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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है

Aasi Rizvi13 Likes

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नज़्म- क्या लिखूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को शाम, तुम को रात, तुम को चाँद, तुम को राह, तुम को चाह, तुम को शाह, तुम को बाह, तुम को नाह, बोलो मैं लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें जीवन लिखूँ अपना या फिर लोबान मैं लिख दूँ लिखूँ महफ़िल तुम्हें अपना या फिर सुनसान मैं लिख दूँ लिखूँ दिलबर तुम्हें अपना या फिर मेहमान मैं लिख दूँ लिखूँ आँसू तुम्हें अपना या फिर मुस्कान मैं लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को तुम्हें नादान, या अंजान या साथी, या लिख दूँ राह का रहबर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को धूप सूरज सा या शामों सा सुकूँ लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मैं अपना दिल मैं अपनी जान या धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को क़लम लिख दूँ किताबें भी लिखूँ तुम को नयन की मैं चमक या फूल की धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को लिखूँ तुम को मैं ठंडी रात का चादर या लिख दूँ नींद का बिस्तर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें झुमका, तुम्हें आँचल, तुम्हें धड़कन तुम्हें चाँदी, तुम्हें सोना, तुम्हें हीरा तुम्हें पायल, तुम्हें कोमल, तुम्हें मूरत तुम्हें पीतल, तुम्हें जल थल, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर

Raunak Karn

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"मैं और तुम" हम दोनों मुस्तकबिल में एक होना चाहते थे मैं इस ख़याल से डरती थी और वो दुआ माँगते थे वो मुझे हर घड़ी और मोड़ पे सँभालता था मगर दोनों डरते थे क्योंकि दोनों अलग मज़हब से थे इश्क़ में इतनी पाबंदी है क्यूँ मैं इसी सोच में रोया करती थी आँख से आँसू बहते थे तकिए को भिगोया करती थी और वो भी इसी सोच में परेशान था मैं हिंदू थी और वो मुसलमान था साथ होकर कभी अलग होंगे यार फिर साथ में ग़लत होंगे डाँटती थी उसे बराबर दिन और वो चुप मुझे अजब होंगे उस के घर वाले मान जाते लेकिन मेरा घर मुझे मार देता मैं अगर उस की नहीं होती एक दिन वो ख़ुद को हार देता इस लिए हम दोनों एक अच्छी नौकरी चाहते थे नौकरी होगी तो सब मान आई जाएँगे ये हम मानते थे लेकिन हमें पता नहीं था हमारे साथ आगे क्या होगा या फिर हम उस के रहेंगे भी या वो मुझ सेे जुदा होगा दोनों डरते थे समाज के है एक इंसान से लोग कहते थे धोखा मिलता है मुसलमान से हम एक दूजे को अच्छे से समझते थे लेकिन सारा जमाना हमारे ख़यालों से अनजान था फ़र्क़ इतना था बस मैं हिंदू थी और वो मुसलमान था

Arohi Tripathi

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"ख़ूब-सूरत अजनबी" मिला है सफ़र में मुझे एक चेहरा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत ख़ुदा ने बनाया है जो उस का मुखड़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत मुसलसल उसी को फ़क़त तक रहा हूँ उसी पर मैं इक नज़्म भी कह रहा हूँ वो रक्खी है जो अपने सर पर दुपट्टा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत बहुत क़ातिलाना है उस की निगाहें बहुत जानलेवा है उस की अदाएँ लगाई है जो उस ने आँखों पे चश्मा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत उसे हूर कह के पुकारा है मैं ने ज़रा गुफ़्तुगू कर के देखा है मैं ने उसे बात करने का जो है तरीक़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत है मालूम 'दानिश' वो इक अजनबी है मगर उस में हरगिज़ न कोई कमी है जो गुज़रा है उस का मेरे साथ लम्हा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत

Danish Balliavi

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"ठीक आज के दिन" उस वक़्त नहीं सोचा हम ने कि हम दोनों इक दूजे से एक दिन बिछड़ भी जाएँगे काश उस वक़्त इस दिन का इल्म होता तो शायद आज ये दिन न देखना पड़ता न ये आँसू बे-वज्ह बहाने पड़ते और न ही ये दिल बारहा तड़पता दिल बैठ रहा है मेरा आज के दिन ठीक आज के ही दिन वो मुझ सेे जुदा हुआ था

Sohil Barelvi

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“अधूरी नज़्म” हाँ वो तो शाइ'र है , और सखी मैं मैं हूँ नज़्म उसी की एक अधूरी जो कई बरसों पहले लिखते-लिखते छूट गई उन हाथों से ही अधूरी जिन पत्थर से हाथों को नरमी से कुछ और नई नज़्मों को बुनना था उलझन के धागों को फिर सुलझा के और नए लफ़्ज़ न सिर्फ़ पिरोने थे उन को पहले से ज़्यादा तराशना था उन को और भी ज़्यादा निखारना था लेकिन मैं जो उस की पहली नज़्म हूँ क्यूँ आज अधूरेपन से बोझिल हूँ मुझ सेे नज़रे मिलते ही उस ने तो बैचेनी से भी पन्ने पलटे हैं पर इक हाथ रहा उस का मुझ पर जो बोझ नई नज़्मों का संभाले था वो ठहरता साथ एक लम्हा मेरे तो शायद मेरा हो कर रह जाता यूँँ ही अक्सर पहली मोहब्बत सी पहली नज़्म अधूरी रह जाती है क्योंकि कभी वो ख़ुद मुझ को कह न सका उस ने मुझ को सिर्फ़ लिखा है अब तक वो कह दे तो मैं पूरी हो जाऊँ उस की आवाज़ से ज़िंदा हो जाऊँ उसे पता है मैं पूरी होते ही ख़ुद से उस को पूरा कर दूँगी और अधूरी हो जाऊँगी फिर से वो भी अधूरा रह जाएगा फिर से

Meenakshi Masoom

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