nazmKuch Alfaaz

ख़ूब-सूरत हो इज़ाफ़ा ज़ीस्त के औराक़ में हम-सफ़र ऐसा मिले जो हम-नवा भी हो मिरा रूह को सैराब कर दे साथ उस का ऐसा हो शबनमी क़तरात हों जैसे बयाबाँ के लिए क़ुर्बतें हों उस की मरहम ग़म के दरमाँ के लिए मुश्किलें आसाँ हों कुछ क़ल्ब-ए-परेशाँ के लिए यूँँ क़दम बाहम उठें जैसे रह-ए-मंज़िल की सम्त हम-सफ़र ऐसा मिले जो हम-नवा भी हो मिरा

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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अपने अपने ही ख़ोल में हम तुम कैसे ख़ुद को छुपा के बैठ गए हम को अपनी अना का पास रहा और सारे ख़याल भूल गए ख़्वाब जो हम ने साथ देखे थे सारे वो कैसे तार तार हुए सारे वा'दे वफ़ा के टूट गए और अरमान सब ही ख़ाक हुए देखने में तो मैं शगुफ़्ता हूँ तुम भी शादाब सब को लगते हो इक हक़ीक़त मगर मैं जानती हूँ ये ब-ज़ाहिर नज़र जो आता है आइना वो हमारे दिल का नहीं हम तो इक दूसरे की फ़ुर्क़त में ज़िंदा रहना मुहाल कहते थे अक्स वो भी हमारी ज़ात का था अक्स ये भी हमारी ज़ात का है है उदासी तो चारों-सम्त मगर ज़ेब-तन कर के ख़ोल ख़ुशियों का हम को अपना भरम भी रखना है चाहे ग़म के पहाड़ जितने गिरें बस अना को बहाल रखना है

Sabeela Inam Siddiqui

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यहाँ हर तरफ़ हैं अदाकार चेहरे मैं रूदाद दिल की किसे क्या बताऊँ जो ख़्वाब-ए-मुसलसल ही अरमाँ है मिरा वही ख़्वाब टूटा वही प्यार रूठा मनाज़िर ने रंग अपने सब खो दिए हैं वो जब से ख़फ़ा है किसे क्या बताऊँ ज़बाँ चुप है लेकिन सरापा-बयाँ हूँ ये दिल की लगी है किसे क्या बताऊँ

Sabeela Inam Siddiqui

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ख़यालात-ओ-एहसास जो बे-साख़्ता लिख दिए हैं न जाने वो कब से दिल-ओ-जाँ के अंदर छुपे थे किसी राज़ जैसे क़लम-बंद होने को बेचैन थे कई दर्द उलझे सवालात जो सफ़्हे पे सजने को बेताब थे वो सब क़लम से मिरे मोतियों की तरह अब बरसने लगे हैं सभी रक़्स करने लगे हैं मिरी चश्म-ए-पुर-नम जो सैलाब रोके हुए है सितारे चमकते हैं मेरी पलक पर उन्हें मैं रक़म कर रही हूँ जो तूफ़ान है मौजज़न मेरे अंदर वो अरमान वो ख़्वाब कई ला-शुऊरी मज़ामीन बन कर वरक़-दर-वरक़ जगमगाने लगे हैं सभी रक़्स करने लगे हैं और अब उसी जज़्ब-ओ-एहसास के ज़ेर-ए-साया ग़ज़ल फूल बन कर महकती है कभी नज़्म गाती है वो गीत कि जो बे-ख़याली में तख़्लीक़ हो कर बनाती है रंगीन पैकर ये बज़्म-ए-सुख़न को सजाने पे माइल ख़यालात सब रक़्स करने लगे हैं क़लम से मिरे मोतियों की तरह अब बरसने लगे हैं सभी रक़्स करने लगे हैं

Sabeela Inam Siddiqui

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