nazmKuch Alfaaz

"आसमानी ख़्वाब" ये भी इक नेमतों में नेमत है आदमी ख़्वाब देख सकता है या'नी दुनिया के रंज से थक कर नींद के मख़मली से बिस्तर पर अपनी दुनिया से मीलों दूर कहीं नई दुनिया फरोल सकता है हाँ मगर ख़्वाब हैं कई सारे ख़्वाब झूटे भी ख़्वाब सच्चे भी ख़्वाब बदतर हैं ख़्वाब अच्छे भी कुछ तो हैं ख़्वाब कच्ची नींदों के कुछ हैं गहराइयों में डूबे हुए उन में कुछ हैं फ़ुज़ूल बे-बुनियाद और कुछ क़ीमती हैं हीरों से कुछ में उम्मीद साफ़ दिखती है यार की दीद साफ़ दिखती है कुछ धुँदलकों में डूबे हैं जैसे किसी देरीना इश्क़ के बिल-अक्स लूट जाने का दर्स देते हैं फिर न आने का दर्स देते हैं मैं सुनाता हूँ इक निशानी ख़्वाब ख़्वाब था एक आसमानी ख़्वाब मैं ने देखा कि मर गया हूँ मैं और फिर से उठाया जा चुका हूँ एक मैदान है अदालत का मैं कटहरे में लाया जा चुका हूँ मुज़्तरिब हूँ मगर डरा हुआ सा ख़ौफ़ से जिस्म है मरा हुआ सा सामने ज़िंदगी का ख़ाका है इसी अस्ना में आसमाँ से कहीं एक आवाज़ गूँजती है वहाँ ये फ़ुलाँ है न और इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से पूछो कहाँ से आया है कौन सी चीज़ साथ लाया है मैं ने रोते में गिड़गिड़ाते में इतना सा कह दिया कि मेरे रब तू नहीं था तो मैं ने दुनिया में तेरे बंदों से बस मुहब्बत की फिर से आवाज़ गूँजती है वहाँ मेरा बंदा है ये जो इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से कह दो कि उस को बख़्श दिया

Related Nazm

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

236 likes

"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

216 likes

"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

108 likes

"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

180 likes

More from Dharmesh bashar

"तस्वीर-कशी" जाँ अब तिरी तस्वीर में जो आने लगी है गुल-पोश हसीं शाम को बहकाने लगी है तस्वीर तिरी दिल मिरा बहलाने लगी है उजड़े हुए गुलज़ार को महकाने लगी है मैं बात जो करता था तो हो जाती थी नाराज़ अब आँख झुका लेती है शर्माने लगी है जो मुझ से लगातार बचाती रही नज़रें अब मुझ पे नज़र डाल के मुस्काने लगी है जो हाथ लगाने पे रहा करती थी ख़ामोश अब शे'र सुनाती है ग़ज़ल गाने लगी है मैं इस की अदाओं पे रहा मस्त हमेशा अब ये मिरे अश'आर पे लहराने लगी है जो प्यार के लम्हात तिरे साथ गुज़ारे तस्वीर तिरी बारहा दोहराने लगी है कल तक जो बनी रहती थी दीवार की ज़ीनत अब दिल के हर इक गोशे को गरमाने लगी है आँखों में मिरी देख के तस्वीर ख़ुद अपनी क्या जानिए किस बात पे इतराने लगी है सीने को ढके रखता था जो रेशमी आँचल दो चार दिनों से उसे सरकाने लगी है इक रोज़ इसे यूँँ ही कहीं छेड़ दिया था ये मुझ को उसी रोज़ से उकसाने लगी है अब इस पे भी कुछ रंग तिरा चढ़ने लगा तो बल खा के मिरे सामने इठलाने लगी है ग़लती से जो है देख ली तस्वीर कोई और मुरझा के अब इस तरह वो ग़म खाने लगी है कल रात 'बशर' हम ने जो शाने को हिलाया कहने लगी सो जाओ कि नींद आने लगी है

Dharmesh bashar

5 likes

'गदागर' कल सड़क पर इक गदागर दफ़'अतन जो दिख गया चंद सिक्के भीक देकर मैं ने उस सेे ये कहा भाई तुम मर्ज़ी के अपनी मालिक-ओ-मुख़्तार हो इक गुज़ारिश है मगर जो सुनने को तैयार हो दौर-ए-पीरी है मगर आ'ज़ा तो चलते हैं अभी भीक में ज़िल्लत है ढूँढो काम धंधा तुम कोई हाथ फैलाना किसी के सामने अच्छा नहीं तुम सेे सालिम शख़्स पर पेशा ये कुछ जँचता नहीं एक ठंडी आह भर कर मुस्कुराया वो ज़रा चंद लम्हे सोच कर कुछ उस ने बोला साहिबा किस को है मर्ज़ी पे अपनी इस जहाँ में इख़्तियार मैं ने कब चाहा था हो पामाल यूँँ मेरा वक़ार मैं हुनर रखता था साहिब मैं भी इक फ़नकार था और फ़न मेरा फ़ुनूस-ए-ख़ास का सरदार था शे'र कहता था ग़ज़ब के नाम था हर सू मिरा सुनने वालों पे चला करता था क्या जादू मिरा शोहरत-ओ-इज़्ज़त भी थी और ज़र भी था हासिल मुझे ज़िन्दगी लगती थी मिस्ल-ए-नेमत-ए-कामिल मुझे फिर हुआ कुछ यूँँ कि ये दुनिया मशीनी हो गई और शे'र-ओ-नग़मा की रफ़्तार धीमी हो गई अब नहीं सजतीं कहीं शे'र-ओ-सुख़न की महफ़िलें अब कहाँ वो लोग जो ग़ज़लें सुने नज़्में सुने शा'इरी में अब किसी इंसाँ को दिलचस्पी कहाँ अब तो ये फ़न हो चुका है एक भूली दास्ताँ मेरी मुश्किल है कि मैं ने और कुछ सीखा नहीं उम्र के इस दौर में वैसे भी कुछ होता नहीं या'नी मुझ जैसे तो अब के वक़्त में बेकार हैं माँगते हैं भीक हाँ बेहद ज़लील-ओ-ख़्वार हैं

Dharmesh bashar

3 likes

"खिलौना" तुम को इस दिल से शिकायत थी कि बेकार है ये हर हसीना की मुहब्बत का गिरफ़्तार है ये हुस्न के फ़ैज़ का हर वक़्त तलब-गार है ये दौड़ते फिरता है पर अस्ल में बीमार है ये हम को अच्छी नज़र आती नहीं हालत इस की जाओ और जल्द करा लाओ मरम्मत इस की सुन के ये हुक्म सर-ए-शौक़ झुकाया मैं ने दिल-ए-बीमार तबीबों को दिखाया मैं ने हाल-ए-ना-साज़ ब-तफ़सील सुनाया मैं ने उस के फ़रमानों को सीने से लगाया मैं ने बोले इस दिल से तुम्हें हाथ न धोने देंगे इक जवाँ-साल को मरहूम न होने देंगे देखते देखते तख़्ते पे लिटाया मुझ को फिर हदफ़ अपनी जराहत का बनाया मुझ को आलम-ए-ख़्वाब में क्या क्या न सताया मुझ को होश आ जाने पे मुज्दा ये सुनाया मुझ को आप के पहलू में अब एक दिल-ए-कामिल है जिस के औसाफ़-ए-हमीदा का बयाँ मुश्किल है साज़ कहिए तो हर इक तार है उम्दा इस का आईना कहिए तो हर अक्स है उजला इस का है खिलौना तो हर इक खेल अनोखा इस का गोया हर रंग ज़माने से निराला इस का ख़ंदा-पेशानी से तुम साथ इसे ले जाओ जिन को शिकवा था उन्हें खोल के दिल दिखलाओ जान-ए-मन ये रहा वो दिल ज़रा देखो इस को कोई शक हो तो बड़े शौक़ से परखो इस को है नई चीज़ नए ढंग से जाँचो इस को जी को भा जाए तो फिर प्यार से थामो इस को आप के हाथ से नागाह अगर छूट गया इक खिलौना ही तो है टूट गया टूट गया

Dharmesh bashar

3 likes

"तलाश-ए-हक़" तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू हदफ़ को देख दुनिया के उसे पहचान उस की जुस्तजू में रात-दिन लग जा तुझे हक़ भी मिलेगा उस तलक जाने का रस्ता भी मगर वो रास्ता चुन ले तो फिर तो ज़ख़्म खाने को जिगर भी साथ ले आना सितम पर मुस्कुराने का हुनर भी साथ ले आना यही है इंतिहा उस की यही अंजाम होता है कि इस रस्ते पे चलने का यही ईनाम होता है मगर इस रास्ते पर ज़ख़्म खाने का मज़ा कुछ और है सुन ले यहाँ पर जान देने की जज़ा कुछ और है सुन ले अगर तू अज़्म कर ले बस ज़रा सा हौसला कर ले तो फिर कल क्या पता जब फिर कोई हक़ का हो जोइंदा निशाँ रस्ते लहू के तेरे कोई नक़्श-ए-पा कर ले कि ये दुनिया तो फ़ानी है ये जाँ तो यूँँ भी जानी है तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू

Dharmesh bashar

7 likes

दुहाई ख़ुदा करे कि शब-ए-वस्ल रास आए तुझे हमारी तरह गले से कोई लगाए तुझे तिरी निगाह से छुप कर तिरे ही कानों में जो बात हम ने कही थी वही सुनाए तुझे मज़ा तो जब है कि वो बे-ख़ुदी के आलम में हमारे शे'र पढ़े और गुदगुदाए तुझे हमारे तर्ज़-ए-तकल्लुम की चाशनी ले कर समाअतों को तिरी चू में और लुभाए तुझे इसी मिज़ाज से ले कर शुऊर-ए-इश्क़ कभी हमारे साँचे में ढल जाए और रिझाए तुझे तू रूठ जाए तो उस के दिल-ओ-जिगर काँपें रुँधी ज़बान से क़स में भरे मनाए तुझे तू उस की आँख में झाँके तो हम ही आएँ नज़र फिर ऐसे वक़्त में क्या कुछ न याद आए तुझे मगर जो ज़िक्र हमारा छिड़े तो चुप रहना जतन वो लाख करे पर पकड़ न पाए तुझे मिले कभी तो 'बशर' बे-समझ को समझाना जुनून-ए-इश्क़ भुला कर वो भूल जाए तुझे

Dharmesh bashar

9 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Dharmesh bashar.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Dharmesh bashar's nazm.