ख़ुद-कुशी के पुल पर समुंदर की लहरों में बहती फ़सुर्दा ओ नाकाम जिस्मों की रूहें बुलाती हैं मुझ को चले आओ हर ग़म से दामन छुड़ा लो मिटा दो फ़ना होने वाले बदन को मिटा दो फ़ना से न डरना यही अस्ल में ज़िंदगी है इसी में हक़ीक़ी ख़ुशी है समुंदर की लहरों में सय्याल रूहों के गीतों में बेहद कशिश है ये दिल चाहता है कि मैं जा मिलूँ उन से उन सा ही हो जाऊँ पर मैं उन्हें किस तरह ये बताऊँ कि ऐ इज़्तिराब-ए-मुसलसल के गिर्दाब में क़ैद रूहो मुझे तुम से हमदर्दी है प्यार है मैं ख़ुद चाहता हूँ मन ओ तू की सारी फ़सीलें फलाँगूँ मगर क्या करूँँ कुछ मुक़द्दस से रिश्ते दुआ-गो सी आँखें मुझे याद आती हैं चुप-चाप घर लौट आता हूँ मैं उन हसीं प्यारे लोगों की ख़ातिर तो जीना पड़ेगा ये ज़हराब पीना पड़ेगा
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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एक बोसे की तलब में जिस्म कुब्ड़े हो गए ज़िंदगी पानी हुई आसमाँ से कहकशाओं की बहार आग बरसाती रही ज़िंदगी फ़ुट-पाथ पर एक रोटी की तलब में हाथ फैलाती रही क़तरा क़तरा बेबसी तेज़ाब सी जिस्म पिघलाती रही रद्दी चुनवाती रही नेटी-जेटी पर खड़ी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा हँसती रही और ख़ुदा ख़ामोश था
Faheem Shanas Kazmi
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मुंडेरों से जब धूप उतरी अभी रात जागी नहीं थी अभी ख़्वाब का चाँद सहरा में सोया हुआ था समुंदर के बालों में चाँदी चमकती नहीं थी किसी ताक़ में भी दिए की कोई लो भड़कती नहीं थी फ़ज़ाओं में गीतों की महकार थी परिंदे अभी आशियानों को भूले नहीं थे वो सपनों में खोई हुई थी ज़माने पे जब धूप उतरी तो उस ने बदन को समेटा नहीं था ये मिट्टी की ज़रख़ेज़ी जागी नहीं थी सो जब रात उतरी ज़मीं ख़्वाब ख़ुश्बू ये मौसम ये मैं मेरी आँखें मिरा दिल उसे रो रहे थे ज़माने पर जब रात उतरी
Faheem Shanas Kazmi
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ख़्वाब गर्मी की छुट्टीयों पे गए हो गए बंद गेट आँखों के इश्क़ को दाख़िला मिला ही नहीं ख़्वाहिशें लॉकरों में क़ैद रहीं जो बिके उस के दाम अच्छे हों ज़िंदगी हो कि कोई तितली हो बे-सबाती के रंग कच्चे हैं कौन बतलाए उन ज़मीनों को जंगलों के घने दरख़्तों में गर ख़िज़ाँ बेले-डांस करती हो मिस्र को कौन याद करता है कम नहीं लखनऊ की उमराओ इस से बेहतर यहाँ पे हैं फ़िरऔन कौन सा देवता और क्या र'अमीस मिर्ज़ा-'वाजिद'-अली भी कम तो नहीं कौन गिर्या करे, करे मातम कौन तारीख़-ए-किश्त-ओ-ख़ूँ को पढ़े बेबसी गीत बुनती रहती है दोनों आँखों को ढाँपे हाथों से
Faheem Shanas Kazmi
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इस के आदाब तो पहले सीखो ख़ाक में ख़ून-ए-रग-ए-जाँ तो मिला कर देखो आँख दरिया तो बना कर देखो शाम की ठंडी हवा रास्तों को देगी बोसे ख़्वाब आँखों में समुंदर का उतर आएगा रंग में रंग मिलेंगे गीत फिर छेड़ेंगे दरिया के किनारे अश्जार आईना देखते हो सतह-ए-दरिया पे जहाँ काई बने आईना चाँदनी झील की लहरों पे बने आईना अश्क आँखों से गिरे और बने आईना सारबानों के क़दम चूमते जो दश्त बने आईना आतिश-ए-ग़म से जले दिल तो बने आईना आँख से साफ़ करो गर्द नज़र तेज़ करो ख़ाक में ख़्वाब मिलाओ उसे महमेज़ करो
Faheem Shanas Kazmi
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आलम-पनाह ख़ैर से बेदार हो गए आलम-पनाह!.... ख़ैर..... कहाँ आप चल दिए रस्ते तमाम बंद हुए देर हो गई और कैसी दोपहर में घनी रात हो गई फ़ानूस झाड़ क़ुमक़ु में रौशन नहीं हुए और ताक़चों में बाक़ी नहीं कोई भी चराग़ और बेगमात हुजरे से बाहर निकल पड़ीं और शाहज़ादियों के सरों पर नहीं रिदा ये रंग-ओ-रूप ये क़द-ओ-क़ामत ये चश्म ओ गोश क्या रास्ते में फ़र्श बिछाने को कोई है कोई कनीज़ कोई भी ख़ादिम नहीं रहा? शीरीनी-ए-लताफ़त-ओ-आराइश-ए-हयात और क्या हुए वो नाज़-ओ-नज़ाकत के शाहकार दीवार पर है आयत-ऊल-कुर्सी का चौखटा जुज़दान ओ जा-नमाज़ मसहरी के पास है आँखें उठा के देखने वाला कोई नहीं पहनाए आ के आप को पा-पोश कौन अब मसनद-नशीं जो आप हों ये वक़्त वो नहीं ये वक़्त है अजीब कि मुश्किल बड़ी है ये शोअरा मुसाहिबीन असा-दार ओ ख़ासा-दार मीर-ए-सिपह ग़ुलाम भी बाक़ी नहीं रहे जो जंग होने वाली थी आग़ाज़ हो चुकी जो रात ढलने वाली थी कब की वो ढल चुकी शाही-महल के पार तो दुनिया बदल गई और अस्प-ए-शाह-गाम तो सब जाट ले गए आलम-पनाह शहर तो बर्बाद गया
Faheem Shanas Kazmi
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