहर गया एक और साल गुज़र गया
Related Nazm
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
Jaun Elia
44 likes
"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
46 likes
"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
46 likes
More from Saurabh Yadav Kaalikhh
"ऐश ट्रे" एक आग ज़माने में लगी हुई है और एक ज़माने भर के लोगों में और एक लगी हुई है इस सिगरेट में जो मेरी उँगलियों के बीच में फँसी हुई है जलने और सुलगने में बहुत फ़र्क़ है ये फ़र्क़ आप को समझ आएगा जब आप किसी जलती हुई लाश के सामने बैठ कर कुछ कश लगाएँगे मेरी सिगरेट सुलग सुलग कर झड़ने के लिए ऐश ट्रे की तरफ़ भागती है इंसान कहाँ भागता है नहीं भाग पाता ना ता'उम्र जलकर झड़ने के वक़्त चार कंधों पर ले जाया जाता है और फूँक दिया जाता है बड़ी आसानी से जैसे मैं ये सिगरेट फूँक रहा हूँ तब्दील हो जाता है राख में मिट्टी में मेरी जलती हुई सिगरेट की तरह हम सब भी क़तार में हैं जैसे क़तार में लगी हुई हैं सिगरेटें डिब्बी में जलकर किसी के होंठों में लग कर सुलगने को बेताब राख होने को बेताब दफ़्न होने को बेताब सिगरेटें हम सिगरेट ही तो हैं और ये दुनिया एक ऐश ट्रे
Saurabh Yadav Kaalikhh
1 likes
"कैसे हो तुम" काफ़ी वक़्त गुज़र गया तुम सेे बात नहीं हुई उम्मीद है तुम अच्छे होगे ख़ैर मैं भी ठीक हूँ या यूँँ कहा जाए तेरा जो हाल है मेरा वो हाल है सब कितना तेज़ बदलता है ना वक़्त बदलता है बदल जाता है मौसम बदले हैं हम साथ बदल जाते हैं हमारे चेहरे चेहरे की शिकन माथे पर लकीरें भी बढ़ जाती हैं वक़्त के साथ साथ उम्र के साथ साथ सूरज भी डूब गया ये शाम भी गुज़र जाएगी धीरे धीरे ये आग भी बुझ जाएगी बुझ जाएगी ये सिगरेट भी और बुझ जाऊँगा मैं भी इस इंतिज़ार में कि तुम कभी तो मुझ सेे पूछोगे कैसे हो तुम कैसे हो तुम
Saurabh Yadav Kaalikhh
0 likes
एक दिन एक दिन जब दिल और दिमाग़ आलस के सफ़र में होंगे जब ज़िन्दगी भी थोड़ा आराम फ़रमा रही होगी वो दिन अलग सी छुट्टी का दिन होगा जब पुरानी यादों के रहगुज़र से गुज़रने के बजाए मैं नई यादों के तलाश में होऊँगा कुछ नया करने का जुनून होगा मेरी बाहों के आग़ोश में सिर्फ़ सुकून होगा जब साहिल पर पहाड़ खड़े हुए दिखेंगे और झरने समुंदर में मिलते दिखेंगे मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जिस दिन सूरज भी देर तक सफ़र में हो जब चाँद का भी घर जाने का मन न करे जैसे कभी कभी मैं दफ़्तर में देर तक रहता हूँ तारे भी थोड़ा सा ओवरटाइम करें या फिर कोई दिन जो खुले आसमाँ की तरह अपनी बाँहों को खोले मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जब मैं अपने दिल में दबी यादों को ज़ख़्मों को ग़मों को बे-रंग आँसुओं में तब्दील कर के ख़ुशी के झरनों में तब्दील कर के किसी समुंदर में घोल दूँ मुझे ऐसा एक दिन चाहिए
Saurabh Yadav Kaalikhh
1 likes
यादों का कारवाँ सफ़र दर सफ़र यादें बनती जा रही हैं यादों की अलमारी सजती जा रही है हम को हम थोड़ा और मिलते जा रहे हैं वक़्त गुज़र रहा है हवा गुज़र रही है समुंदर के सहारे पानी गुज़र रहा है आसमाँ के सहारे चाँद तारे सूरज भी और साथ साथ ये मौसम भी ख़्वाहिशें गुज़र रही हैं गुज़र रहे हैं ख़्वाब भी हौले हौले एक रोज़ तुम गुज़र जाओगे हम गुज़र जाऍंगे फिर मिलेंगे किसी दुनिया में क्या पता इन्हीं दोस्तों और यादों के साथ जो कमा रहे हैं हम तुम इस दुनिया में
Saurabh Yadav Kaalikhh
1 likes
"ज़िंदगी का सफ़र" ज़िंदगी की सड़क पर एक सफ़र पर चला मैं पैदा होते ही बचपन कब छूट गया कुछ पता नहीं चला जैसे जैसे उम्र बढ़ी सड़क भी बड़ी होती गई और बढ़ती गई हमारे तुम्हारे चलने को रफ़्तार भी तेज़ रफ़्तार के चक्कर में कुछ इतना तेज़ चलता गया मैं कि कितने रिश्तों को छोड़ा नातों को छोड़ा अपनों को खोया ना ही लम्हों को पिरोया दिल के क़रीब थी उन सारी अनगिनत बातों को छोड़ा ख़ूब-सूरत रातों को छोड़ा ख़ास मुलाक़ातों को भी बेवकूफों की तरह छोड़ आया मैं अब सड़क के उस मोड़ पर हूँ जहाँ एक बोर्ड लगा हुआ है दो निशान हैं जिस पर एक दाहिने तरफ़ जाने का और दूसरा बाएँ तरफ़ दाहिने तरफ़ का रास्ता जाता है फ़िरदौस की तरफ़ और बाएँ तरफ़ का रास्ता दोजख़ की तरफ़ और आगे सिर्फ़ खाई है लगता है उम्र से भी लंबे सफ़र में था मैं क्योंकि शायद बस भाग ही रहा था मैं सफ़र के अंत में आ कर अब ये तय करना मुश्किल है कि जाऊँ किधर दुनिया ने सिखाया था फ़िरदौस ख़ूब-सूरत है बस दाहिने तरफ़ मुड़ गया मैं और सत्यानाश देखिए कोई बोर्ड उल्टा लगा गया था एक सेकंड को लगा कि काश दुनिया ने ग़लत सिखाया होता तो ग़लती से ही मगर सही जगह पहुँचते मैं सोचता हूँ अब कि उस बोर्ड को देख कर काश मैं पलट गया होता
Saurabh Yadav Kaalikhh
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Saurabh Yadav Kaalikhh.
Similar Moods
More moods that pair well with Saurabh Yadav Kaalikhh's nazm.







