nazmKuch Alfaaz

“अधूरी नज़्म” हाँ वो तो शाइ'र है , और सखी मैं मैं हूँ नज़्म उसी की एक अधूरी जो कई बरसों पहले लिखते-लिखते छूट गई उन हाथों से ही अधूरी जिन पत्थर से हाथों को नरमी से कुछ और नई नज़्मों को बुनना था उलझन के धागों को फिर सुलझा के और नए लफ़्ज़ न सिर्फ़ पिरोने थे उन को पहले से ज़्यादा तराशना था उन को और भी ज़्यादा निखारना था लेकिन मैं जो उस की पहली नज़्म हूँ क्यूँ आज अधूरेपन से बोझिल हूँ मुझ सेे नज़रे मिलते ही उस ने तो बैचेनी से भी पन्ने पलटे हैं पर इक हाथ रहा उस का मुझ पर जो बोझ नई नज़्मों का संभाले था वो ठहरता साथ एक लम्हा मेरे तो शायद मेरा हो कर रह जाता यूँँ ही अक्सर पहली मोहब्बत सी पहली नज़्म अधूरी रह जाती है क्योंकि कभी वो ख़ुद मुझ को कह न सका उस ने मुझ को सिर्फ़ लिखा है अब तक वो कह दे तो मैं पूरी हो जाऊँ उस की आवाज़ से ज़िंदा हो जाऊँ उसे पता है मैं पूरी होते ही ख़ुद से उस को पूरा कर दूँगी और अधूरी हो जाऊँगी फिर से वो भी अधूरा रह जाएगा फिर से

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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"तुझ सेे मिल कर" तुझ सेे मिल कर एक दफ़ा ही बात हुई फिर इस दिल में बेचैनी दिन रात हुई इस पागल दिल की फ़रमाइश है तेरा चेहरा हाथों में भरने की ख़्वाहिश है ख़्वाबों में तेरा चेहरा आए हाथों से रेत की तरह फिसला जाए जाते जाते मेरे होंठों पर ठहरे तू सारे के सारे अल्फ़ाज़ ले गया खनक खनक कर मुझ सेे तेरी बातें करती थीं उन चूड़ियों की भी तू आवाज़ ले गया इक मुद्दत से तुझे नहीं देखा भला मुझे ख़ुद का भी कैसे होश रहे फिर से तेरी आहट सुनने को अब मेरी पायल बिल्कुल ख़ामोश रहे तेरे हाथों रोज़ सुलझने की चाहतें लिए मेरी ज़ुल्फ़ें उलझी उलझी रहती हैं तू क्या जाने कि मौसम-ए-सर्मा में अब कैसे मेरी साँसें तन्हा सर्द हवाएँ सहती हैं ग़ुस्से में तेरे नाम की मेहॅंदी जब मैं ने अपने कोरे आँचल पर पोंछी इस बात से ख़फ़ा मेरे उस आँचल ने ख़ुद पर गहरा दाग़ लिया तेरे आने की झूठी ख़बरों से उकता कर इन कानों ने झुमकों से वैराग लिया तेरे कपड़ों पर सिर्फ़ इस्तरी करने के ही कितने ख़्वाब लिए अपनी इन आँखों में तुझ को क्या मालूम कि मैं अपने कितने आँचल कितनी बार जला बैठी याद तुझे रखने की कोशिश में ख़ुद को पूरी तरह भुला बैठी पता नहीं कब तेरे काले कुर्ते ने मेरी आँखों से काजल लूटा पता नहीं बरसात मुसलसल क्यूँ रहती पता नहीं कैसे आँखों का दिल टूटा मैं ख़ुद सिल दूँगी अपनी साँसों के धागों से अगर उलझ कर मेरी ज़ुल्फ़ों से कभी बटन तेरे कुर्ते का जो टूटा वक़्त तेरी आस्तीन की सिलवटें लिए मेरे चेहरे से कब गुज़रा पता नहीं कई बहारें मुझ सेे हो कर गुज़रीं यार मगर मुरझाया जो दिल का फूल दुबारा खिला नहीं तू आ कर देख तो सही तेरे इंतिज़ार में अपनी उम्र जवानी की बुनते बुनते मैं ने और किया ही क्या अपने लिए लिबास बुढ़ापे का अपने हाथों से तैयार किया

Meenakshi Masoom

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