"खिलौना" देर से एक ना-समझ बच्चा इक खिलौने के टूट जाने पर इस तरह से उदास बैठा है जैसे मय्यत क़रीब रक्खी हो और मरने के बा'द हर हर बात मरने वाले की याद आती हो जाने क्या क्या ज़रा तवक़्क़ुफ़ से सोच लेता है और रोता है लेकिन इतनी ख़बर कहाँ उस को ज़िंदगी के अजीब हाथों में ये भी मिट्टी का इक खिलौना है
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"उजड़ते बसते घर" बहुत तूफ़ान हैं मेरी जान, न घर बना इस ख़ुश्क साहिल पे सुनो! ये घर नहीं बस रेत का छोटा घरौंदा है, न जाने कितने तूफ़ानों ने कितनी बार रौंदा है बहुत टूटा है और फिर टूट कर बनता बिगड़ता है, ये मेरी हसरतों को चैन देकर फिर उजड़ता है उजड़कर चल पड़ा ये फिर किसी उजड़े से साहिल पे तो क्या? तूफ़ान हैं मेरी जान पर! तू घर बना इसी ख़ुश्क साहिल पे
Anmol Mishra
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"मेरा शहर" शहर मेरा उदास गंगा सा कोई भी आए और अपने पाप खो के जाता है धोके जाता है आग का खेल खेलने वाले ये नहीं जानते कि पानी का आग से बैर है हमेशा का आग कितनी ही ख़ौफ़नाक सही उस की लपटों की उम्र थोड़ी है और गंगा के साफ़ पानी को आज बहना है कल भी बहना है जाने किस किस का दर्द सहना है शहर मेरा उदास गंगा सा
Waseem Barelvi
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"दीवाने की जन्नत" मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई हो अपने साए से झिझकती हुई घबराती हुई अपने एहसास की तहरीक पे शरमाती हुई अपने क़दमों की भी आवाज़ से कतराती हुई अपनी साँसों के महकते हुए अंदाज़ लिए अपनी ख़ामोशी में गहनाए हुए राज़ लिए अपने होंटों पे इक अंजाम का आग़ाज़ लिए दिल की धड़कन को बहुत रोकती समझाती हुई अपनी पायल की ग़ज़ल-ख़्वानी पे झल्लाती हुई नर्म शानों पे जवानी का नया बार लिए शोख़ आँखों में हिजाबात से इनकार लिए तेज़ नब्ज़ों में मुलाक़ात के आसार लिए काले बालों से बिखरती हुई चम्पा की महक सुर्ख़ आरिज़ पे दमकते हुए शालों की चमक नीची नज़रों में समाई हुई ख़ुद्दार झिजक नुक़रई जिस्म पे वो चाँद की किरनों की फुवार चाँदनी रात में बुझता हुआ पलकों का सितार फ़र्त-ए-जज़्बात से महकी हुई साँसों की क़तार दूर माज़ी की बद-अंजाम रिवायात लिए नीची नज़रें वही एहसास-ए-मुलाक़ात लिए वही माहौल वही तारों भरी रात लिए आज तुम आई हो दोहराती हुई माज़ी को मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई हो काश इक ख़्वाब रहे तल्ख़ हक़ीक़त न बने ये मुलाक़ात भी दीवाने की जन्नत न बने
Waseem Barelvi
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"अदना सा बासी" कल भी मेरी प्यास पे दरिया हँसते थे आज भी मेरे दर्द का दरमाँ कोई नहीं मैं इस धरती का अदना सा बासी हूँ सच पूछो तो मुझ सा परेशाँ कोई नहीं कैसे कैसे ख़्वाब बुने थे आँखों ने आज भी उन ख़्वाबों सा अर्ज़ां कोई नहीं कल भी मेरे ज़ख़्म भुनाए जाते थे आज भी मेरे हाथ में दामाँ कोई नहीं कल मेरा नीलाम किया था ग़ैरों ने आज तो मेरे अपने बेचे देते हैं सच पूछो तो मेरी ख़ता बस इतनी है मैं इस धरती का अदना सा बासी हूँ
Waseem Barelvi
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"बेबसी" वक़्त के तेज़ गाम दरिया में तू किसी मौज की तरह उभरी आँखों आँखों में हो गई ओझल और मैं एक बुलबुले की तरह इसी दरिया के इक किनारे पर नरकुलों के मुहीब झावे में ऐसा उलझा कि ये भी भूल गया बुलबुले की बिसात ही क्या थी
Waseem Barelvi
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"ख़्वाब नहीं देखा" मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है रात खिलने का गुलाबों से महक आने का ओस की बूंदों में सूरज के समा जाने का चाँद सी मिट्टी के ज़र्रों से सदा आने का शहर से दूर किसी गाँव में रह जाने का खेत खलियानों में बाग़ों में कहीं गाने का सुब्ह घर छोड़ने का देर से घर आने का बहते झरनों की खनकती हुई आवाज़ों का चहचहाती हुई चिड़ियों से लदी शाख़ों का नर्गिसी आँखों में हँसती हुई नादानी का मुस्कुराते हुए चेहरे की ग़ज़ल ख़्वानी का तेरा हो जाने तिरे प्यार में खो जाने का तेरा कहलाने का तेरा ही नज़र आने का मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है हाथ रख दे मिरी आँखों पे कि नींद आ जाए
Waseem Barelvi
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