nazmKuch Alfaaz

"तुम चाँद" हमारी मोहब्बत का रिश्ता है कुछ इस तरह ज़मीं से फ़लक की ओर जाने वाले रस्ते की तरह ये रास्ता जो दिखाई ना देता है मैं इस की तलाश में फिरता हूँ कभी मय-खाने से गुज़रता हूँ तो कभी इबादतों में रहता हूँ तुम फ़लक पे क़ाएम हो मैं ज़मीन पर रहता हूँ सुब्ह हज़ारों काम होते हैं मुझे रातों में तेरे दीदार को मरता हूँ तुम्हारी और मेरी रातों में फ़र्क़ होता है तुम तो सुकूँ के साथ हो जाते हो मुझे इस लफ़्ज़ के मायने भी नहीं पता ये सब तुझ से उल्फ़त की है ख़ता खूँ-ए-दिल के साथ तुम को मैं चाँद कहता हूँ वफ़ा और बे-वफ़ाई का याँ कोई मसअला नहीं तुम यहाँ सब के लिए ही तो आते हो निकलते हो और ये कहते हैं तेरा मेरे इलावा किसी से वास्ता नहीं इन सब को भरम हैं कि तुम सिर्फ़ मेरे हो चुके हो इन्हें रक़ीब का नहीं पता तुम तो मुझ से खो चुके हो

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"तबाह" कुछ ख़ामी तो मुझ में है ही ऐसे तो कोई तन्हा नहीं करता ज़ख़्म अता नहीं करता ख़ुदस जुदा नहीं करता मैं ने तो अब तक किसी को सताया नहीं किसी को रुलाया नहीं फिर क्यूँँ कोई मुझ से वफ़ा नहीं करता दाग़ ही दाग़ हैं मेरे जिस्म पर चाक गिरेबाँ का मैं बस इसी लिए कोई मुझ से गिला नहीं करता हसीं ख़्वाब सी गुज़ारनी चाहिए ज़िन्दगी दोज़ख़ सी गुज़ार रहा हूँ मेरी इबारत के हर हर्फ़ को सीने पर लहू से उतार रहा हूँ गुज़ार रहा हूँ बुराई में तन्हाई में रुसवाई में परछाई में आख़िरश यही लिखा है क्या मेरी ज़िंदगी की रौशनाई में ख़्वाब हक़ीक़त नहीं पर मैं समझता हूँ तेरे बिना ही सही ज़िंदा तो रहता हूँ रहता हूँ ख़ामोश कोई आरज़ू कोई जुस्तजू नहीं करता तेरे साए के सिवा अब मैं किसी से गुफ़्तगू नहीं करता कब तक ख़्वाब की आरज़ू पर ज़िन्दगी चलेगी कब तक साए से गुफ़्तगू रहेगी ये बहुत लम्बा वक़्त हो चुका है अब जान-ए-जाँ तेरे लौट आने का वक़्त हो चुका है कुछ तो मेरा ख़याल कर या मुझ सेे कोई सवाल कर बस इतना कमाल कर आ गले लगा और तबाह कर

Deep kamal panecha

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"बीच राह" सर्द मौसम और ये राहें अकेली और कब तेरी ज़रूरत होगी सहेली मैं चलता चलता हाथ फैलाता हूँ तेरा हाथ मेरे हाथ में नहीं पाता हूँ फिर होश में आता हूँ घबराता हूँ बीच राहों में रुक के बैठ जाता हूँ कुछ सोच कुछ ख़याल आते रहते हैं ज़िन्दगी के सारे मलाल आते रहते हैं बैठा-बैठा इंतिज़ार करता हूँ तेरा ज़िक्र बार-बार करता हूँ रुक सा गया हूँ थम सा गया हूँ अब तो ख़ुद को भी खो चुका हूँ रोने के लिए आँख में आँसू नहीं पर गला मेरा ख़ूब चीख़ता है तू ही बतला दे मुझ को ऐ सहेली ये दर्द नहीं आख़िर तो और क्या है गर्दन बीच घुटनों में हौसला पस्त और तू वहाँ बैठा है हो के मस्त मैं किसी को ख़बर कर भी नहीं सकता बीच सारे राह में मर भी नहीं सकता ये ज़िंदगी का सफ़र है और मौत मंज़िल तय तो हर हाल में करना पड़ेगा और तेरे बग़ैर ऐ सहेली मुझे मंज़िल पाने के वास्ते अभी मरना पड़ेगा

Deep kamal panecha

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"ख़्वाब" ये ख़्वाब मुझे क्यो आते हैँ पल-पल मुझे तड़पाते हैं तुम मेरे सपनों में आती हो फिर सारी रात जगाती हो इब्तिदास इंतिहाँ तक क़िस्से से दास्ताँ तक मैं महज़ तुम्हारा हूँ और सारा का सारा हूँ तुम न जाने किस की हो मैं इस सोच में डूबा रहता हूँ तेरी ना-मौजूदगी का एहसास और हज़ारो बेचैनियाँ सहता हूँ बुरे वक़्त में मैं तुझे हासिल नहीं था मेरे सजना मैं इस काबिल नहीं था वो बेबसी और मजबूरी इस तरह थी मैं वो दरिया जिस का साहिल नहीं था

Deep kamal panecha

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"रंजिशें" बात क्या हुई क्या ख़बर क्या हुई हम सेे यूँँ ही अपने खफ़ा हो चले हैं जिन्हें देखते हैं हम उम्मीद भरी निगाहों से उन की नज़र में हम फ़ना हो चले हैं कुछ हम सेे इल्तज़ा कर दे ऐ जाने वाले या गीले शिकवे बयाँ कर दे सताने वाले अयाँ कर दे सारी ख़ामियाँ, सारी ख़ामोशियाँ बता दे सारे क़िस्से दास्ताँ कहानियाँ कुछ तो हुआ होगा किसी ने कुछ कहा होगा ऐसे ही कोई अपना रवैया नहीं बदलता ख़ामोश नहीं रहता, उदास नहीं चलता कुछ पता ही नहीं कैसे क्या दूर करूँ गीले-शिकवे तू बेहद अजीज़ हैं मेरे, दिल से हैं तुझ से रिश्ते जाना मेरी, तू पेश कर अपनी नाराज़ियों का सबब मैं दूर कर दूँगा सारी रंजिशें अभी आज़ और अब

Deep kamal panecha

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"पुराना ज़ख़्म" आज बरसों बा'द उन का दीदार हुआ दिल को फिर इश्क़ पे ए'तिबार हुआ आँखों में नए ख़्वाब जगे हैं अभी भी अरमानों के दाग़ हरे हैं एक तरफ़ा मुहब्बत यूँँ शादाब भी होती है मुकम्मल न हो तो भी आबाद भी होती है उन की ज़ुल्फ़ों के साए मैं क़ैद रहे ये दिल मेरा दिन-ओ-रात बेचैन रहे मैं चाहता हूँ मोहब्बत का घर हो उन की निग़ाहों का जादुई असर हो उन की हसरत उन का अरमान हो उन की ज़ुल्फ़ों का आसमान हो हम दोनों हम-आग़ोश हो किसी को न ज़माने का होश हो ये चाँदनी रात हो हाथों में हाथ हो हल्की हल्की इश्क़ की बरसात हो इस की कभी सुब्ह न होने पाए ग़म कभी हमारे घर न आए मैं अपनी उँगलियों को उन के गुलाबी रुख़सारों पे फहराऊँ ख़ुदा करें मैं इस ख़्वाब-ओ-ख़्याल से कभी बाहर न आऊँ उन के एक पल के दीदार में मैं ने इतना कुछ सोच लिया आज फिर दिल के पुराने ज़ख़्म को ख़रोंच लिया

Deep kamal panecha

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