ख़यालात-ओ-एहसास जो बे-साख़्ता लिख दिए हैं न जाने वो कब से दिल-ओ-जाँ के अंदर छुपे थे किसी राज़ जैसे क़लम-बंद होने को बेचैन थे कई दर्द उलझे सवालात जो सफ़्हे पे सजने को बेताब थे वो सब क़लम से मिरे मोतियों की तरह अब बरसने लगे हैं सभी रक़्स करने लगे हैं मिरी चश्म-ए-पुर-नम जो सैलाब रोके हुए है सितारे चमकते हैं मेरी पलक पर उन्हें मैं रक़म कर रही हूँ जो तूफ़ान है मौजज़न मेरे अंदर वो अरमान वो ख़्वाब कई ला-शुऊरी मज़ामीन बन कर वरक़-दर-वरक़ जगमगाने लगे हैं सभी रक़्स करने लगे हैं और अब उसी जज़्ब-ओ-एहसास के ज़ेर-ए-साया ग़ज़ल फूल बन कर महकती है कभी नज़्म गाती है वो गीत कि जो बे-ख़याली में तख़्लीक़ हो कर बनाती है रंगीन पैकर ये बज़्म-ए-सुख़न को सजाने पे माइल ख़यालात सब रक़्स करने लगे हैं क़लम से मिरे मोतियों की तरह अब बरसने लगे हैं सभी रक़्स करने लगे हैं
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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अपने अपने ही ख़ोल में हम तुम कैसे ख़ुद को छुपा के बैठ गए हम को अपनी अना का पास रहा और सारे ख़याल भूल गए ख़्वाब जो हम ने साथ देखे थे सारे वो कैसे तार तार हुए सारे वा'दे वफ़ा के टूट गए और अरमान सब ही ख़ाक हुए देखने में तो मैं शगुफ़्ता हूँ तुम भी शादाब सब को लगते हो इक हक़ीक़त मगर मैं जानती हूँ ये ब-ज़ाहिर नज़र जो आता है आइना वो हमारे दिल का नहीं हम तो इक दूसरे की फ़ुर्क़त में ज़िंदा रहना मुहाल कहते थे अक्स वो भी हमारी ज़ात का था अक्स ये भी हमारी ज़ात का है है उदासी तो चारों-सम्त मगर ज़ेब-तन कर के ख़ोल ख़ुशियों का हम को अपना भरम भी रखना है चाहे ग़म के पहाड़ जितने गिरें बस अना को बहाल रखना है
Sabeela Inam Siddiqui
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यहाँ हर तरफ़ हैं अदाकार चेहरे मैं रूदाद दिल की किसे क्या बताऊँ जो ख़्वाब-ए-मुसलसल ही अरमाँ है मिरा वही ख़्वाब टूटा वही प्यार रूठा मनाज़िर ने रंग अपने सब खो दिए हैं वो जब से ख़फ़ा है किसे क्या बताऊँ ज़बाँ चुप है लेकिन सरापा-बयाँ हूँ ये दिल की लगी है किसे क्या बताऊँ
Sabeela Inam Siddiqui
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ख़ूब-सूरत हो इज़ाफ़ा ज़ीस्त के औराक़ में हम-सफ़र ऐसा मिले जो हम-नवा भी हो मिरा रूह को सैराब कर दे साथ उस का ऐसा हो शबनमी क़तरात हों जैसे बयाबाँ के लिए क़ुर्बतें हों उस की मरहम ग़म के दरमाँ के लिए मुश्किलें आसाँ हों कुछ क़ल्ब-ए-परेशाँ के लिए यूँँ क़दम बाहम उठें जैसे रह-ए-मंज़िल की सम्त हम-सफ़र ऐसा मिले जो हम-नवा भी हो मिरा
Sabeela Inam Siddiqui
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