ख़ुदा गवाह दिल इक लम्हा भी नहीं ग़ाफ़िल तुम्हारी याद भी बाक़ी है दुख भी बाक़ी है वो शाम-ए-ग़म भी उसी तरह दिल पे क़ाएम है वो रोज़-ए-सख़्त भी सीने में दर्द बन कर है जब एक हमला-ए-दिल तुम पे ज़ुल्म करता था अज़ीम शहर के मरकज़ में इक उदास सा घर इलाज से महरूम तुम्हारे दुख में तड़पने को देख कर चुप था तो सारे शाही महल्लात शोर-ए-ऐश में थे मुझे तो फ़ल्सफ़ा-ए-सब्र भी गवारा है (अगरचे अस्ल में ये क़ातिलों की मंतिक़ है) मगर ये फ़ल्सफ़ा उस दिल को कौन समझाए जो तेरी याद के ग़म को ख़ुदा समझता है अगर गए हुए इक लम्हा मुड़ के आ सकते फ़ना के ब'अद दोबारा हयात अगर होती तो मैं ज़रूर लिपट कर तुम्हारे सीने से तमाम क़िस्सा-ए-ग़म आँसुओं में बरसाता मगर मुझे तो ख़बर है कि ये नहीं मुमकिन इसी लिए मिरे दिल में अलम भी बाक़ी है तिरी जिहाद-ए-मुसलसल सी ज़िंदगी की किताब मिरी हयात के इक इक वरक़ पे लिक्खी है जो तू ने राह में छोड़ा था परचम-ए-तग-ओ-दौ हरीफ़ कुछ भी कहें आज मेरे हाथ में है क़रार-ए-ख़ातिर-ए-महज़ूँ अगर कोई शय है तो उसी का ख़याल!
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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ताक़त सारी आप के बस में सारी ज़ेहानत आप की है हम मजबूर निहत्ते सारे फिर भी हमारे साथ हैं सब तारीख़ के धारे शब के सब असरार तुम्हारे सुब्ह का नूर हमारा है गुम रस्तों पर ख़ून के छींटे राह दिखाते तारे हैं
Yahya Amjad
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शोहरत और इज़्ज़त के ज़ीने पर चढ़ते फ़नकार का साया ज़िल्लत के पाताल में उतरा जाता है रोते शहरों देहातों को छोड़ के चोरों की मंडली से मिल कर इतराते बल खाते हो कभी ज़रा तारीख़ का आईना भी देखो देखो तो क्या शरमाते हो
Yahya Amjad
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नौहे लिखते लिखते ये दिल थक जाता है बिखरे हुए हैं सब दिल वाले हम मतवाले तन्हा हैं रौशनियों के बेटे तारीकी में आ कर चमकें हम राहों में तय्यार मिलेंगे जो यलग़ार यहाँ भी होगी हम अपने ख़ूँ के फ़व्वारों को आम करेंगे एक चराग़ाँ कूचा-ए-रुस्वाई में इक बाला-ए-बाम करेंगे उन रोज़ों में ये दिल थक कर सो भी चुके तो हम ख़ुश होंगे बादल के तकिए पे बहुत आराम करेंगे
Yahya Amjad
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बहस तो अपनी है ही नहीं ताक़त वालों से सारे दावे उन के अलग हैं अपनी दलीलें अलग सी हैं वो कहते हैं उन का क़हर क़यामत बन कर कड़केगा हम कहते हैं मौत का खेल हमें जी जान से प्यारा है और इस खेल के होते हुए बस्ती में उजयारा है
Yahya Amjad
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