"फुटपाथ" चल सकता नहीं जिस्म, मचलता है जज़्बात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ सुख की घटा नहीं छाती, हँसी के बादल नहीं आते बाबा, देखो ना मेरे हिस्से में ख़ुशी के पल नहीं आते अब हर पल इन आँखों से होती ग़मों की बरसात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"शिकश्त" जहाँ बल पड़ते हैं सोच के, वहाँ सुकूँ क्या लिखें अपने शिकश्त-ए-आलम का, हम जुनूँ क्या लिखे शिकश्त ही सही, शिकश्त से मोहब्बत कर ली हम ने विजय प्रिय नहीं हमें, विजय से बग़ावत कर ली हम ने जहाँ फूटते हैं अँगारे जिस्मों में, वहाँ लहू क्या लिखें अपने शिकश्त-ए-आलम का, हम जुनूँ क्या लिखें
Vikas Sangam
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"चुप्पियाँ" तेरी ख़ामोशियाँ तड़पाती हैं मुझे ये उदासियाँ सताती हैं मुझे ग़म-ए-दिल का सहारा नहीं है अब तेरा चुप रहना गवारा नहीं है जब तक तुझे मैं सुन सकता हूँ तेरे अल्फ़ाज़ मैं चुन सकता हूँ अब सीने से लगा ले मुझे ये चुप्पियाँ मार न डाले मुझे ये तन्हाइयाँ खलती हैं दिल में बेचैनियाँ पलती हैं कुछ बोल
Vikas Sangam
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"बड़ा उदास हूँ मैं" अब मेरे पास तो आओ, बड़ा उदास हूँ मैं बैठ, कुछ कहो सुनाओ, बड़ा उदास हूँ मैं यूँँ तो संताप से मेरा रिश्ता पुराना है गोया गीत ख़ुशी के गुनगुनाओ, बड़ा उदास हूँ मैं यूँँ तो तन्हा ही अक्सर जीता रहा हूँ मैं अब ना छोड़ के जाओ, बड़ा उदास हूँ मैं
Vikas Sangam
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"मुश्किल' मुझ में एक सवाल था जो ता-उम्र मुझे मुश्किल में रखा क्यूँ?, वो शख़्स हमारा न हो सका उम्र भर जिसे हम ने दिल में रखा ता-उम्र इसी सवाल ने, हाँ मुझे मुश्किल में रखा उस के दिल में कोई राज था जो राज उस ने दिल में रखा बात ही बात में क्या बात आज हो गई? जो उस ने दिल की बात भरी महफ़िल में रखा ता-उम्र इसी सवाल ने, हाँ मुझे मुश्किल में रखा ढूँढो उसे कि हाँ गया लम्हा मेरा कहाँ गया जिसे चुरा के ज़माने से हम ने राह-ए-मंज़िल में रखा ता-उम्र इसी सवाल ने, हाँ मुझे मुश्किल में रखा
Vikas Sangam
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"अभी जाओ" अभी जाओ की तन्हाई से रुख़्सत हो जाऊँ तो आना दिल रोए, मैं मुस्कुराऊँ तो आना अभी कुछ कहने, सुनने की इच्छा नहीं हाँ, कुछ कह पाऊँ कुछ सुन पाऊँ तो आना अभी जाओ जाओ इस क़दर कि तुम्हें रोकना चाहूँ तो न रोक पाऊँ जाओ इस क़दर कि तुम्हें मुस्कुराता देख मैं भी मुस्कुराऊँ जाओ अभी जाओ अभी जाओ के दर्दों को सीने से लगाना है मुझे अभी जाओ की ख़ुद को कहीं छुपाना है मुझे अभी ग़म है कहीं सीने में जगा हुआ ग़मों से नाता तोड़ लूँ तो आना अपनी आँखें निचोड़ लूँ तो आना अभी जाओ
Vikas Sangam
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