एक बोसे की तलब में जिस्म कुब्ड़े हो गए ज़िंदगी पानी हुई आसमाँ से कहकशाओं की बहार आग बरसाती रही ज़िंदगी फ़ुट-पाथ पर एक रोटी की तलब में हाथ फैलाती रही क़तरा क़तरा बेबसी तेज़ाब सी जिस्म पिघलाती रही रद्दी चुनवाती रही नेटी-जेटी पर खड़ी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा हँसती रही और ख़ुदा ख़ामोश था
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को
Allama Iqbal
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कितने मंज़र टूट के गिरते रहते हैं इन आँखों से यख़-बस्ता पातालों में कितने दुख हर लम्हा लिपटे रहते हैं उजले पाँव के छालों से किन यादों का बोझ उठाए फिरते हैं हम ज़ेहनों में जो बाक़ी नहीं हवालों में चाँदनी जैसे कितने ही जिस्म डूबते डूबते चीख़ रहे थे मिट्टी के कच्चे प्यालों में और अब तो कुछ ऐसा है जिन की ख़ातिर हम ने सारी उम्र गँवाई याद नहीं वो आए गुज़रे सालों में
Faheem Shanas Kazmi
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मुंडेरों से जब धूप उतरी अभी रात जागी नहीं थी अभी ख़्वाब का चाँद सहरा में सोया हुआ था समुंदर के बालों में चाँदी चमकती नहीं थी किसी ताक़ में भी दिए की कोई लो भड़कती नहीं थी फ़ज़ाओं में गीतों की महकार थी परिंदे अभी आशियानों को भूले नहीं थे वो सपनों में खोई हुई थी ज़माने पे जब धूप उतरी तो उस ने बदन को समेटा नहीं था ये मिट्टी की ज़रख़ेज़ी जागी नहीं थी सो जब रात उतरी ज़मीं ख़्वाब ख़ुश्बू ये मौसम ये मैं मेरी आँखें मिरा दिल उसे रो रहे थे ज़माने पर जब रात उतरी
Faheem Shanas Kazmi
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ख़्वाब गर्मी की छुट्टीयों पे गए हो गए बंद गेट आँखों के इश्क़ को दाख़िला मिला ही नहीं ख़्वाहिशें लॉकरों में क़ैद रहीं जो बिके उस के दाम अच्छे हों ज़िंदगी हो कि कोई तितली हो बे-सबाती के रंग कच्चे हैं कौन बतलाए उन ज़मीनों को जंगलों के घने दरख़्तों में गर ख़िज़ाँ बेले-डांस करती हो मिस्र को कौन याद करता है कम नहीं लखनऊ की उमराओ इस से बेहतर यहाँ पे हैं फ़िरऔन कौन सा देवता और क्या र'अमीस मिर्ज़ा-'वाजिद'-अली भी कम तो नहीं कौन गिर्या करे, करे मातम कौन तारीख़-ए-किश्त-ओ-ख़ूँ को पढ़े बेबसी गीत बुनती रहती है दोनों आँखों को ढाँपे हाथों से
Faheem Shanas Kazmi
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मिरे पाँव के नीचे ख़ाक नहीं किसी और ज़मीं की मिट्टी है'' मिरे हाथ में वक़्त की रासें हैं जो पल पल फिसली जाती हैं और हरे दरख़्तों की शाख़ें मिरा रस्ता झाँकती रहती हैं और सब्ज़ घनेरा जंगल है मिरे पाँव के नीचे चाँद नहीं इक और ही देस की मिट्टी है और धूप का दरिया मौज में है और दश्त मिरे क़दमों से लिपटा जाता है मुझे कोई न कोई बुलाता है मिरे पाँव भी मेरे पाँव नहीं मिरा जिस्म नहीं मिरी जान नहीं मिरी आँखों ने ग़द्दारी की मिरे हाथ किसी ने काट दिए मिरा दिल मुझे राह में छोड़ गया अब धूप का दरिया मौज में है और दूर कोई जंगल में है
Faheem Shanas Kazmi
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ख़ुद-कुशी के पुल पर समुंदर की लहरों में बहती फ़सुर्दा ओ नाकाम जिस्मों की रूहें बुलाती हैं मुझ को चले आओ हर ग़म से दामन छुड़ा लो मिटा दो फ़ना होने वाले बदन को मिटा दो फ़ना से न डरना यही अस्ल में ज़िंदगी है इसी में हक़ीक़ी ख़ुशी है समुंदर की लहरों में सय्याल रूहों के गीतों में बेहद कशिश है ये दिल चाहता है कि मैं जा मिलूँ उन से उन सा ही हो जाऊँ पर मैं उन्हें किस तरह ये बताऊँ कि ऐ इज़्तिराब-ए-मुसलसल के गिर्दाब में क़ैद रूहो मुझे तुम से हमदर्दी है प्यार है मैं ख़ुद चाहता हूँ मन ओ तू की सारी फ़सीलें फलाँगूँ मगर क्या करूँँ कुछ मुक़द्दस से रिश्ते दुआ-गो सी आँखें मुझे याद आती हैं चुप-चाप घर लौट आता हूँ मैं उन हसीं प्यारे लोगों की ख़ातिर तो जीना पड़ेगा ये ज़हराब पीना पड़ेगा
Faheem Shanas Kazmi
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