ये दीवानी सी इक लड़की हसीं भी दिलरुबा भी है अभी मा'सूम है लेकिन वफ़ा से आश्ना भी है मिरे घर की हैं दीवारें उसी के रंग से रौशन उसी के दम से पाकीज़ा मिरी उम्मीद का आँगन जबीं उस की सहर जैसी अज़ाँ देती हुई आँखें नज़र का इम्तिहाँ लेती शब-ए-तारीक सी ज़ुल्फ़ें निगाहें ज़िंदगी जैसी अदाएँ चाँदनी जैसी वफ़ा उस की मिरी ख़ातिर असा-ए-मूसवी जैसी तक़द्दुस हूर के जैसा सरापा नूर के जैसा मुकम्मल हुस्न है उस का मिरे दस्तूर के जैसा निगाहों के लिए मेरी ये है तनवीर-ए-मुस्तक़बिल ये सुब्ह-ए-नौ की मंज़िल है ये है तस्वीर-ए-मुस्तक़बिल हर इक अंदाज़ है उस का धनक मंज़र का हम-साया 'वली' ये लाडली बेटी मिरी हस्ती का सरमाया ये दीवानी तो है लेकिन यही दानिश-निशाँ होगी इसी की गोद में पल कर नई दुनिया जवाँ होगी
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"तस्वीर-कशी" जाँ अब तिरी तस्वीर में जो आने लगी है गुल-पोश हसीं शाम को बहकाने लगी है तस्वीर तिरी दिल मिरा बहलाने लगी है उजड़े हुए गुलज़ार को महकाने लगी है मैं बात जो करता था तो हो जाती थी नाराज़ अब आँख झुका लेती है शर्माने लगी है जो मुझ से लगातार बचाती रही नज़रें अब मुझ पे नज़र डाल के मुस्काने लगी है जो हाथ लगाने पे रहा करती थी ख़ामोश अब शे'र सुनाती है ग़ज़ल गाने लगी है मैं इस की अदाओं पे रहा मस्त हमेशा अब ये मिरे अश'आर पे लहराने लगी है जो प्यार के लम्हात तिरे साथ गुज़ारे तस्वीर तिरी बारहा दोहराने लगी है कल तक जो बनी रहती थी दीवार की ज़ीनत अब दिल के हर इक गोशे को गरमाने लगी है आँखों में मिरी देख के तस्वीर ख़ुद अपनी क्या जानिए किस बात पे इतराने लगी है सीने को ढके रखता था जो रेशमी आँचल दो चार दिनों से उसे सरकाने लगी है इक रोज़ इसे यूँँ ही कहीं छेड़ दिया था ये मुझ को उसी रोज़ से उकसाने लगी है अब इस पे भी कुछ रंग तिरा चढ़ने लगा तो बल खा के मिरे सामने इठलाने लगी है ग़लती से जो है देख ली तस्वीर कोई और मुरझा के अब इस तरह वो ग़म खाने लगी है कल रात 'बशर' हम ने जो शाने को हिलाया कहने लगी सो जाओ कि नींद आने लगी है
Dharmesh bashar
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"आँखों की ख़ातिर" उस की आँखों की ख़ातिर या उस की आँखों के वास्ते उस से जुदा होना एक गुनाह है मुझे कि हाँ ये भी एक सबब है उस से जुदा या महजूर न होने का कि जब जब ख़याल-ए-फ़िराक़ आता है मेरे ज़ेहन में तो मैं उस की वो आँखें ही तो याद करता हूँ कि क्या होगा जब छोड़ दूँगा उन आँखों को दरमियान-ए-सफ़र क्या वो अफ़सुर्दा आँखें फिर सह पाएँगी ये महजूरी मेरी वो आँखें जिन में एक उम्र तलक खोया रहा हूँ मैं वो आँखें जो मुझे मुझ से ज़्यादा जानती हैं वो आँखें जिन में महफ़ूज़ हैं सारी यादें सारी बातें सारे लम्हें और सब आलम अपने सुख दुख के वो आँखें जो मेरे हर ख़्वाब को अपना ख़्वाब मानती हैं और जिस के ख़ुद के ख़्वाब मा-तहती हुए हैं वो आँखें जो अपने माज़ी में बड़ी परेशान रही हैं वो आँखें जो मुझे एक उम्मीद से देखती हैं अभी और अब इस मौजूदा हाल में एक सुकून तलाशती हैं मुझ में कहीं वो आँखें जो अभी भी सहमी हुई हैं पर एक कशिश लौटी है मेरे आने से वो आँखें जिन से वा'दा कर चुका हूँ मैं कि कभी सबब-ए-गिर्या न बनूँगा और कभी दरमियान-ए-सफ़र न छोड़ूँगा उन्हें
Zaan Farzaan
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“ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ” ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब में तुझ को बाल बनाते छत पर देखा करता हूँ तेरी गली के बच्चों में फिर मैं भी खेला करता हूँ छत पर आने की मैं तुझ सेे रोज़ गुज़ारिश करता हूँ हाल-ए-दिल भी काग़ज़ पर लिख लिख के फेंका करता हूँ आज भी तेरी गलियों में मैं रास रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ लट बिखराकर एक तरफ़ तू मुझ को देखा करती है आँख दिखाया करती है सब घर हैं बताया करती है जल्दी से फिर काग़ज़ तू घूँघट में छुपाया करती है मेरे लिए और ग़ुस्से में तू चाँट दिखाया करती है ग़ुस्सा अच्छा लगता है ग़ुस्सा दिलवाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब-नगर की राज-कुमारी दिल में मुझ को रहने दे इश्क़ का दरिया दिल के साथ निगाहों से भी बहने दे तेरा दिल जो भी कहता है रोक न उस को कहने दे तेरा ग़म मेरा भी ग़म है साथ में मिल के सहने दे ख़्वाबों ही ख़्वाबों में तेरा दिल धड़काने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ तेरी निगाहें सुर की देवी छेड़ दें पल में साज़ अभी ये चाहे तो बदल के रख दें शाइ'र का अंदाज़ अभी आँखों ही आँखों में छुपाए तू ने दिल के राज़ अभी इश्क़ मोहब्बत का जल्दी से कर दे तू आग़ाज़ अभी मैं भी इतनी दूर से तुझ पर जान लुटाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ बात तो सुन ख़ातून मिरी ये दिल है मेरा प्रेम-नगर मैं तो अभी आ जाऊँ रहने कह दे तू इक बार अगर तू हो मेरे साथ अगर तो चाँद पे भी कर लूँगा घर तेरे बिना लगता है अधूरा इश्क़ मोहब्बत का ये सफ़र इस दुनिया में मैं तुझ सेे ही ब्याह रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ
Prashant Kumar
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