nazmKuch Alfaaz

"तबाह" कुछ ख़ामी तो मुझ में है ही ऐसे तो कोई तन्हा नहीं करता ज़ख़्म अता नहीं करता ख़ुदस जुदा नहीं करता मैं ने तो अब तक किसी को सताया नहीं किसी को रुलाया नहीं फिर क्यूँँ कोई मुझ से वफ़ा नहीं करता दाग़ ही दाग़ हैं मेरे जिस्म पर चाक गिरेबाँ का मैं बस इसी लिए कोई मुझ से गिला नहीं करता हसीं ख़्वाब सी गुज़ारनी चाहिए ज़िन्दगी दोज़ख़ सी गुज़ार रहा हूँ मेरी इबारत के हर हर्फ़ को सीने पर लहू से उतार रहा हूँ गुज़ार रहा हूँ बुराई में तन्हाई में रुसवाई में परछाई में आख़िरश यही लिखा है क्या मेरी ज़िंदगी की रौशनाई में ख़्वाब हक़ीक़त नहीं पर मैं समझता हूँ तेरे बिना ही सही ज़िंदा तो रहता हूँ रहता हूँ ख़ामोश कोई आरज़ू कोई जुस्तजू नहीं करता तेरे साए के सिवा अब मैं किसी से गुफ़्तगू नहीं करता कब तक ख़्वाब की आरज़ू पर ज़िन्दगी चलेगी कब तक साए से गुफ़्तगू रहेगी ये बहुत लम्बा वक़्त हो चुका है अब जान-ए-जाँ तेरे लौट आने का वक़्त हो चुका है कुछ तो मेरा ख़याल कर या मुझ सेे कोई सवाल कर बस इतना कमाल कर आ गले लगा और तबाह कर

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"पुराना ज़ख़्म" आज बरसों बा'द उन का दीदार हुआ दिल को फिर इश्क़ पे ए'तिबार हुआ आँखों में नए ख़्वाब जगे हैं अभी भी अरमानों के दाग़ हरे हैं एक तरफ़ा मुहब्बत यूँँ शादाब भी होती है मुकम्मल न हो तो भी आबाद भी होती है उन की ज़ुल्फ़ों के साए मैं क़ैद रहे ये दिल मेरा दिन-ओ-रात बेचैन रहे मैं चाहता हूँ मोहब्बत का घर हो उन की निग़ाहों का जादुई असर हो उन की हसरत उन का अरमान हो उन की ज़ुल्फ़ों का आसमान हो हम दोनों हम-आग़ोश हो किसी को न ज़माने का होश हो ये चाँदनी रात हो हाथों में हाथ हो हल्की हल्की इश्क़ की बरसात हो इस की कभी सुब्ह न होने पाए ग़म कभी हमारे घर न आए मैं अपनी उँगलियों को उन के गुलाबी रुख़सारों पे फहराऊँ ख़ुदा करें मैं इस ख़्वाब-ओ-ख़्याल से कभी बाहर न आऊँ उन के एक पल के दीदार में मैं ने इतना कुछ सोच लिया आज फिर दिल के पुराने ज़ख़्म को ख़रोंच लिया

Deep kamal panecha

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"बीच राह" सर्द मौसम और ये राहें अकेली और कब तेरी ज़रूरत होगी सहेली मैं चलता चलता हाथ फैलाता हूँ तेरा हाथ मेरे हाथ में नहीं पाता हूँ फिर होश में आता हूँ घबराता हूँ बीच राहों में रुक के बैठ जाता हूँ कुछ सोच कुछ ख़याल आते रहते हैं ज़िन्दगी के सारे मलाल आते रहते हैं बैठा-बैठा इंतिज़ार करता हूँ तेरा ज़िक्र बार-बार करता हूँ रुक सा गया हूँ थम सा गया हूँ अब तो ख़ुद को भी खो चुका हूँ रोने के लिए आँख में आँसू नहीं पर गला मेरा ख़ूब चीख़ता है तू ही बतला दे मुझ को ऐ सहेली ये दर्द नहीं आख़िर तो और क्या है गर्दन बीच घुटनों में हौसला पस्त और तू वहाँ बैठा है हो के मस्त मैं किसी को ख़बर कर भी नहीं सकता बीच सारे राह में मर भी नहीं सकता ये ज़िंदगी का सफ़र है और मौत मंज़िल तय तो हर हाल में करना पड़ेगा और तेरे बग़ैर ऐ सहेली मुझे मंज़िल पाने के वास्ते अभी मरना पड़ेगा

Deep kamal panecha

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"तुम चाँद" हमारी मोहब्बत का रिश्ता है कुछ इस तरह ज़मीं से फ़लक की ओर जाने वाले रस्ते की तरह ये रास्ता जो दिखाई ना देता है मैं इस की तलाश में फिरता हूँ कभी मय-खाने से गुज़रता हूँ तो कभी इबादतों में रहता हूँ तुम फ़लक पे क़ाएम हो मैं ज़मीन पर रहता हूँ सुब्ह हज़ारों काम होते हैं मुझे रातों में तेरे दीदार को मरता हूँ तुम्हारी और मेरी रातों में फ़र्क़ होता है तुम तो सुकूँ के साथ हो जाते हो मुझे इस लफ़्ज़ के मायने भी नहीं पता ये सब तुझ से उल्फ़त की है ख़ता खूँ-ए-दिल के साथ तुम को मैं चाँद कहता हूँ वफ़ा और बे-वफ़ाई का याँ कोई मसअला नहीं तुम यहाँ सब के लिए ही तो आते हो निकलते हो और ये कहते हैं तेरा मेरे इलावा किसी से वास्ता नहीं इन सब को भरम हैं कि तुम सिर्फ़ मेरे हो चुके हो इन्हें रक़ीब का नहीं पता तुम तो मुझ से खो चुके हो

Deep kamal panecha

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"ख़्वाब" ये ख़्वाब मुझे क्यो आते हैँ पल-पल मुझे तड़पाते हैं तुम मेरे सपनों में आती हो फिर सारी रात जगाती हो इब्तिदास इंतिहाँ तक क़िस्से से दास्ताँ तक मैं महज़ तुम्हारा हूँ और सारा का सारा हूँ तुम न जाने किस की हो मैं इस सोच में डूबा रहता हूँ तेरी ना-मौजूदगी का एहसास और हज़ारो बेचैनियाँ सहता हूँ बुरे वक़्त में मैं तुझे हासिल नहीं था मेरे सजना मैं इस काबिल नहीं था वो बेबसी और मजबूरी इस तरह थी मैं वो दरिया जिस का साहिल नहीं था

Deep kamal panecha

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"मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा" तुम से जुदाई हुई तो मैं मर जाऊँगा तुम से उठ कर के मैं किधर जाऊँगा जाऊँगा इधर उधर पागल की तरह याद करूँँगा सारे लम्हें वो पल वो दिन जो हम ने अकेले में साथ में बिताए हैं क्या कैसे बयाँ करूँँ कुछ समझ नहीं आता तुझ से दूर जाने का ख़याल तक सहा नहीं जाता मैं क्या बताऊँ तुम क्या हो मेरी कब तक इन ख़्यालों में मरना होगा कब होगा ऐसा जब हम दो ही होंगे कब होगा ऐसा कि बस ज़िंदगी होगी क्या होगा ऐसा कि हँसी-ख़ुशी होगी ये क्या समाज है ये कैसा समाज है जो किसी की ख़ुशी नहीं देख सकता ऐसे समाज से हमें क्या चाहिए और क्या दे भी सकता है ये कुछ हमें मुझे तेरे इलावा कुछ नहीं चाहिए तू बस मेरी हो जान, ये यक़ीं चाहिए मैं तेरे बिना जैसे तबाह हो जाऊँगा पागलों की तरह राह की धूल खाऊँगा क्या करूँँगा कुछ ख़बर नहीं होगी मुझे पीड़ा के इलावा कुछ असर नहीं होगी मुझे तेरी शादी या'नी मौत होगी मेरी जिस पर तेरे अपने शान से नाचेंगे मिठाई बाँटी जाएँगी मौज उड़ाएँ जाएँगे सब लोग शान से जश्न मनाएँगे और मेरे अपने मुझे बचाएँगे मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा बिन तेरे राह की धूल खाऊँगा

Deep kamal panecha

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