"ख़्वाब" ये ख़्वाब मुझे क्यो आते हैँ पल-पल मुझे तड़पाते हैं तुम मेरे सपनों में आती हो फिर सारी रात जगाती हो इब्तिदास इंतिहाँ तक क़िस्से से दास्ताँ तक मैं महज़ तुम्हारा हूँ और सारा का सारा हूँ तुम न जाने किस की हो मैं इस सोच में डूबा रहता हूँ तेरी ना-मौजूदगी का एहसास और हज़ारो बेचैनियाँ सहता हूँ बुरे वक़्त में मैं तुझे हासिल नहीं था मेरे सजना मैं इस काबिल नहीं था वो बेबसी और मजबूरी इस तरह थी मैं वो दरिया जिस का साहिल नहीं था
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"बीच राह" सर्द मौसम और ये राहें अकेली और कब तेरी ज़रूरत होगी सहेली मैं चलता चलता हाथ फैलाता हूँ तेरा हाथ मेरे हाथ में नहीं पाता हूँ फिर होश में आता हूँ घबराता हूँ बीच राहों में रुक के बैठ जाता हूँ कुछ सोच कुछ ख़याल आते रहते हैं ज़िन्दगी के सारे मलाल आते रहते हैं बैठा-बैठा इंतिज़ार करता हूँ तेरा ज़िक्र बार-बार करता हूँ रुक सा गया हूँ थम सा गया हूँ अब तो ख़ुद को भी खो चुका हूँ रोने के लिए आँख में आँसू नहीं पर गला मेरा ख़ूब चीख़ता है तू ही बतला दे मुझ को ऐ सहेली ये दर्द नहीं आख़िर तो और क्या है गर्दन बीच घुटनों में हौसला पस्त और तू वहाँ बैठा है हो के मस्त मैं किसी को ख़बर कर भी नहीं सकता बीच सारे राह में मर भी नहीं सकता ये ज़िंदगी का सफ़र है और मौत मंज़िल तय तो हर हाल में करना पड़ेगा और तेरे बग़ैर ऐ सहेली मुझे मंज़िल पाने के वास्ते अभी मरना पड़ेगा
Deep kamal panecha
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"तबाह" कुछ ख़ामी तो मुझ में है ही ऐसे तो कोई तन्हा नहीं करता ज़ख़्म अता नहीं करता ख़ुदस जुदा नहीं करता मैं ने तो अब तक किसी को सताया नहीं किसी को रुलाया नहीं फिर क्यूँँ कोई मुझ से वफ़ा नहीं करता दाग़ ही दाग़ हैं मेरे जिस्म पर चाक गिरेबाँ का मैं बस इसी लिए कोई मुझ से गिला नहीं करता हसीं ख़्वाब सी गुज़ारनी चाहिए ज़िन्दगी दोज़ख़ सी गुज़ार रहा हूँ मेरी इबारत के हर हर्फ़ को सीने पर लहू से उतार रहा हूँ गुज़ार रहा हूँ बुराई में तन्हाई में रुसवाई में परछाई में आख़िरश यही लिखा है क्या मेरी ज़िंदगी की रौशनाई में ख़्वाब हक़ीक़त नहीं पर मैं समझता हूँ तेरे बिना ही सही ज़िंदा तो रहता हूँ रहता हूँ ख़ामोश कोई आरज़ू कोई जुस्तजू नहीं करता तेरे साए के सिवा अब मैं किसी से गुफ़्तगू नहीं करता कब तक ख़्वाब की आरज़ू पर ज़िन्दगी चलेगी कब तक साए से गुफ़्तगू रहेगी ये बहुत लम्बा वक़्त हो चुका है अब जान-ए-जाँ तेरे लौट आने का वक़्त हो चुका है कुछ तो मेरा ख़याल कर या मुझ सेे कोई सवाल कर बस इतना कमाल कर आ गले लगा और तबाह कर
Deep kamal panecha
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इकरार तन्हाई में हम ने दिन गुज़ारे हैं अब हम आपसे पूछते हैं क्या आप हमारे हैं हम तो हुकुम यहाँ मौजूद भी नहीं फिर आपने किस के लिए बाल सँवारे हैं गुज़ारे हैं जैसे हम ने ये सुब्ह-ओ-शाम क्या कभी आपने भी गुज़ारे हैं चाँद तारे सितारे शब ठण्डी हवा और तिरा शाइ'र मुझे तड़पाने रुलाने घुटाने आते सारे हैं पल पल मिल कर पल पल खोने वाले ग़ैर की बाहों में हसीं रात बन के सोने वाले रुलाने वाले तेरे अज़ाब हैं और फ़क़त तेरा मेरे सामने ही हिज़ाब हैं कुछ तो भरम रख सुक़ून-ए-मुहब्बत का या थोड़ा करम रख सुक़ून-ए-मुहब्बत का दिल को चैन नहीं आराम नहीं मुहब्बत का ये तो काम नहीं जिस दर्ज़ा मैं हुआ हूँ बर्बाद उस दर्ज़ा तो कोई बर्बाद नहीं मैं मुसलसल इल्तज़ा करता रहा मेरे इज़हार-ए-यार को तरसता रहा इज़हार आया ना मगर वो पराया ना मैं अपनी अना पे पैहम चोट कर रहा हूँ पर नहीं "दीप" अब ख़ुदाया ना ये जो भी सानेहा हुआ मेरा साथ मुश्किल आप चारों ने ही किया हैं मुझे काइल तू, तेरी बातें, तेरा शाइ'र, मेरा दिल अब ख़याल हैं मेरा, शायद तू नहीं मेरे काबिल अब ख़ुदा तेरा सहारा हैं, मुझे वो शख़्स दे या इन चारों की ग़लती से मुझे बख्श दे तुम से दूर रह कर, मैं ने इतना लिखा हैं तो सोच एक दफ़ा तेरे पास हुआ तो क्या क्या कर दूँगा आग लगा दूँगा तेरे इज़हार के बा'द तो सनम मैं दुनिया भुला दूँगा
Deep kamal panecha
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"पुराना ज़ख़्म" आज बरसों बा'द उन का दीदार हुआ दिल को फिर इश्क़ पे ए'तिबार हुआ आँखों में नए ख़्वाब जगे हैं अभी भी अरमानों के दाग़ हरे हैं एक तरफ़ा मुहब्बत यूँँ शादाब भी होती है मुकम्मल न हो तो भी आबाद भी होती है उन की ज़ुल्फ़ों के साए मैं क़ैद रहे ये दिल मेरा दिन-ओ-रात बेचैन रहे मैं चाहता हूँ मोहब्बत का घर हो उन की निग़ाहों का जादुई असर हो उन की हसरत उन का अरमान हो उन की ज़ुल्फ़ों का आसमान हो हम दोनों हम-आग़ोश हो किसी को न ज़माने का होश हो ये चाँदनी रात हो हाथों में हाथ हो हल्की हल्की इश्क़ की बरसात हो इस की कभी सुब्ह न होने पाए ग़म कभी हमारे घर न आए मैं अपनी उँगलियों को उन के गुलाबी रुख़सारों पे फहराऊँ ख़ुदा करें मैं इस ख़्वाब-ओ-ख़्याल से कभी बाहर न आऊँ उन के एक पल के दीदार में मैं ने इतना कुछ सोच लिया आज फिर दिल के पुराने ज़ख़्म को ख़रोंच लिया
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"मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा" तुम से जुदाई हुई तो मैं मर जाऊँगा तुम से उठ कर के मैं किधर जाऊँगा जाऊँगा इधर उधर पागल की तरह याद करूँँगा सारे लम्हें वो पल वो दिन जो हम ने अकेले में साथ में बिताए हैं क्या कैसे बयाँ करूँँ कुछ समझ नहीं आता तुझ से दूर जाने का ख़याल तक सहा नहीं जाता मैं क्या बताऊँ तुम क्या हो मेरी कब तक इन ख़्यालों में मरना होगा कब होगा ऐसा जब हम दो ही होंगे कब होगा ऐसा कि बस ज़िंदगी होगी क्या होगा ऐसा कि हँसी-ख़ुशी होगी ये क्या समाज है ये कैसा समाज है जो किसी की ख़ुशी नहीं देख सकता ऐसे समाज से हमें क्या चाहिए और क्या दे भी सकता है ये कुछ हमें मुझे तेरे इलावा कुछ नहीं चाहिए तू बस मेरी हो जान, ये यक़ीं चाहिए मैं तेरे बिना जैसे तबाह हो जाऊँगा पागलों की तरह राह की धूल खाऊँगा क्या करूँँगा कुछ ख़बर नहीं होगी मुझे पीड़ा के इलावा कुछ असर नहीं होगी मुझे तेरी शादी या'नी मौत होगी मेरी जिस पर तेरे अपने शान से नाचेंगे मिठाई बाँटी जाएँगी मौज उड़ाएँ जाएँगे सब लोग शान से जश्न मनाएँगे और मेरे अपने मुझे बचाएँगे मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा बिन तेरे राह की धूल खाऊँगा
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