nazmKuch Alfaaz

"तस्वीर-कशी" जाँ अब तिरी तस्वीर में जो आने लगी है गुल-पोश हसीं शाम को बहकाने लगी है तस्वीर तिरी दिल मिरा बहलाने लगी है उजड़े हुए गुलज़ार को महकाने लगी है मैं बात जो करता था तो हो जाती थी नाराज़ अब आँख झुका लेती है शर्माने लगी है जो मुझ से लगातार बचाती रही नज़रें अब मुझ पे नज़र डाल के मुस्काने लगी है जो हाथ लगाने पे रहा करती थी ख़ामोश अब शे'र सुनाती है ग़ज़ल गाने लगी है मैं इस की अदाओं पे रहा मस्त हमेशा अब ये मिरे अश'आर पे लहराने लगी है जो प्यार के लम्हात तिरे साथ गुज़ारे तस्वीर तिरी बारहा दोहराने लगी है कल तक जो बनी रहती थी दीवार की ज़ीनत अब दिल के हर इक गोशे को गरमाने लगी है आँखों में मिरी देख के तस्वीर ख़ुद अपनी क्या जानिए किस बात पे इतराने लगी है सीने को ढके रखता था जो रेशमी आँचल दो चार दिनों से उसे सरकाने लगी है इक रोज़ इसे यूँँ ही कहीं छेड़ दिया था ये मुझ को उसी रोज़ से उकसाने लगी है अब इस पे भी कुछ रंग तिरा चढ़ने लगा तो बल खा के मिरे सामने इठलाने लगी है ग़लती से जो है देख ली तस्वीर कोई और मुरझा के अब इस तरह वो ग़म खाने लगी है कल रात 'बशर' हम ने जो शाने को हिलाया कहने लगी सो जाओ कि नींद आने लगी है

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"आसमानी ख़्वाब" ये भी इक नेमतों में नेमत है आदमी ख़्वाब देख सकता है या'नी दुनिया के रंज से थक कर नींद के मख़मली से बिस्तर पर अपनी दुनिया से मीलों दूर कहीं नई दुनिया फरोल सकता है हाँ मगर ख़्वाब हैं कई सारे ख़्वाब झूटे भी ख़्वाब सच्चे भी ख़्वाब बदतर हैं ख़्वाब अच्छे भी कुछ तो हैं ख़्वाब कच्ची नींदों के कुछ हैं गहराइयों में डूबे हुए उन में कुछ हैं फ़ुज़ूल बे-बुनियाद और कुछ क़ीमती हैं हीरों से कुछ में उम्मीद साफ़ दिखती है यार की दीद साफ़ दिखती है कुछ धुँदलकों में डूबे हैं जैसे किसी देरीना इश्क़ के बिल-अक्स लूट जाने का दर्स देते हैं फिर न आने का दर्स देते हैं मैं सुनाता हूँ इक निशानी ख़्वाब ख़्वाब था एक आसमानी ख़्वाब मैं ने देखा कि मर गया हूँ मैं और फिर से उठाया जा चुका हूँ एक मैदान है अदालत का मैं कटहरे में लाया जा चुका हूँ मुज़्तरिब हूँ मगर डरा हुआ सा ख़ौफ़ से जिस्म है मरा हुआ सा सामने ज़िंदगी का ख़ाका है इसी अस्ना में आसमाँ से कहीं एक आवाज़ गूँजती है वहाँ ये फ़ुलाँ है न और इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से पूछो कहाँ से आया है कौन सी चीज़ साथ लाया है मैं ने रोते में गिड़गिड़ाते में इतना सा कह दिया कि मेरे रब तू नहीं था तो मैं ने दुनिया में तेरे बंदों से बस मुहब्बत की फिर से आवाज़ गूँजती है वहाँ मेरा बंदा है ये जो इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से कह दो कि उस को बख़्श दिया

Dharmesh bashar

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'गदागर' कल सड़क पर इक गदागर दफ़'अतन जो दिख गया चंद सिक्के भीक देकर मैं ने उस सेे ये कहा भाई तुम मर्ज़ी के अपनी मालिक-ओ-मुख़्तार हो इक गुज़ारिश है मगर जो सुनने को तैयार हो दौर-ए-पीरी है मगर आ'ज़ा तो चलते हैं अभी भीक में ज़िल्लत है ढूँढो काम धंधा तुम कोई हाथ फैलाना किसी के सामने अच्छा नहीं तुम सेे सालिम शख़्स पर पेशा ये कुछ जँचता नहीं एक ठंडी आह भर कर मुस्कुराया वो ज़रा चंद लम्हे सोच कर कुछ उस ने बोला साहिबा किस को है मर्ज़ी पे अपनी इस जहाँ में इख़्तियार मैं ने कब चाहा था हो पामाल यूँँ मेरा वक़ार मैं हुनर रखता था साहिब मैं भी इक फ़नकार था और फ़न मेरा फ़ुनूस-ए-ख़ास का सरदार था शे'र कहता था ग़ज़ब के नाम था हर सू मिरा सुनने वालों पे चला करता था क्या जादू मिरा शोहरत-ओ-इज़्ज़त भी थी और ज़र भी था हासिल मुझे ज़िन्दगी लगती थी मिस्ल-ए-नेमत-ए-कामिल मुझे फिर हुआ कुछ यूँँ कि ये दुनिया मशीनी हो गई और शे'र-ओ-नग़मा की रफ़्तार धीमी हो गई अब नहीं सजतीं कहीं शे'र-ओ-सुख़न की महफ़िलें अब कहाँ वो लोग जो ग़ज़लें सुने नज़्में सुने शा'इरी में अब किसी इंसाँ को दिलचस्पी कहाँ अब तो ये फ़न हो चुका है एक भूली दास्ताँ मेरी मुश्किल है कि मैं ने और कुछ सीखा नहीं उम्र के इस दौर में वैसे भी कुछ होता नहीं या'नी मुझ जैसे तो अब के वक़्त में बेकार हैं माँगते हैं भीक हाँ बेहद ज़लील-ओ-ख़्वार हैं

Dharmesh bashar

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"खिलौना" तुम को इस दिल से शिकायत थी कि बेकार है ये हर हसीना की मुहब्बत का गिरफ़्तार है ये हुस्न के फ़ैज़ का हर वक़्त तलब-गार है ये दौड़ते फिरता है पर अस्ल में बीमार है ये हम को अच्छी नज़र आती नहीं हालत इस की जाओ और जल्द करा लाओ मरम्मत इस की सुन के ये हुक्म सर-ए-शौक़ झुकाया मैं ने दिल-ए-बीमार तबीबों को दिखाया मैं ने हाल-ए-ना-साज़ ब-तफ़सील सुनाया मैं ने उस के फ़रमानों को सीने से लगाया मैं ने बोले इस दिल से तुम्हें हाथ न धोने देंगे इक जवाँ-साल को मरहूम न होने देंगे देखते देखते तख़्ते पे लिटाया मुझ को फिर हदफ़ अपनी जराहत का बनाया मुझ को आलम-ए-ख़्वाब में क्या क्या न सताया मुझ को होश आ जाने पे मुज्दा ये सुनाया मुझ को आप के पहलू में अब एक दिल-ए-कामिल है जिस के औसाफ़-ए-हमीदा का बयाँ मुश्किल है साज़ कहिए तो हर इक तार है उम्दा इस का आईना कहिए तो हर अक्स है उजला इस का है खिलौना तो हर इक खेल अनोखा इस का गोया हर रंग ज़माने से निराला इस का ख़ंदा-पेशानी से तुम साथ इसे ले जाओ जिन को शिकवा था उन्हें खोल के दिल दिखलाओ जान-ए-मन ये रहा वो दिल ज़रा देखो इस को कोई शक हो तो बड़े शौक़ से परखो इस को है नई चीज़ नए ढंग से जाँचो इस को जी को भा जाए तो फिर प्यार से थामो इस को आप के हाथ से नागाह अगर छूट गया इक खिलौना ही तो है टूट गया टूट गया

Dharmesh bashar

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दुहाई ख़ुदा करे कि शब-ए-वस्ल रास आए तुझे हमारी तरह गले से कोई लगाए तुझे तिरी निगाह से छुप कर तिरे ही कानों में जो बात हम ने कही थी वही सुनाए तुझे मज़ा तो जब है कि वो बे-ख़ुदी के आलम में हमारे शे'र पढ़े और गुदगुदाए तुझे हमारे तर्ज़-ए-तकल्लुम की चाशनी ले कर समाअतों को तिरी चू में और लुभाए तुझे इसी मिज़ाज से ले कर शुऊर-ए-इश्क़ कभी हमारे साँचे में ढल जाए और रिझाए तुझे तू रूठ जाए तो उस के दिल-ओ-जिगर काँपें रुँधी ज़बान से क़स में भरे मनाए तुझे तू उस की आँख में झाँके तो हम ही आएँ नज़र फिर ऐसे वक़्त में क्या कुछ न याद आए तुझे मगर जो ज़िक्र हमारा छिड़े तो चुप रहना जतन वो लाख करे पर पकड़ न पाए तुझे मिले कभी तो 'बशर' बे-समझ को समझाना जुनून-ए-इश्क़ भुला कर वो भूल जाए तुझे

Dharmesh bashar

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"तलाश-ए-हक़" तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू हदफ़ को देख दुनिया के उसे पहचान उस की जुस्तजू में रात-दिन लग जा तुझे हक़ भी मिलेगा उस तलक जाने का रस्ता भी मगर वो रास्ता चुन ले तो फिर तो ज़ख़्म खाने को जिगर भी साथ ले आना सितम पर मुस्कुराने का हुनर भी साथ ले आना यही है इंतिहा उस की यही अंजाम होता है कि इस रस्ते पे चलने का यही ईनाम होता है मगर इस रास्ते पर ज़ख़्म खाने का मज़ा कुछ और है सुन ले यहाँ पर जान देने की जज़ा कुछ और है सुन ले अगर तू अज़्म कर ले बस ज़रा सा हौसला कर ले तो फिर कल क्या पता जब फिर कोई हक़ का हो जोइंदा निशाँ रस्ते लहू के तेरे कोई नक़्श-ए-पा कर ले कि ये दुनिया तो फ़ानी है ये जाँ तो यूँँ भी जानी है तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू

Dharmesh bashar

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