तुम अक्सर कहते रहते हो फूलों का क्या है कुछ देर में मुरझा जाते हैं और ये रातें चाँदी सी दो दिन की कहानी है उन की लम्हों में बिखर कर रह जाती है मोती की तरह शबनम की लड़ी मैं अक्सर सोचा करती हूँ क्या मौसम-ए-गुल ही सब कुछ है और ख़्वाब-ए-बहाराँ कुछ भी नहीं बिल्लोर से तरशी मूरत से अलग क्या अक्स-ए-निगाराँ कुछ भी नहीं मुट्ठी में जो आ जाए दौलत है और शौक़ तिरा वाँ कुछ भी नहीं महताब की रंगत देखी है तारों की सजावट देखी है और क़ौस-ए-क़ुज़ह की रंगीनी अंबर की जबीं पर देखी है नज़रों का फ़क़त धोका ही सही लेकिन अच्छा लगता है तुम अपने ख़यालों के बादल से अनवार-ए-सहर को बातिल ठहराओ अंदेशों के ता'ने बाने से ख़ुशबू को शिकंजों में कस दो तारों की क़बा-ए-ज़र धुँदला दो महताब की खेती पामाल करो किस तरह बसर हों शाम-ओ-सहर तारीक है शब मुश्किल है सफ़र मंज़िल की नहीं राही को ख़बर मन मेरा वीरान सही बर्बाद सही है इस से झिलमिल राह-गुज़र ख़ुशबू के डगर चाँदी के नगर गीतों के शजर तारों के समर पलकों पे चराग़ाँ का मंज़र तुम आह भरो भी तो धीरे से ऐसा न हो सब कुछ बुझ जाए इस बात का देखो ध्यान रहे
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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ज़िंदगी बोझ सही बोझ का एहसास न कर मंज़िलें दूर सही उस का तरद्दुद बे-कार जब क़दम अज़्म से उठेंगे तो रस्ता तय है और फिर राह में काँटों के सिवा नर्मी-ए-गुल भी तो मौजूद है सब्ज़ा भी है चलते चलते यूँँही आदत भी हुई जाती है थक गए हों तो यहाँ छाँव भी साया भी है गर्मी-ए-महर सताती है मगर यूँँ भी तो है रौशनी तेज़ी-ए-रफ़्तार पे उकसाती है रात तारीक है सुनसान है डर लगता है रात का रूप फ़क़त ये तो नहीं है हमदम रात महताब की खेती है सितारों का चमन रात के शहर में ख़्वाबों की फ़ुसूँ-कारी है ख़्वाब जो कोशिश-ए-पैहम को जगा देते हैं और फिर रात गुज़र जाती है सुब्ह-ए-ख़ुर्शीद का छलका हुआ पैमाना है रंग और कैफ़ की सरशार मिज़ाजी की क़सम मंज़िलें सहल हुई जाती हैं उस तरफ़ देख मकानों की जबीनों से धुआँ उठता है और रौशन है बिसात और मकीनों के तबस्सुम से फ़ज़ाएँ मामूर एक लम्हे के लिए रुक के ख़ुशियों को इकट्ठा कर लें ज़ाद-ए-रह इन को बना लें अपना परतव-ए-ज़ीस्त से ज़ुल्मत में उजाला कर लें ग़म नहीं क़ाफ़िले वालों से बिछड़ जाने का हम नई राह नए नक़्श-ए-क़दम छोड़ेंगे कारवाँ और भी गुज़़रेंगे हमारे पीछे शाम से पहले बहुत दूर पहुँचना है हमें
Rabia Barni
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फिर रात की लाँबी पलकों पर तख़य्युल के मोती ढलते हैं फिर वक़्त का अफ़्सूँ जागा है ख़ुशियों के ख़ज़ाने लुटते हैं और दिल के ज़ियाफ़त-ख़ाने के हर गोशे में शमएँ जलती हैं फूलों से सजी हैं मेहराबें ख़ुशियों की दहकती मिनक़ल से तनवीर के हाले बनते हैं ख़्वाबीदा दरीचे खुलते हैं दरवाज़ों के पर्दे हिलते हैं मेहमानों के क़दमों की आहट हर सम्त सुनाई देती है इस महफ़िल-ए-हुस्न-ओ-ख़ूबी में मैं उन से मुक़ाबिल होती हूँ ये हाथ जो मेरे हाथ में हैं फूलों से ज़ियादा नाज़ुक हैं इन ज़ुल्फ़ों के उमडे या दिल में महताब सा चेहरा रौशन है तस्लीम को सर झुकता है कोई या शाख़ हवा से लचकी है चाँदी के कटोरे बजते हैं या उस के लबों पर जुम्बिश है इन आँखों ने मुझ को देखा है या टूट के तारे बरसे हैं ये रात जो मेरे मेहमानों का इस तरह स्वागत करती है इस रात के फैले दामन पर मैं शुक्र के सज्दे करती हूँ
Rabia Barni
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