nazmKuch Alfaaz

कभी खुली किताब सा था मैं कभी खुली किताब सा था मैं किसी हसीं ख़्वाब सा था मैं जब टूटी नींद तो सवेरों ने बताया बिस्तर पर बड़ा ही बेताब सा था मैं कभी खुली किताब सा था मैं वो आया ही नहीं जिसे पढ़ना था मुझ को वो रूठा ही जिस सेे लड़ना था मुझ को वो सिफ़र था सिफ़र ही रह गया किसी अनगिनत हिसाब सा था मैं कभी खुली किताब सा था मैं

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"कहाँ हूँ मैं" ख़ुद को जो देखा आईनों में तो जाना ना जाने कहा खो गया हूँ मैं ख़ुद में मैं ने तुझ को को तो देखा पर ख़ुद ही कहीं गुम हो गया हूँ मैं सुन ना चल मिल कर ढूँढ़ते हैं मुझ को तेरी उन्हीं गलियों में जिन से अब तक आशना हूँ मैं तेरी ही आँखों से तो देखता था मैं ख़ुद को तेरे बिना तो जैसे नाबिना हूँ मैं क़तरा क़तरा जुटा कर तू ने बनाया था मुझ को अब तू नहीं तो जैसे फ़ना हूँ मैं एक गुज़ारिश है ज़रा मान भी लेना बस इतना सा बता दे कहाँ हूँ मैं कहाँ हूँ मैं कहाँ हूँ मैं

Mohammad Talib Ansari

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"और मुलाक़ात हो गई" अरे माँ बाबा आप आ गए,और बताएँ कैसे हो मैं जन्नत में ख़ुश थी तब से , आप बताएँ कैसे हो बताओ ना दुनिया कैसी है , क्या जन्नत के जैसी है क्या वहाँ भी नदियाँ झूले है, या आज भी जहन्नुम जैसी है बोलो ना आप चुप क्यूँँ हो, क्या मुझ में ऐसी बुरी बात मिली पैदा होने से पहले ही मार दिया, क्यूँँ क़त्ल की मुझे सौग़ात मिली क्यूँँ काटा-पीटा टुकड़े किया, और कचरे में फेंक दिया पर शुक्र है उस ख़ुदा का, मुझे लेने एक फ़रिश्ता भेज दिया अब आप को जन्नत कैसे ले जाऊँ, वो जहाँ का ख़ालिक़ बवाल करता है किस जुर्म में मेरा क़त्ल हुआ , ऐसा मुझ से सवाल करता है जाओ ना उसे जवाब दो, फिर हम जन्नत साथ चले वहाँ झुला झूलेंगे सब मिल कर, करते हुए चलो बात चले शुक्र है इस जहाँ में तो, मेरी आपसे बात हो गई मैं ने अपने क़ातिल को देखना चाहा , और मुलाक़ात हो गई

Mohammad Talib Ansari

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"बुरा" तुम मुझे बुरा कहते हो तो फिर क्यूँँ मुझे अच्छा नहीं करते देते हो बार-हा हिदायत-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद गर फ़िक्र-ए-हक़ीक़तन है तो क्यूँँ दुआ नहीं करते माना कि बीमार मैं और चारा-गर तुम किस ने रोका है तुम्हें क्यूँँ मेरी दवा नहीं करते कौन रक़ीब क़रीब है कौन क़रीब रक़ीब है किस को पता मैं कैसे मान लूँ तुम पीठ पीछे दग़ा नहीं करते ज़मीन-ओ-आसमाँ फ़ट जाएँगे एक दिन और सूरज भी आ गिरेगा लोग तब भी यही कहते होंगे हम किसी का बुरा नहीं करते हम ने माना गर मोमिन नहीं तो काफ़िर भी नहीं तालिब हमें झुकते नहीं देखा मतलब ये नहीं कि हम सज्दा नहीं करते

Mohammad Talib Ansari

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