मेरे आबा-ओ-अज्दाद ने हुर्मत-ए-आदमी के लिए ता-अबद रौशनी के लिए क़लमा-ए-हक़ कहा मक़्तलों क़ैद-ख़ानों सलीबों में बहता लहू उन के होने का ऐलान करता रहा वो लहू हुर्मत-ए-आदमी की ज़मानत बना ता-अबद रौशनी की अलामत बना और मैं पा-बरहना सर-ए-कूचा-ए-एहतियाज रिज़्क़ की मस्लहत का असीर आदमी सोचता रह गया जिस्म में मेरे उन का लहू है तो फिर ये लहू बोलता क्यूँँ नहीं?
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है
Ammar Iqbal
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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रात दिन ख़्वाब बुनती हुई ज़िंदगी दिल में नक़्द-ए-इज़ाफ़ी की लौ आँख बार-ए-अमानत से चूर मौज-ए-ख़ूँ बे-नियाज़-ए-मआल दश्त-ए-बे-रंग से दर्द के फूल चुनती हुई ज़िंदगी ख़ौफ़-ए-वामांदगी से ख़जिल आरज़ूओं के आशोब से मुज़्महिल मुँह के बल ख़ाक पर आ पड़ी हर तरफ़ इक भयानक सुकूत कोई नौहा न आँसू न फूल हासिल-ए-जिस्म-ओ-जाँ बे-निशाँ रहगुज़ारों की धूल अजनबी शहर में ख़ाक-बर-सर हुई ज़िंदगी कैसी बे-घर हुई ज़िंदगी
Iftikhar Arif
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पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी उन्हें इस से ग़रज़ क्या पेँच पड़ते वक़्त किन हाथों में लर्ज़ा आ गया था और किस की खेंच अच्छी थी? हवा किस की तरफ़ थी, कौन सी पाली की बैरी थी? पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम? उन्हें तो बस बसंत आते ही अपनी अपनी डाँगेँ ले के मैदानों में आना है गली-कूचों में काँटी मारना है पतंगें लूटना है लूट के जौहर दिखाना है पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी?
Iftikhar Arif
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जौहरी को क्या मालूम किस तरह की मिट्टी में कैसे फूल होते हैं किस तरह के फूलों में कैसी बास होती है जौहरी को क्या मालूम जौहरी तो सारी उम्र पत्थरों में रहता है ज़र-गरों में रहता है जौहरी को क्या मालूम ये तो बस वही जाने जिस ने अपनी मिट्टी से अपना एक इक पैमाँ उस्तुवार रक्खा हो जिस ने हर्फ़-ए-पैमाँ का ए'तिबार रक्खा हो जौहरी को क्या मालूम किस तरह की मिट्टी में कैसे फूल होते हैं किस तरह के फूलों में कैसी बास होती है
Iftikhar Arif
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बचपन की गलियों में जिन जिन घरों के शीशे मेरी गेंद से टूटे थे उन सब की किर्चें कभी कभी मेरी आँखों में चुभने लगती हैं जलती दोपहरों में मेरे हाथों उजड़े हुए घोंसलों के बेहाल परिंदों की चीख़ें फ़रियादें मेरी बे-घर शामों में कोहराम मचाती रहती हैं चकनाचूर दिनों रेज़ा रेज़ा रातों में सोए हुए सब ख़्वाब जगाती रहती हैं अपने ख़ंजर अपने ही सीने में उतरने लगते हैं ज़िंदा चेहरे जलते बुझते लम्हों की आग़ोश में मरने लगते हैं
Iftikhar Arif
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अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए उसे रोकिए कि पड़ोसियों के घरों में झूले पड़े हुए हैं तो उस से क्या उसे क्या पड़ी कि कबूतरों को बताए कैसे हवाएँ उस की पतंग छीन के ले गईं 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए कहीं यूँँ न हो कि फिर एक बार भरी बहार में ए'तिबार के सारे ज़ख़्म महक उठें कहीं यूँँ न हो कि नए सिरे से हमारे ज़ख़्म महक उठें 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए
Iftikhar Arif
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