ज़िंदगी बोझ सही बोझ का एहसास न कर मंज़िलें दूर सही उस का तरद्दुद बे-कार जब क़दम अज़्म से उठेंगे तो रस्ता तय है और फिर राह में काँटों के सिवा नर्मी-ए-गुल भी तो मौजूद है सब्ज़ा भी है चलते चलते यूँँही आदत भी हुई जाती है थक गए हों तो यहाँ छाँव भी साया भी है गर्मी-ए-महर सताती है मगर यूँँ भी तो है रौशनी तेज़ी-ए-रफ़्तार पे उकसाती है रात तारीक है सुनसान है डर लगता है रात का रूप फ़क़त ये तो नहीं है हमदम रात महताब की खेती है सितारों का चमन रात के शहर में ख़्वाबों की फ़ुसूँ-कारी है ख़्वाब जो कोशिश-ए-पैहम को जगा देते हैं और फिर रात गुज़र जाती है सुब्ह-ए-ख़ुर्शीद का छलका हुआ पैमाना है रंग और कैफ़ की सरशार मिज़ाजी की क़सम मंज़िलें सहल हुई जाती हैं उस तरफ़ देख मकानों की जबीनों से धुआँ उठता है और रौशन है बिसात और मकीनों के तबस्सुम से फ़ज़ाएँ मामूर एक लम्हे के लिए रुक के ख़ुशियों को इकट्ठा कर लें ज़ाद-ए-रह इन को बना लें अपना परतव-ए-ज़ीस्त से ज़ुल्मत में उजाला कर लें ग़म नहीं क़ाफ़िले वालों से बिछड़ जाने का हम नई राह नए नक़्श-ए-क़दम छोड़ेंगे कारवाँ और भी गुज़़रेंगे हमारे पीछे शाम से पहले बहुत दूर पहुँचना है हमें
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा
Rakesh Mahadiuree
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"दुख" मुझे जो लगा, वो नहीं हूँ मैं अब उस जगह तो नहीं हूँ तू इक कॉल मैसेज नहीं कर रही है कि ऐसी वो क्या ही शिकायत है? जो मुझ सेे तू कर नहीं पा रही है बताती नहीं है सताती रही है मुझे तू बता क्यूँ ख़फ़ा है मुझे तू बता क्या हुआ है तू कुछ बोल ये ख़ामोशी काटती है मुझे जान ले बस ये आँखें किसे रोती है बस? मुझे किस का दुख है? मुझे पूछ तू फिर बताऊँ तेरा नाम मैं और तुझे मैं सुनाऊँ दिखाऊँ मेरा ग़म मेरे ज़ख़्म जो भर नहीं पा रहे हैं मुझे तेरे ऐसे सताने का दुख है तेरे लौट के फिर न आने का दुख है मेरे पास आ मेरा दुख जान लड़की सखी कोई इतना ख़फ़ा भी नहीं होता है जैसे कि तू है कि ग़ुस्सा ज़ियादा दिनो तक नहीं करना होता है समझी ए लड़की कि ग़लती भुलाने के ख़ातिर बनी है मोहब्बत निभाने के ख़ातिर बनी है कि जब दोस्ती कर ली जाए उसे फिर निभाना भी होता है लड़की मुझे याद है तू मगर मैं भुलाया गया हूँ तू बेशक मुझे छोड़ दे पर ज़रा सुन कहीं भी कभी भी किसी भी हाँ दरिया ने प्यासे को प्यासा नहीं मारा है फिर तो अब तू चली आ घड़ी हाथ की बंद हो जाए इस सेे के पहले चली आ मेरे हाथ को थाम ले दोस्त ये ज़िंदगी बाय बोले मुझे इस सेे पहले तू आ और मुझे तू गले से लगा ले
BR SUDHAKAR
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फिर रात की लाँबी पलकों पर तख़य्युल के मोती ढलते हैं फिर वक़्त का अफ़्सूँ जागा है ख़ुशियों के ख़ज़ाने लुटते हैं और दिल के ज़ियाफ़त-ख़ाने के हर गोशे में शमएँ जलती हैं फूलों से सजी हैं मेहराबें ख़ुशियों की दहकती मिनक़ल से तनवीर के हाले बनते हैं ख़्वाबीदा दरीचे खुलते हैं दरवाज़ों के पर्दे हिलते हैं मेहमानों के क़दमों की आहट हर सम्त सुनाई देती है इस महफ़िल-ए-हुस्न-ओ-ख़ूबी में मैं उन से मुक़ाबिल होती हूँ ये हाथ जो मेरे हाथ में हैं फूलों से ज़ियादा नाज़ुक हैं इन ज़ुल्फ़ों के उमडे या दिल में महताब सा चेहरा रौशन है तस्लीम को सर झुकता है कोई या शाख़ हवा से लचकी है चाँदी के कटोरे बजते हैं या उस के लबों पर जुम्बिश है इन आँखों ने मुझ को देखा है या टूट के तारे बरसे हैं ये रात जो मेरे मेहमानों का इस तरह स्वागत करती है इस रात के फैले दामन पर मैं शुक्र के सज्दे करती हूँ
Rabia Barni
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तुम अक्सर कहते रहते हो फूलों का क्या है कुछ देर में मुरझा जाते हैं और ये रातें चाँदी सी दो दिन की कहानी है उन की लम्हों में बिखर कर रह जाती है मोती की तरह शबनम की लड़ी मैं अक्सर सोचा करती हूँ क्या मौसम-ए-गुल ही सब कुछ है और ख़्वाब-ए-बहाराँ कुछ भी नहीं बिल्लोर से तरशी मूरत से अलग क्या अक्स-ए-निगाराँ कुछ भी नहीं मुट्ठी में जो आ जाए दौलत है और शौक़ तिरा वाँ कुछ भी नहीं महताब की रंगत देखी है तारों की सजावट देखी है और क़ौस-ए-क़ुज़ह की रंगीनी अंबर की जबीं पर देखी है नज़रों का फ़क़त धोका ही सही लेकिन अच्छा लगता है तुम अपने ख़यालों के बादल से अनवार-ए-सहर को बातिल ठहराओ अंदेशों के ता'ने बाने से ख़ुशबू को शिकंजों में कस दो तारों की क़बा-ए-ज़र धुँदला दो महताब की खेती पामाल करो किस तरह बसर हों शाम-ओ-सहर तारीक है शब मुश्किल है सफ़र मंज़िल की नहीं राही को ख़बर मन मेरा वीरान सही बर्बाद सही है इस से झिलमिल राह-गुज़र ख़ुशबू के डगर चाँदी के नगर गीतों के शजर तारों के समर पलकों पे चराग़ाँ का मंज़र तुम आह भरो भी तो धीरे से ऐसा न हो सब कुछ बुझ जाए इस बात का देखो ध्यान रहे
Rabia Barni
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