nazmKuch Alfaaz

मिरे पाँव के नीचे ख़ाक नहीं किसी और ज़मीं की मिट्टी है'' मिरे हाथ में वक़्त की रासें हैं जो पल पल फिसली जाती हैं और हरे दरख़्तों की शाख़ें मिरा रस्ता झाँकती रहती हैं और सब्ज़ घनेरा जंगल है मिरे पाँव के नीचे चाँद नहीं इक और ही देस की मिट्टी है और धूप का दरिया मौज में है और दश्त मिरे क़दमों से लिपटा जाता है मुझे कोई न कोई बुलाता है मिरे पाँव भी मेरे पाँव नहीं मिरा जिस्म नहीं मिरी जान नहीं मिरी आँखों ने ग़द्दारी की मिरे हाथ किसी ने काट दिए मिरा दिल मुझे राह में छोड़ गया अब धूप का दरिया मौज में है और दूर कोई जंगल में है

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा

Rakesh Mahadiuree

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मुंडेरों से जब धूप उतरी अभी रात जागी नहीं थी अभी ख़्वाब का चाँद सहरा में सोया हुआ था समुंदर के बालों में चाँदी चमकती नहीं थी किसी ताक़ में भी दिए की कोई लो भड़कती नहीं थी फ़ज़ाओं में गीतों की महकार थी परिंदे अभी आशियानों को भूले नहीं थे वो सपनों में खोई हुई थी ज़माने पे जब धूप उतरी तो उस ने बदन को समेटा नहीं था ये मिट्टी की ज़रख़ेज़ी जागी नहीं थी सो जब रात उतरी ज़मीं ख़्वाब ख़ुश्बू ये मौसम ये मैं मेरी आँखें मिरा दिल उसे रो रहे थे ज़माने पर जब रात उतरी

Faheem Shanas Kazmi

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ख़्वाब गर्मी की छुट्टीयों पे गए हो गए बंद गेट आँखों के इश्क़ को दाख़िला मिला ही नहीं ख़्वाहिशें लॉकरों में क़ैद रहीं जो बिके उस के दाम अच्छे हों ज़िंदगी हो कि कोई तितली हो बे-सबाती के रंग कच्चे हैं कौन बतलाए उन ज़मीनों को जंगलों के घने दरख़्तों में गर ख़िज़ाँ बेले-डांस करती हो मिस्र को कौन याद करता है कम नहीं लखनऊ की उमराओ इस से बेहतर यहाँ पे हैं फ़िरऔन कौन सा देवता और क्या र'अमीस मिर्ज़ा-'वाजिद'-अली भी कम तो नहीं कौन गिर्या करे, करे मातम कौन तारीख़-ए-किश्त-ओ-ख़ूँ को पढ़े बेबसी गीत बुनती रहती है दोनों आँखों को ढाँपे हाथों से

Faheem Shanas Kazmi

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कितने मंज़र टूट के गिरते रहते हैं इन आँखों से यख़-बस्ता पातालों में कितने दुख हर लम्हा लिपटे रहते हैं उजले पाँव के छालों से किन यादों का बोझ उठाए फिरते हैं हम ज़ेहनों में जो बाक़ी नहीं हवालों में चाँदनी जैसे कितने ही जिस्म डूबते डूबते चीख़ रहे थे मिट्टी के कच्चे प्यालों में और अब तो कुछ ऐसा है जिन की ख़ातिर हम ने सारी उम्र गँवाई याद नहीं वो आए गुज़रे सालों में

Faheem Shanas Kazmi

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ख़ुद-कुशी के पुल पर समुंदर की लहरों में बहती फ़सुर्दा ओ नाकाम जिस्मों की रूहें बुलाती हैं मुझ को चले आओ हर ग़म से दामन छुड़ा लो मिटा दो फ़ना होने वाले बदन को मिटा दो फ़ना से न डरना यही अस्ल में ज़िंदगी है इसी में हक़ीक़ी ख़ुशी है समुंदर की लहरों में सय्याल रूहों के गीतों में बेहद कशिश है ये दिल चाहता है कि मैं जा मिलूँ उन से उन सा ही हो जाऊँ पर मैं उन्हें किस तरह ये बताऊँ कि ऐ इज़्तिराब-ए-मुसलसल के गिर्दाब में क़ैद रूहो मुझे तुम से हमदर्दी है प्यार है मैं ख़ुद चाहता हूँ मन ओ तू की सारी फ़सीलें फलाँगूँ मगर क्या करूँँ कुछ मुक़द्दस से रिश्ते दुआ-गो सी आँखें मुझे याद आती हैं चुप-चाप घर लौट आता हूँ मैं उन हसीं प्यारे लोगों की ख़ातिर तो जीना पड़ेगा ये ज़हराब पीना पड़ेगा

Faheem Shanas Kazmi

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कहीं जब सरफ़रोशी की मोहब्बत इस्तक़ामत की शहादत की वतन की बात चलती है मुझे तुम याद आते हो ये धारे रुक नहीं सकते सितारे झुक नहीं सकते किनारे देखते रहना नज़ारे रुक नहीं सकते हवा बहती ही रहती है समुंदर से समुंदर तक लहू दरयाफ़्त करता है नई तहरीक का मंशूर ये किरनें दर्ज करती हैं हर इक धरती पे होने का नया दस्तूर हर इक रस्ते पे हैं दार-ओ-रसन के नीलगूँ साए लहू से आग की लपटें निकलती हैं क़तारों में दर-ए-ज़िंदाँ पे हर लम्हा अजब सी भीड़ रहती है ये कैसी आग है जो सर्द होने को नहीं आती ये कैसा ख़्वाब है ता'बीर आँखें छीन लेती है शुजाअ'त क़र्ज़ होती है मोहब्बत फ़र्ज़ होती है किसी कर्नल के क़त्ल-ए-आम से लश्कर नहीं रुकते सलीबों से नहीं डरते लहू के धारे में बहते सितारे रुक नहीं सकते अबद के आसमानों से इशारे रुक नहीं सकते अजब ही लोग होते हैं ख़ुद अपनी मिट्टी की ख़ातिर जो जान-आे-तन लुटाते हैं ग़ज़ब ही लोग होते हैं कि जो तारीख़ के धारे के रुख़ को मोड़ देते हैं मोहब्बत करने वाले लोग पागल लोग होते हैं किसी से जो नहीं डरते ये वो दरिया हैं जिन की आख़िरी मंज़िल अबद का आख़िरी साहिल ये वो दरिया समुंदर जिन का रस्ता है समुंदर किस से कब तस्ख़ीर होता है समुंदर है ज़माना और ज़माना किस से कब ज़ंजीर होता है

Faheem Shanas Kazmi

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