nazmKuch Alfaaz

मिट्टी की दीवार पे इक खूँटी से लटकी मेरी यादों की ज़म्बील जिस में छुपे थे रंग-बिरंगे कपड़ों के बोसीदा कतरन गोल गोल सी नन्ही मुन्नी कर धनियों के दाने इक अमरूद की डाली काट के बाबा ने जो बनाई थी वो टेढ़ी-मेढ़ी एक ग़ुलैल नीले पीले मटियाले और लाल परों की ढेरी चौड़े मुँह का इक मुँह ज़ोर सा काठ का अड़ियल घोड़ा अपनी अकड़ में खाता हुआ बग्घी वाले का कोड़ा इतनी मुद्दत बा'द जो खोली मैं ने वो ज़म्बील इक नन्हा इस में से निकल कर जैसे सरपट भागा देखता था पीछा ही वो अपना और न अपना आगा और उलझता जाता जितना खुलता लिपटा धागा जैसे भयानक सपने देखे कई दिनों का जागा अब के फिर वो नज़र आया तो सरगोशी में पूछूँगा तुम तो मेरे यार थे फिर क्यूँँ सालों साल नहीं मिलने को अपने शुऊ'र की हैरानी का बोझ उठाए जाने कितनी कठिन राहों से गुज़रते हो जग वालों पर हँसते हो या छुप छुप आहें भरते हो बस्ती छोड़ के जंगल जंगल रैन बसेरा करते हो या फिर इक पाताल की निचली तह में उतर जा मरते हो शायद तुम भी गौतम हो और अपने आप से डरते हो

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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गुम हुए यूँँ कि कभी मेरे शनासा ही न थे कुछ लिखा होता तुम्हें मुझ से शिकायत क्या है ख़बर कब आए हो कैसे सुनाओ प्यारे क्या ख़बर लाए हो यारों की हिकायत क्या है उस ने ये कुछ न कहा और कहा तो इतना खेल दिल-चस्प है नज़्ज़ारे करो और फिर एक ख़ला एक गिराँ-बार ख़मोशी की अज़िय्यत ले कर मैं ये कहता हुआ उठ आया कि हाँ खेल है दिलचस्प बहुत

Wali Alam Shaheen

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खेत प्यासे हैं फ़ज़ा हाँफती है जा-ब-जा उखड़ी जड़ें चाटती इक गाए के सूखे हुए मटियाले खुरों की मानिंद फट गई है जो ज़मीं उस में उगी झाड़ियाँ बे-बर्ग-ओ-समर रहती हैं मौसम हो कोई किसी फ़ालिज-ज़दा बीमार के अकड़े हुए पंजे की तरह टहनियाँ सोए फ़लक देखती फ़रियाद-कुनाँ हैं कब से महज़ फ़रियाद से ऐ दोस्त मगर क्या होगा जोड़ता रहता है मौसम की विरासत से दिलों को जो किसी मेज़-नुमा शय ये कई दिन से पड़ा चाए-ख़ाने का फटा सा अख़बार इक नज़र आओ इसे देख तो लें हाल ऐसा है कि अब जो भी हो अच्छा होगा

Wali Alam Shaheen

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मूँद कर आँखें बड़े ही ध्यान से मैं ने पीछे की तरफ़ हौज़ के पानी में सिक्के फेंकते ही इक ज़रा सी छेड़ की अपने दिल-ए-ख़ुश-फ़हम से ऐ बावले अब तो हो जाएगी पूरी ख़ैर से तेरी मुराद सह-पहर की धूप में हौज़ के झरने में सिक्के सात रंगों में चमकते यूँँ दिखाई दे रहे थे जैसे हम आवाज़ हो कर सब उड़ाते हों मिरे दिल का मज़ाक़ जैसे आपस में ही कर रक्खा हो बरपा मेरी नम-ख़ुर्दा हथेली के सितारों ने फ़साद

Wali Alam Shaheen

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ब-यक-जुम्बिश मिरी आँखों को पत्थर कर दिया जिस ने वो ख़ंजर काश सीने में मिरे पैवस्त हो जाता रवाँ है वक़्त की सफ़्फ़ाक मेहराबों के नीचे नहर-ए-ख़ूँ-बस्ता सिसकती चीख़ती तन्हा सदाओं की मैं अब किस के लिए घर के खंडर में ख़्वाब घर के देखता जाऊँ ज़बाँ पर है कसीला ज़ाइक़ा ताँबे के सिक्के का कहाँ तक हर किसी के सामने कश्कोल फैलाऊँ

Wali Alam Shaheen

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पहले रातें इतनी लंबी कब होती थीं जो भी हिसाब और खेल हुआ करता था सब मौसम का था रोज़-ओ-शब की हर साअ'त का इक जैसा पैमाना था अपने मिलने वाले सारे झूटे सच्चे यारों से इक मुस्तहकम याराना था लेकिन अपने दर्द की सम्तों की पहचान न रखने वाले दिल ये सोचना था हर ख़्वाब की क़ीमत होती है और अब इन दो आँखों में इतने तरह तरह के दुनिया भर के ख़्वाब भरे हैं इन में से इक इक को गिन कर सब के मुनासिब दाम चुकाना इस के लिए तो दो सदियाँ भी कम होंगी कंगले इतनी नक़दी कहाँ से आएगी

Wali Alam Shaheen

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