शोहरत और इज़्ज़त के ज़ीने पर चढ़ते फ़नकार का साया ज़िल्लत के पाताल में उतरा जाता है रोते शहरों देहातों को छोड़ के चोरों की मंडली से मिल कर इतराते बल खाते हो कभी ज़रा तारीख़ का आईना भी देखो देखो तो क्या शरमाते हो
Related Nazm
उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है
BR SUDHAKAR
12 likes
"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
16 likes
"दोस्त" ये बात तुझ सेे छुपी नहीं तू रूह है मेरी साया नहीं तू ने ये कैसे कह दिया तू दोस्त है हम सफ़र नहीं क्यूँँ तुझे आता समझ नहीं तू राह है मेरी मंज़िल नहीं
ALI ZUHRI
11 likes
"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
13 likes
" महफ़िल " क्यूँ न शाइरों की महफ़िल सजाई जाए अपनी-अपनी दास्ताने-ग़म सुनाई जाए जो बात हम ने किसी ख़ास से ना कही क्यूँ न वो इस महफ़िल में बताई जाए महबूबास मोहब्बत ना जता सके यारों तो इस महफ़िल में मोहब्बत जताई जाए पैसे-वैसे तो जैसे-तैसे कमा ही लेंगे हम क्यूँ न महफ़िल में इज़्ज़त कमाई जाए हम लोग दर्द से भरी बोतलें हैं भाईयों सबकी तरफ़ से एक एक पिलाई जाए
Sahil Verma
2 likes
More from Yahya Amjad
ताक़त सारी आप के बस में सारी ज़ेहानत आप की है हम मजबूर निहत्ते सारे फिर भी हमारे साथ हैं सब तारीख़ के धारे शब के सब असरार तुम्हारे सुब्ह का नूर हमारा है गुम रस्तों पर ख़ून के छींटे राह दिखाते तारे हैं
Yahya Amjad
0 likes
ख़ुदा गवाह दिल इक लम्हा भी नहीं ग़ाफ़िल तुम्हारी याद भी बाक़ी है दुख भी बाक़ी है वो शाम-ए-ग़म भी उसी तरह दिल पे क़ाएम है वो रोज़-ए-सख़्त भी सीने में दर्द बन कर है जब एक हमला-ए-दिल तुम पे ज़ुल्म करता था अज़ीम शहर के मरकज़ में इक उदास सा घर इलाज से महरूम तुम्हारे दुख में तड़पने को देख कर चुप था तो सारे शाही महल्लात शोर-ए-ऐश में थे मुझे तो फ़ल्सफ़ा-ए-सब्र भी गवारा है (अगरचे अस्ल में ये क़ातिलों की मंतिक़ है) मगर ये फ़ल्सफ़ा उस दिल को कौन समझाए जो तेरी याद के ग़म को ख़ुदा समझता है अगर गए हुए इक लम्हा मुड़ के आ सकते फ़ना के ब'अद दोबारा हयात अगर होती तो मैं ज़रूर लिपट कर तुम्हारे सीने से तमाम क़िस्सा-ए-ग़म आँसुओं में बरसाता मगर मुझे तो ख़बर है कि ये नहीं मुमकिन इसी लिए मिरे दिल में अलम भी बाक़ी है तिरी जिहाद-ए-मुसलसल सी ज़िंदगी की किताब मिरी हयात के इक इक वरक़ पे लिक्खी है जो तू ने राह में छोड़ा था परचम-ए-तग-ओ-दौ हरीफ़ कुछ भी कहें आज मेरे हाथ में है क़रार-ए-ख़ातिर-ए-महज़ूँ अगर कोई शय है तो उसी का ख़याल!
Yahya Amjad
0 likes
नौहे लिखते लिखते ये दिल थक जाता है बिखरे हुए हैं सब दिल वाले हम मतवाले तन्हा हैं रौशनियों के बेटे तारीकी में आ कर चमकें हम राहों में तय्यार मिलेंगे जो यलग़ार यहाँ भी होगी हम अपने ख़ूँ के फ़व्वारों को आम करेंगे एक चराग़ाँ कूचा-ए-रुस्वाई में इक बाला-ए-बाम करेंगे उन रोज़ों में ये दिल थक कर सो भी चुके तो हम ख़ुश होंगे बादल के तकिए पे बहुत आराम करेंगे
Yahya Amjad
0 likes
बहस तो अपनी है ही नहीं ताक़त वालों से सारे दावे उन के अलग हैं अपनी दलीलें अलग सी हैं वो कहते हैं उन का क़हर क़यामत बन कर कड़केगा हम कहते हैं मौत का खेल हमें जी जान से प्यारा है और इस खेल के होते हुए बस्ती में उजयारा है
Yahya Amjad
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Yahya Amjad.
Similar Moods
More moods that pair well with Yahya Amjad's nazm.







