nazmKuch Alfaaz

हवा कहती रही आओ चलो उस खेत को छू लें उधर इस पेड़ के पत्तों में छुप कर तालियाँ पीटें गिरें उट्ठें लुढ़क कर नहर में उतरें नहाएँ मख़मलीं सब्ज़े पे नंगे पाँव चल कर दूर तक जाएँ हवा कहती रही आओ मगर मैं ख़ुश्क छागल अपने दाँतों में दबाए प्यास की बरहम सिपह से लड़ रहा था मैं कहाँ जाता मुझे सूरज के रथ से आतिशीं तीरों का आना और छागल से हुमक कर आब का गिरना किसी बच्चे का रोना और पानी माँगना भूला नहीं था मैं कहाँ जाता मैं अपने हाथ पर उभरी रगों में क़ैद अपनी आँख की तपती हुई रेग-ए-रवाँ में जज़्ब था यकसर मुझे इक जुरआ'-ए-आब-ए-सफ़ा दरकार था और मेरे बच्चे ने सदा दी थी मुझे आओ ख़ुदारा अब तो आ जाओ कि मेरे होंट अब फट भी चुके आँखों का अमृत सूख कर बादल बना उड़ भी गया हवा कहती रही आओ ये बंधन तोड़ दो प्यारे मगर मैं हाथ पर उभरी रगों में क़ैद अपनी आँख की तपती हुई रेग-ए-रवाँ में जज़्ब क्या करता कहाँ जाता

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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"चलो बचपन उगाते हैं" चलो भली आदत बनाते हैं चलो ख़ुद को सिखाते हैं चलो बचपन उगाते हैं तजुर्बे ज़र्द से लगने लगे हैं कवर उन पर चढ़ाते हैं... चलो बचपन उगाते हैं... चलो सींचें वो बीता कल जुगत से चलो खेलें वही सब खेल कल के चलो उन गर्मियों की कुल्फ़ियों को फिर मनाते हैं चलो बचपन उगाते हैं के चुटकी एक ले कर मुस्कुराहट की मिलाते हैं समय की आँच पर यादों की हांडी फिर चढ़ाते हैं मिलाते हैं वो इक छोटा सा चम्मच बचपने का चलो मिल कर के फिर से वो ही नादानी पकाते हैं सुनहरा एक और सिक्का सुब्ह की धूप का चलका चलो शीशे के टुकड़े से, उसे घर भर घुमाते हैं या वो छोटा सा साबुन का गुबारा फूँक से हल्का अंगूठे और उँगली को मिलाकर फिर फुलाते हैं या डब्बे से चुरा कर गुड़ के लड्डू जेब में रख कर यारों को दिखा कर खाके सब को फिर जलाते हैं चलो बचपन उगाते हैं किसी के दस के गिनते ही..कहीं कोने में छुप कर के कभी चुपके से उस की पीठ पर धप्पा जमाते हैं चलो बचपन उगाते हैं

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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अजीब है ये सिलसिला ये सिलसिला अजीब है हवा चले तो खेतियों में धूम चहचहों की है हवा रुके तो मुर्दनी है मुर्दनी की राख का नुज़ूल है कहाँ है तू कहाँ है तू कहाँ नहीं है तू बता अभी था तेरे गिरते उड़ते आँचलों का सिलसिला और अब उफ़ुक़ पर दूर तक गए दिनों की धूल है गए दिनों की धूल का ये सिलसिला फ़ुज़ूल है मैं रो सकूँ तो क्या ये गदली काएनात धुल सकेगी मेरे आँसुओं के झाग से मैं मुस्कुरा सकूँ तो क्या सफ़र की ख़स्तगी को भूल कर ये कारवाँ नुजूम के बरस पड़ेंगे मोतिए के फूल बन के इस मुहीब कासा-ए-हयात में न तू सुने न मैं कहूँ न मेरे अंग अंग से सदा उठे यूँँ ही मैं आँसुओं को क़हक़हों को अपने दिल में दफ़न कर के गुम लबों पे सिल धरे तिरे नगर में पा-पियादा पा-बरहना शाम के फ़िशार तक रवाँ रहूँ मगर कभी तिरी नज़र के आस्ताँ को पार तक न कर सकूँ कि तू अज़ल से ता-अबद हज़ार सद हज़ार आँख वाले वक़्त की नक़ीब है ये सिलसिला अजीब है ये सिलसिला अजीब है

Wazir Agha

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चली कब हवा कब मिटा नक़्श-ए-पा कब गिरी रेत की वो रिदा जिस में छुपते हुए तू ने मुझ से कहा आगे बढ़ आगे बढ़ता ही जा मुड़ के तकने का अब फ़ाएदा कोई चेहरा कोई चाप माज़ी की कोई सदा कुछ नहीं अब ऐ गले के तन्हा मुहाफ़िज़ तिरा अब मुहाफ़िज़ ख़ुदा मेरे होंटों पे कफ़ मेरे रा'शा-ज़दा बाज़ुओं से लटकती हुई गोश्त की धज्जियाँ और लाखों बरस का बुढ़ापा जो मुझ में समा कर हुमकने लगा मुझ को माज़ी से कटने का कुछ डर नहीं अपने हम-ज़ाद को रू-ब-रू पा के मैं ग़म-ज़दा भी नहीं ये असा झुकते शानों पे काली अबा और गले के चलने का पैहम सदा अब यही मेरी क़िस्मत यही आसरा

Wazir Agha

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फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया पर न सोचा कहाँ से चला था कहाँ आ के ठहरा मैं किस मंज़िल-ए-बे-निशाँ की तरफ़ अब रवाँ हूँ मुझे ख़ुश्क बद-रंग चमड़े पे लिक्खे सवालों से रग़बत नहीं थी मैं मंतिक़ की वर्ज़िश से ख़ुद को थकाना नहीं चाहता था फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया और देखा फ़लक की सियह गहरी सूखी हुई बाउली से करोड़ों सितारे शुआ'ओं की बे-सम्त बे-लफ़्ज़ गूँगी ज़बाँ में लरज़ते लबों से न होने के मुंकिर थे होने का एलान करते चले जा रहे थे फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया और बेताब फूलों से सावन के झूलों से चिड़ियों के लोरी से हर ज़िंदा हस्ती के साँसों की डोरी से आवाज़ आई मुझे अपने होने का हक़्क़-उल-यक़ीं है मैं एलान करती हूँ अपना अजब सिलसिला था करोड़ों बरस की मसाफ़त पे फैला हुआ सारा आलम सदाओं की लहरों की इक चीख़ती नश्र-गह बन चुका था फ़क़त अपने होने का एलान करता चला जा रहा था ये एलान किस के लिए था तुझे क्या ख़बर है तू इस नश्र-गह का फ़क़त एक अदना मुलाज़िम तू कुछ भी नहीं जानता है

Wazir Agha

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घुटनों पे रख कर हाथ उठी थकी आवाज़ में बोली बहुत लम्बा सफ़र है उम्र के मुँह ज़ोर दरिया का उखड़ते पत्थरों चिकनी फिसलती साअ'तों का ये सफ़र मुश्किल बहुत है थकन बोझल मनों बोझल बदन अपना उठा कर चल पड़ी चलती रही फिर एक दिन भारी पपोटों को उठा कर उस ने देखा रास्ते के बीच एक बरगद पुराना समाधी ओढ़ कर बैठा हुआ था थकन कुब्ड़े असा को टेकती बरगद के साए में चली आई मअन ठिटकी ठिठक कर रुक गई बोली चलो हम भी यहाँ रुक कर समाधी ओढ़ लेते हैं चलो हम भी उतरते हैं ख़ुद अपनी तह के अंदर और ख़ुद को ढूँडते हैं अबद तक नींद के दरिया में हम भी ऊँघते हैं थकन घुटनों पे रख कर हाथ उठी थकी आवाज़ में बोली बहुत लम्बा सफ़र है

Wazir Agha

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हँसी रुकी तो फिर से माँओं पंजों के बल चलती चलती बाज़ू के रेशम पे फिसलती गर्दन की घाटी से हो कर कान की दीवारों पर चढ़ती इन्द्र के दालान में कूदी और बदन इक साग़र सा बीमार बदन सारे का सारा हँसी की चढ़ती नदी की आफ़ात भरी लज़्ज़त के अंदर झटके खाता चीख़ उठा बस अब्बू रोको उस माँओं को अब्बू आगे मत आए ये माँओं और अब्बू ने रोक दिया अपनी उँगली को और बिल्ली इक जस्त लगा कर अब्बू के सीने में उतरी और फिर उस के तन की लंबी शिरयानों में पंजों के बल चलती चलती उस की आँख में आ पहुँची है घाट लगा कर आँसू की चिलमन के पीछे बैठ गई है

Wazir Agha

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