कितने मंज़र टूट के गिरते रहते हैं इन आँखों से यख़-बस्ता पातालों में कितने दुख हर लम्हा लिपटे रहते हैं उजले पाँव के छालों से किन यादों का बोझ उठाए फिरते हैं हम ज़ेहनों में जो बाक़ी नहीं हवालों में चाँदनी जैसे कितने ही जिस्म डूबते डूबते चीख़ रहे थे मिट्टी के कच्चे प्यालों में और अब तो कुछ ऐसा है जिन की ख़ातिर हम ने सारी उम्र गँवाई याद नहीं वो आए गुज़रे सालों में
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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ख़्वाब गर्मी की छुट्टीयों पे गए हो गए बंद गेट आँखों के इश्क़ को दाख़िला मिला ही नहीं ख़्वाहिशें लॉकरों में क़ैद रहीं जो बिके उस के दाम अच्छे हों ज़िंदगी हो कि कोई तितली हो बे-सबाती के रंग कच्चे हैं कौन बतलाए उन ज़मीनों को जंगलों के घने दरख़्तों में गर ख़िज़ाँ बेले-डांस करती हो मिस्र को कौन याद करता है कम नहीं लखनऊ की उमराओ इस से बेहतर यहाँ पे हैं फ़िरऔन कौन सा देवता और क्या र'अमीस मिर्ज़ा-'वाजिद'-अली भी कम तो नहीं कौन गिर्या करे, करे मातम कौन तारीख़-ए-किश्त-ओ-ख़ूँ को पढ़े बेबसी गीत बुनती रहती है दोनों आँखों को ढाँपे हाथों से
Faheem Shanas Kazmi
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मुंडेरों से जब धूप उतरी अभी रात जागी नहीं थी अभी ख़्वाब का चाँद सहरा में सोया हुआ था समुंदर के बालों में चाँदी चमकती नहीं थी किसी ताक़ में भी दिए की कोई लो भड़कती नहीं थी फ़ज़ाओं में गीतों की महकार थी परिंदे अभी आशियानों को भूले नहीं थे वो सपनों में खोई हुई थी ज़माने पे जब धूप उतरी तो उस ने बदन को समेटा नहीं था ये मिट्टी की ज़रख़ेज़ी जागी नहीं थी सो जब रात उतरी ज़मीं ख़्वाब ख़ुश्बू ये मौसम ये मैं मेरी आँखें मिरा दिल उसे रो रहे थे ज़माने पर जब रात उतरी
Faheem Shanas Kazmi
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कोई आग पिए कि ज़हर पिए या साँप डसे की मौत मरे अब धूप के जल-थल दरिया से कोई अपने मुँह में रेत भरे हम ने तो पियाला उलट दिया और उलट दिया हर इक मंज़र जब शाम की आँखें ख़ून हुईं और बूदला बोटी बोटी थी ये बस्ती ज़ुल्म की ज़ुल्मत में तब कच्ची धूप चबाती थी और दरिया पीती जाती थी मिसवाक ज़मीन में गाड़ दी है अब रात से रात निकाली है और आग में डाली मस्त धमाल और राख में राख मिला दी है अब ख़ैर की ख़त्म हुई उम्मीद अब फांको रेत और धूप पियो या साँप डसे की मौत मरो हम ने तो पियाला उलट दिया और सब्र की चादर तह कर दी
Faheem Shanas Kazmi
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कहीं जब सरफ़रोशी की मोहब्बत इस्तक़ामत की शहादत की वतन की बात चलती है मुझे तुम याद आते हो ये धारे रुक नहीं सकते सितारे झुक नहीं सकते किनारे देखते रहना नज़ारे रुक नहीं सकते हवा बहती ही रहती है समुंदर से समुंदर तक लहू दरयाफ़्त करता है नई तहरीक का मंशूर ये किरनें दर्ज करती हैं हर इक धरती पे होने का नया दस्तूर हर इक रस्ते पे हैं दार-ओ-रसन के नीलगूँ साए लहू से आग की लपटें निकलती हैं क़तारों में दर-ए-ज़िंदाँ पे हर लम्हा अजब सी भीड़ रहती है ये कैसी आग है जो सर्द होने को नहीं आती ये कैसा ख़्वाब है ता'बीर आँखें छीन लेती है शुजाअ'त क़र्ज़ होती है मोहब्बत फ़र्ज़ होती है किसी कर्नल के क़त्ल-ए-आम से लश्कर नहीं रुकते सलीबों से नहीं डरते लहू के धारे में बहते सितारे रुक नहीं सकते अबद के आसमानों से इशारे रुक नहीं सकते अजब ही लोग होते हैं ख़ुद अपनी मिट्टी की ख़ातिर जो जान-आे-तन लुटाते हैं ग़ज़ब ही लोग होते हैं कि जो तारीख़ के धारे के रुख़ को मोड़ देते हैं मोहब्बत करने वाले लोग पागल लोग होते हैं किसी से जो नहीं डरते ये वो दरिया हैं जिन की आख़िरी मंज़िल अबद का आख़िरी साहिल ये वो दरिया समुंदर जिन का रस्ता है समुंदर किस से कब तस्ख़ीर होता है समुंदर है ज़माना और ज़माना किस से कब ज़ंजीर होता है
Faheem Shanas Kazmi
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मिरे पाँव के नीचे ख़ाक नहीं किसी और ज़मीं की मिट्टी है'' मिरे हाथ में वक़्त की रासें हैं जो पल पल फिसली जाती हैं और हरे दरख़्तों की शाख़ें मिरा रस्ता झाँकती रहती हैं और सब्ज़ घनेरा जंगल है मिरे पाँव के नीचे चाँद नहीं इक और ही देस की मिट्टी है और धूप का दरिया मौज में है और दश्त मिरे क़दमों से लिपटा जाता है मुझे कोई न कोई बुलाता है मिरे पाँव भी मेरे पाँव नहीं मिरा जिस्म नहीं मिरी जान नहीं मिरी आँखों ने ग़द्दारी की मिरे हाथ किसी ने काट दिए मिरा दिल मुझे राह में छोड़ गया अब धूप का दरिया मौज में है और दूर कोई जंगल में है
Faheem Shanas Kazmi
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