nazmKuch Alfaaz

फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया पर न सोचा कहाँ से चला था कहाँ आ के ठहरा मैं किस मंज़िल-ए-बे-निशाँ की तरफ़ अब रवाँ हूँ मुझे ख़ुश्क बद-रंग चमड़े पे लिक्खे सवालों से रग़बत नहीं थी मैं मंतिक़ की वर्ज़िश से ख़ुद को थकाना नहीं चाहता था फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया और देखा फ़लक की सियह गहरी सूखी हुई बाउली से करोड़ों सितारे शुआ'ओं की बे-सम्त बे-लफ़्ज़ गूँगी ज़बाँ में लरज़ते लबों से न होने के मुंकिर थे होने का एलान करते चले जा रहे थे फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया और बेताब फूलों से सावन के झूलों से चिड़ियों के लोरी से हर ज़िंदा हस्ती के साँसों की डोरी से आवाज़ आई मुझे अपने होने का हक़्क़-उल-यक़ीं है मैं एलान करती हूँ अपना अजब सिलसिला था करोड़ों बरस की मसाफ़त पे फैला हुआ सारा आलम सदाओं की लहरों की इक चीख़ती नश्र-गह बन चुका था फ़क़त अपने होने का एलान करता चला जा रहा था ये एलान किस के लिए था तुझे क्या ख़बर है तू इस नश्र-गह का फ़क़त एक अदना मुलाज़िम तू कुछ भी नहीं जानता है

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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कभी हवा इक झोंका है जो दीवारों को फाँद के अक्सर हल्की सी एक चाप में ढल कर सहन में फिरता रहता है कभी हवा इक सरगोशी है जो खिड़की से लग कर पहरों ख़ुद से बातें करती है कभी हवा वो मौज-ए-सबा है जिस के पहले ही बोसे पर नन्ही मुन्नी कलियों की निन्दिया से बोझल सूजी आँखें खुल जाती हैं कभी हवा अब कैसे बताएँ हवा के रूप तो लाखों हैं पर उस का वो इक रूप तुझे भी याद तो होगा जब सन्नाटे पोरी पोरी टूट गिरे थे चाप के पाँव उखड़ गए थे सरगोशी पर कितनी चीख़ें झपट पड़ी थीं और फूलों की आँखों से शबनम की बूँदें फ़र्श-ए-ज़मीं पर चारों जानिब बिखर गई थीं

Wazir Agha

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चली कब हवा कब मिटा नक़्श-ए-पा कब गिरी रेत की वो रिदा जिस में छुपते हुए तू ने मुझ से कहा आगे बढ़ आगे बढ़ता ही जा मुड़ के तकने का अब फ़ाएदा कोई चेहरा कोई चाप माज़ी की कोई सदा कुछ नहीं अब ऐ गले के तन्हा मुहाफ़िज़ तिरा अब मुहाफ़िज़ ख़ुदा मेरे होंटों पे कफ़ मेरे रा'शा-ज़दा बाज़ुओं से लटकती हुई गोश्त की धज्जियाँ और लाखों बरस का बुढ़ापा जो मुझ में समा कर हुमकने लगा मुझ को माज़ी से कटने का कुछ डर नहीं अपने हम-ज़ाद को रू-ब-रू पा के मैं ग़म-ज़दा भी नहीं ये असा झुकते शानों पे काली अबा और गले के चलने का पैहम सदा अब यही मेरी क़िस्मत यही आसरा

Wazir Agha

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हँसी रुकी तो फिर से माँओं पंजों के बल चलती चलती बाज़ू के रेशम पे फिसलती गर्दन की घाटी से हो कर कान की दीवारों पर चढ़ती इन्द्र के दालान में कूदी और बदन इक साग़र सा बीमार बदन सारे का सारा हँसी की चढ़ती नदी की आफ़ात भरी लज़्ज़त के अंदर झटके खाता चीख़ उठा बस अब्बू रोको उस माँओं को अब्बू आगे मत आए ये माँओं और अब्बू ने रोक दिया अपनी उँगली को और बिल्ली इक जस्त लगा कर अब्बू के सीने में उतरी और फिर उस के तन की लंबी शिरयानों में पंजों के बल चलती चलती उस की आँख में आ पहुँची है घाट लगा कर आँसू की चिलमन के पीछे बैठ गई है

Wazir Agha

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आज फिर उस से मुलाक़ात हुई बाग़ के मग़रिबी गोशे में झुके नीम के छितनार तले एक बद-रंग सी चादर पे वो बैठा था मुझे देख के सरशार हुआ भाई कैसे हो! नज़र तुम कभी आते ही नहीं आओ कुछ देर मिरे पास तो बैठो देखो कैसा चुप-चाप है ये बाग़ का गोशा जैसे किसी मव्वाज समुंदर में जज़ीरा कोई दूर वो सुरमई बादल की फ़रोज़ाँ झालर जैसे हाँ जैसे मगर ख़ैर कोई बात नहीं आओ तुम पास तो बैठो मेरे और मैं चुपके से चादर पे वहीं बैठ गया उस के होंटों से उतरते हुए अल्फ़ाज़ की चहकार में ता-देर मैं ख़ामोश रहा कैसी चहकार थी वो ख़ुश्क पेड़ों में हवा का नौहा जैसे गिरते हुए पत्तों की लगातार सदा दफ़्अ'तन सोच के इक अजनबी झोंके ने मुझे छेड़ दिया जाने कब से ये मुसाफ़िर है जज़ीरे में मुक़य्यद तन्हा मुंतज़िर आएगी इक रोज़ कहीं से नाव बादबाँ अब्र का चाँदी के चमकते चप्पू रसमसाती हुई इक नर्म रसीली आवाज़ तू कहाँ है तू कहाँ है कि तुझे ढूँडते ढूँडते मैं हार गई हार गई और बद-रंग सी चादर पे वो बैठा हुआ शख़्स ख़्वाब में बोलता जाता था सियह बासी लफ़्ज़ उस के सूखे हुए होंटों से निकल कर हर सू झूटे सिक्कों का बनाते चले जाते थे हिसार आज फिर उस से मुलाक़ात हुई वहीं उस बाग़ के गोशे में झुके नीम के छितनार तले आज फिर उस से मुलाक़ात हुई

Wazir Agha

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कौन मुझे दुख दे सकता है दुख तो मेरे अंदर की किश्त वीराँ का इक तना बे-बर्ग शजर है रुत की नाज़ुक लाँबी पोरें किरनें ख़ुश्बू चाप हवाएँ जिस्मों पर जब रेंगने फिरने लगती हैं मेरे अंदर दुख का सोया पेड़ भी जाग उठता है तंग मसामों के ग़ुर्फों से लंबी नाज़ुक शाख़ें फन फैला कर तन की अंधी शिरयानों में क़दम क़दम चलने लगती हैं शरयानों से रगों रगों से नसों के अंदर तक जाने लगती हैं फिर वो गर्म लहू में मिल कर इक इक बाल की जड़ तक फैलती जाती हैं और ये मेरा सदियों पुराना मस्कन ख़ाकी मस्कन ख़ुद भी एक शजर बन जाता है वक़्त की क़तरा क़तरा टपकती सुर्ख़ ज़बाँ की नोक पे आ कर जम जाता है

Wazir Agha

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